शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* रुद्रसंहिता * २३७
करुणामय ईश्वर हैं। आपके भयसे यह वायु चलती है। आपके भयसे अग्नि जलानेका काम करती है, आपके भयसे सूर्य तपता है और आपके ही भयसे मृत्यु सब ओर दौड़ती फिरती है। दयासिन्धो! महेशान! परमेश्वर! प्रसन्न होइये। हम नष्ट और अचेत हो रहे हैं। अतः सदा ही हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। नाथ! करुणानिधे! शम्भो! आपने अबतक नाना प्रकारकी आपत्तियोंसे जिस तरह हमें सदा सुरक्षित रखा है, उसी तरह आज भी आप हमारी रक्षा कीजिये। नाथ! दुर्गेश! आप शीघ्र कृपा करके इस अपूर्ण यज्ञका और प्रजापति दक्षका भी उद्धार कीजिये। भगको अपनी आँखें मिल जायें, यजमान दक्ष जीवित हो जायें, पूषाके दाँत जम जायँ और भृगुकी दाढ़ी-मूँछ पहले-जैसी हो जाय। शंकर! आयुधों और पत्थरोंकी वर्षासे जिनके अंग भंग हो गये हैं, उन देवता आदिपर आप सर्वथा अनुग्रह करें, जिससे उन्हें पूर्णतः आरोग्य लाभ हो। नाथ! यज्ञकर्म पूर्ण होनेपर जो कुछ शेष रहे, वह सब आपका पूरा-पूरा भाग हो (उसमें और कोई हस्तक्षेप न करे)। रुद्रदेव! आपके भागसे ही यज्ञ पूर्ण हो, अन्यथा नहीं।
ऐसा कहकर मुझ ब्रह्माके साथ सभी देवता अपराध क्षमा करानेके लिये उद्यत हो हाथ जोड़ भूमिपर दण्डके समान पड़ गये।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मुझ ब्रह्मा, लोकपाल, प्रजापति तथा मुनियोंसहित श्रीपति विष्णुके अनुनय-विनय करनेपर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो गये। देवताओंको आश्वासन दे हँसकर उनपर परम अनुग्रह करते हुए करुणानिधान परमेश्वर शिवने कहा।
श्रीमहादेवजी बोले—सुरश्रेष्ठ ब्रह्मा और विष्णुदेव! आप दोनों सावधान होकर मेरी बात सुनें, मैं सच्ची बात कहता हूँ। तात! आप दोनोंकी सभी बातोंको मैंने सदा माना है। दक्षके यज्ञका यह विध्वंस मैंने नहीं किया है। दक्ष स्वयं ही दूसरोंसे द्वेष करते हैं। दूसरोंके प्रति जैसा बर्ताव किया जायगा, वह अपने लिये ही फलित होगा। अतः ऐसा कर्म कभी नहीं करना चाहिये, जो दूसरोंको कष्ट देनेवाला हो।* दक्षका मस्तक जल गया है, इसलिये इनके सिरके स्थानमें बकरेका सिर जोड़ दिया जाय; भग देवता मित्रकी आँखसे अपने यज्ञभागको देखें। तात! पूषा नामक देवता, जिनके दाँत टूट गये हैं, यजमानके दाँतोंसे भलीभाँति पिसे गये यज्ञान्नका भक्षण करें। यह मैंने सच्ची बात बतायी है। मेरा विरोध करनेवाले भृगुकी दाढ़ीके स्थानमें बकरेकी दाढ़ी लगा दी जाय। शेष सभी देवताओंके, जिन्होंने मुझे यज्ञभागके रूपमें यज्ञकी अवशिष्ट वस्तुएँ दी हैं, सारे अंग पहलेकी भाँति ठीक हो जायँ। अध्वर्यु आदि याज्ञिकोंमेंसे, जिनकी भुजाएँ टूट गयी हैं, वे अश्विनीकुमारोंकी भुजाओंसे और जिनके हाथ नष्ट हो गये हैं, वे पूषाके हाथोंसे अपने काम चलायें। यह मैंने आपलोगोंके प्रेमवश कहा है।
* परं द्वेष्टि परेषां यदात्मनस्तद्भविष्यति ॥ परेषां क्लेदनं कर्म न कार्यं तत्कदाचन।
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ४२। ५-६)
२३८
* संक्षिप्त शिवपुराण *
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! ऐसा कहकर वेदका अनुसरण करनेवाले सुरसम्राट् चराचरपति दयालु परमेश्वर महादेवजी चुप हो गये। भगवान् शंकरका वह भाषण सुनकर श्रीविष्णु और ब्रह्मासहित सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो उन्हें तत्काल साधुवाद देने लगे। तदनन्तर भगवान् शम्भुको आमन्त्रित करके मुझ ब्रह्मा और देवर्षियोंके साथ श्रीविष्णु अत्यन्त हर्षपूर्वक पुनः दक्षकी यज्ञशालाकी ओर चले। इस प्रकार उनकी प्रार्थनासे भगवान् शम्भु विष्णु आदि देवताओंके साथ कनखलमें स्थित प्रजापति दक्षकी यज्ञशालामें पधारे। उस समय रुद्रदेवने वहाँ यज्ञका और विशेषतः देवताओं तथा ऋषियोंका जो वीरभद्रके द्वारा विध्वंस किया गया था, उसे देखा। स्वाहा, स्वधा, पूषा, तुष्टि, धृति, सरस्वती, अन्य समस्त ऋषि, पितर, अग्नि तथा अन्यान्य बहुत-से यक्ष, गन्धर्व और राक्षस वहाँ पड़े थे। उनमेंसे कुछ लोगोंके अंग तोड़ डाले गये थे, कुछ लोगोंके बाल नोच लिये गये थे और कितने ही उस समरांगणमें अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे थे। उस यज्ञकी वैसी दुरवस्था देखकर भगवान् शंकरने अपने गणनायक महापराक्रमी वीरभद्रको बुलाकर हँसते हुए कहा—'महाबाहु वीरभद्र! यह तुमने कैसा काम किया? तात! तुमने थोड़ी ही देरमें देवता तथा ऋषि आदिको बड़ा भारी दण्ड दे दिया। वत्स! जिसने ऐसा द्रोहपूर्ण कार्य किया, इस विलक्षण यज्ञका आयोजन किया और जिसे ऐसा फल मिला, उस दक्षको तुम शीघ्र यहाँ ले आओ।'
भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर वीरभद्रने बड़ी उतावलीके साथ दक्षका धड़ लाकर उनके सामने डाल दिया। दक्षके उस शवको सिरसे रहित देख लोककल्याणकारी भगवान् शंकरने आगे खड़े हुए वीरभद्रसे हँसकर पूछा—'दक्षका सिर कहाँ है?' तब प्रभावशाली वीरभद्रने कहा—'प्रभो शंकर ! मैंने तो उसी समय दक्षके सिरको आगमें होम दिया था।' वीरभद्रकी यह बात सुनकर भगवान् शंकरने देवताओंको प्रसन्नतापूर्वक वैसी ही आज्ञा दी, जो पहले दे रखी थी। भगवान् भवने उस समय जो कुछ कहा, उसकी मेरे द्वारा पूर्ति कराकर श्रीहरि आदि सब देवताओंने भृगु आदि सबको शीघ्र ही ठीक कर दिया। तदनन्तर शम्भुके आदेशसे प्रजापतिके धड़के साथ यज्ञपशु बकरेका सिर जोड़ दिया गया। उस सिरके जोड़े जाते
* रुद्रसंहिता * २३९
ही शम्भुकी शुभ दृष्टि पड़नेसे प्रजापतिके शरीरमें प्राण आ गये और वे तत्काल सोकर जगे हुए पुरुषकी भाँति उठकर खड़े हो गये। उठते ही उन्होंने अपने सामने करुणानिधि भगवान् शंकरको देखा। देखते ही दक्षके हृदयमें प्रेम उमड़ आया। उस प्रेमने उनके अन्तःकरणको निर्मल एवं प्रसन्न कर दिया। पहले महादेवजीसे द्वेष करनेके कारण उनका अन्तःकरण मलिन हो गया था। परंतु उस समय शिवके दर्शनसे वे तत्काल शरद्ऋतुके चन्द्रमाकी भाँति निर्मल हो गये। उनके मनमें भगवान् शिवकी स्तुति करनेका विचार उत्पन्न हुआ। परंतु वे अनुरागाधिक्यके कारण तथा अपनी मरी हुई पुत्रीका स्मरण करके व्याकुल हो जानेके कारण तत्काल उनका स्तवन न कर सके। थोड़ी देर बाद मन स्थिर होनेपर दक्षने लज्जित हो लोकशंकर शिवशंकरको प्रणाम किया और उनकी स्तुति आरम्भ की। उन्होंने भगवान् शंकरकी महिमा गाते हुए बारंबार उन्हें प्रणाम किया। फिर अन्तमें कहा—
‘परमेश्वर ! आपने ब्रह्मा होकर सबसे पहले आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये अपने मुखसे विद्या, तप और व्रत धारण करनेवाले ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया था। जैसे ग्वाला लाठी लेकर गौओंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार मर्यादाका पालन करनेवाले आप परमेश्वर दण्ड धारण किये उन साधु ब्राह्मणोंकी सभी विपत्तियोंसे रक्षा करते हैं। मैंने दुर्वचनरूपी बाणोंसे आप परमेश्वरको बींध डाला था। फिर भी आप मुझपर अनुग्रह करनेके लिये यहाँ आ गये। अब मेरी ही तरह अत्यन्त दैन्यपूर्ण आशावाले इन देवताओंपर भी कृपा कीजिये। भक्तवत्सल ! दीनबन्धो ! शम्भो ! मुझमें आपको प्रसन्न करनेके लिये कोई गुण नहीं है। आप षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न परात्पर परमात्मा हैं। अतः अपने ही बहुमूल्य उदारतापूर्ण बर्तावसे मुझपर संतुष्ट हों।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! इस प्रकार लोककल्याणकारी महाप्रभु महेश्वर शंकरकी स्तुति करके विनीतचित्त प्रजापति दक्ष चुप हो गये। तदनन्तर श्रीविष्णुने हाथ जोड़ भगवान् वृषभध्वजको प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्ण हृदय और बाष्पगद्गद वाणीद्वारा उनकी स्तुति प्रारम्भ की।
तदनन्तर मैंने कहा—देवदेव ! महादेव ! करुणासागर ! प्रभो ! आप स्वतन्त्र परमात्मा हैं, अद्वितीय एवं अविनाशी परमेश्वर हैं। देव ! ईश्वर ! आपने मेरे पुत्रपर अनुग्रह किया। अपने अपमानकी ओर कुछ भी ध्यान न देकर दक्षके यज्ञका उद्धार कीजिये। देवेश्वर ! आप प्रसन्न होइये और समस्त शापोंको दूर कर दीजिये। आप सज्ञान हैं। अतः आप ही मुझे कर्तव्यकी ओर प्रेरित करनेवाले हैं और आप ही अकर्तव्यसे रोकनेवाले हैं।
महामुने ! इस प्रकार परम महेश्वरकी स्तुति करके मैं दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर खड़ा हो गया। तब सुन्दर विचार रखनेवाले इन्द्र आदि देवता और लोकपाल शंकरदेवकी स्तुति करने लगे। उस समय भगवान् शिवका मुखारविन्द प्रसन्नतासे
२४० * संक्षिप्त शिवपुराण *
खिल उठा था। इसके बाद प्रसन्नचित्त हुए समस्त देवताओं, दूसरे-दूसरे सिद्धों, ऋषियों और प्रजापतियोंने भी शंकरजीका सहर्ष स्तवन किया। इसके अतिरिक्त उपदेवों, नागों, सदस्यों तथा ब्राह्मणोंने पृथक्-पृथक् प्रणामपूर्वक बड़े भक्तिभावसे उनकी स्तुति की (अध्याय ४१-४२)
भगवान् शिवका दक्षको अपनी भक्तवत्सलता, ज्ञानी भक्तकी श्रेष्ठता तथा तीनों देवताओंकी एकता बताना, दक्षका अपने यज्ञको पूर्ण करना, सब देवता आदिका अपने-अपने स्थानको जाना, सतीखण्डका उपसंहार और माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इस प्रकार श्रीविष्णुके, मेरे, देवताओं और ऋषियोंके तथा अन्य लोगोंके स्तुति करनेपर महादेवजी बड़े प्रसन्न हुए। फिर उन शम्भुने समस्त ऋषियों, देवता आदिको कृपादृष्टिसे देखकर तथा मुझ ब्रह्मा और विष्णुका समाधान करके दक्षसे इस प्रकार कहा।
महादेवजी बोले—प्रजापति दक्ष! मैं जो कुछ कहता हूँ, सुनो। मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। यद्यपि मैं सबका ईश्वर और स्वतन्त्र हूँ तो भी सदा ही अपने भक्तोंके अधीन रहता हूँ। चार प्रकारके पुण्यात्मा पुरुष मेरा भजन करते हैं। दक्ष प्रजापते! उन चारों भक्तोंमें पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। उनमें पहला आर्त, दूसरा जिज्ञासु, तीसरा अर्थार्थी और चौथा ज्ञानी है। पहलेके तीन तो सामान्य श्रेणीके भक्त हैं। किंतु चौथाका अपना विशेष महत्त्व है। उन सब भक्तोंमें चौथा ज्ञानी ही मुझे अधिक प्रिय है। वह मेरा रूप माना गया है। उससे बढ़कर दूसरा कोई मुझे प्रिय नहीं है, यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ।* मैं आत्मज्ञ हूँ। वेद-वेदान्तके पारगामी विद्वान् ज्ञानके द्वारा मुझे जान सकते हैं। जिनकी बुद्धि मन्द है, वे ही ज्ञानके बिना मुझे पानेका प्रयत्न करते हैं। कर्मके अधीन हुए मूढ़ मानव मुझे वेद, यज्ञ, दान और तपस्याद्वारा भी कभी नहीं पा सकते।
अतः दक्ष! आजसे तुम बुद्धिके द्वारा मुझ परमेश्वरको जानकर ज्ञानका आश्रय ले समाहितचित्त होकर कर्म करो। प्रजापते! तुम उत्तम बुद्धिके द्वारा मेरी दूसरी बात भी सुनो। मैं अपने सगुण स्वरूपके विषयमें भी इस गोपनीय रहस्यको धर्मकी दृष्टिसे तुम्हारे सामने प्रकट करता हूँ। जगत्का परम कारणरूप मैं ही ब्रह्मा और विष्णु हूँ। मैं
* चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनः सदा। उत्तरोत्तरतः श्रेष्ठास्तेषां दक्ष प्रजापते॥
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी चैव चतुर्थकः। पूर्वे त्रयश्च सामान्याश्चतुर्थो हि विशिष्यते॥
तत्र ज्ञानी प्रियतरो मम रूपं च स स्मृतः। तस्मात्प्रियतरो नान्यः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥
(शि० पु० रू० सं० स० खं० ४३। ४–६)
* रुद्रसंहिता * २४१
सबका आत्मा ईश्वर और साक्षी हूँ। स्वयम्प्रकाश तथा निर्विशेष हूँ! मुने! अपनी त्रिगुणात्मिका मायाको स्वीकार करके मैं ही जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करता हुआ उन क्रियाओंके अनुरूप ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नाम धारण करता हूँ। उस अद्वितीय (भेदरहित) केवल (विशुद्ध) मुझ परब्रह्म परमात्मामें ही अज्ञानी पुरुष ब्रह्म, ईश्वर तथा अन्य समस्त जीवोंको भिन्नरूपसे देखता है। जैसे मनुष्य अपने सिर और हाथ आदि अंगोंमें 'ये मुझसे भिन्न हैं' ऐसी परकीय बुद्धि कभी नहीं करता, उसी तरह मेरा भक्त प्राणिमात्रमें मुझसे भिन्नता नहीं देखता। दक्ष! मैं, ब्रह्मा और विष्णु तीनों स्वरूपतः एक ही हैं तथा हम ही सम्पूर्ण जीवरूप हैं—ऐसा समझकर जो हम तीनों देवताओंमें भेद नहीं देखता, वही शान्ति प्राप्त करता है। जो नराधम हम तीनों देवताओंमें भेदबुद्धि रखता है, वह निश्चय ही जबतक चन्द्रमा और तारे रहते हैं, तबतक नरकमें निवास करता है।$^१$ दक्ष! यदि कोई विष्णुभक्त होकर मेरी निन्दा करेगा और मेरा भक्त होकर विष्णुकी निन्दा करेगा तो तुम्हें दिये हुए पूर्वोक्त सारे शाप उन्हीं दोनोंको प्राप्त होंगे और निश्चय ही उन्हें तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो सकती।$^२$
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! भगवान् महेश्वरके इस सुखदायक वचनको सुनकर सब देवता, मुनि आदिको उस अवसरपर बड़ा हर्ष हुआ। कुटुम्बसहित दक्ष बड़ी प्रसन्नताके साथ शिवभक्तिमें तत्पर हो गया। वे देवता आदि भी शिवको ही सर्वेश्वर जानकर भगवान् शिवके भजनमें लग गये। जिसने जिस प्रकार परमात्मा शम्भुकी स्तुति की थी, उसे उसी प्रकार संतुष्टचित्त हुए शम्भुने वर दिया। मुने! तदनन्तर भगवान् शिवकी आज्ञा पाकर प्रसन्नचित्त हुए शिवभक्त दक्षने शिवके ही अनुग्रहसे अपना यज्ञ पूरा किया। उन्होंने देवताओंको तो यज्ञभाग दिये ही, शिवको भी पूर्ण भाग दिया। साथ ही ब्राह्मणोंको दान दिया! इस तरह उन्हें शम्भुका अनुग्रह प्राप्त हुआ। इस प्रकार महादेवजीके उस महान् कर्मका विधिपूर्वक वर्णन किया गया। प्रजापतिने ऋत्विजोंके सहयोगसे उस यज्ञकर्मको विधिवत् समाप्त किया। मुनीश्वर! इस प्रकार परब्रह्मस्वरूप शंकरके प्रसादसे वह दक्षका यज्ञ पूरा हुआ। तदनन्तर सब देवता और ऋषि संतुष्ट हो भगवान् शिवके यशका वर्णन करते हुए अपने-अपने स्थानको चले गये। दूसरे लोग भी उस समय वहाँसे सुखपूर्वक विदा हो गये। मैं और श्रीविष्णु भी अत्यन्त प्रसन्न हो भगवान् शिवके सर्वमंगलदायक सुयशका निरन्तर गान करते हुए अपने-अपने स्थानको सानन्द चले आये। सत्पुरुषोंके आश्रयभूत महादेवजी भी
१-सर्वभूतात्मनामेकभावानां यो न पश्यति। त्रिसुराणां भिदां दक्ष स शान्तिमधिगच्छति॥
यः करोति त्रिदेवेषु भेदबुद्धिं नराधमः। नरके स वसेन्नूनं यावदाचन्द्रतारकम्॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ४३। १६-१७)
२-हरिभक्तो हि मां निन्देत्तथा शैवो भवेद्यदि। तयोः शापा भवेयुस्ते तत्त्वप्राप्तिर्भवेन्नहि॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ४३। २१)
२४२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
दक्षसे सम्मानित हो प्रीति और प्रसन्नताके साथ गणोंसहित अपने निवासस्थान कैलास पर्वतको चले गये। अपने पर्वतपर आकर शम्भुने अपनी प्रिया सतीका स्मरण किया और प्रधान-प्रधान गणोंसे उनकी कथा कही।
इस प्रकार दक्षकन्या सती यज्ञमें अपने शरीरको त्यागकर फिर हिमालयकी पत्नी मेनाके गर्भसे उत्पन्न हुईं, यह बात प्रसिद्ध है। फिर वहाँ तपस्या करके गौरी शिवाने भगवान् शिवका पतिरूपमें वरण किया। वे उनके वामांगमें स्थान पाकर अद्भुत लीलाएँ करने लगीं। नारद! इस तरह मैंने तुमसे सतीके परम अद्भुत दिव्य चरित्रका वर्णन किया है, जो भोग और मोक्षको देनेवाला तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। यह उपाख्यान पापको दूर करनेवाला, पवित्र एवं परम पावन है। स्वर्ग, यश तथा आयुको देनेवाला तथा पुत्र-पौत्ररूप फल प्रदान करनेवाला है। तात! जो भक्तिमान् पुरुष भक्तिभावसे लोगोंको यह कथा सुनाता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण कर्मोंका फल पाकर परलोकमें परमगतिको प्राप्त कर लेता है।
(अध्याय ४३)
$$\sim\sim\circ\sim\sim$$
॥ रुद्रसंहिताका सतीखण्ड सम्पूर्ण ॥
$$\sim\sim\circ\sim\sim$$
रुद्रसंहिता: तृतीय (पार्वती) खण्ड
रुद्रसंहिता, तृतीय (पार्वती) खण्ड
हिमालयके स्थावर-जंगम द्विविध स्वरूप एवं दिव्यताका वर्णन, मेनाके साथ उनका विवाह तथा मेना आदिको पूर्वजन्ममें प्राप्त हुए सनकादिके शाप एवं वरदानका कथन
नारदजीने पूछा—ब्रह्मन् ! पिताके यज्ञमें अपने शरीरका परित्याग करके दक्षकन्या जगदम्बा सतीदेवी किस प्रकार गिरिराज हिमालयकी पुत्री हुईं? किस तरह अत्यन्त उग्र तपस्या करके उन्होंने पुनः शिवको ही पतिरूपमें प्राप्त किया? यह मेरा प्रश्न है, आप इसपर भलीभाँति और विशेषरूपसे प्रकाश डालिये।
ब्रह्माजीने कहा—मुने! नारद! तुम पहले पार्वतीकी माताके जन्म, विवाह और अन्य भक्तिवर्धक पावन चरित्र सुनो। मुनिश्रेष्ठ! उत्तरदिशामें पर्वतोंका राजा हिमवान् नामक महान् पर्वत है, जो महातेजस्वी और समृद्धिशाली है। उसके दो रूप प्रसिद्ध हैं—एक स्थावर और दूसरा जंगम। मैं संक्षेपसे उसके सूक्ष्म (स्थावर) स्वरूपका वर्णन करता हूँ। वह रमणीय पर्वत नाना प्रकारके रत्नोंका आकर (खान) है और पूर्व तथा पश्चिम समुद्रके भीतर प्रवेश करके इस तरह खड़ा है, मानो भूमण्डलको नापनेके लिये कोई मानदण्ड हो। वह नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त है और अनेक शिखरोंके कारण विचित्र शोभासे सम्पन्न दिखायी देता है। सिंह, व्याघ्र आदि पशु सदा सुखपूर्वक उसका सेवन करते हैं। हिमका तो वह भंडार ही है, इसलिये अत्यन्त उग्र जान पड़ता है। भाँति-भाँतिके आश्चर्यजनक दृश्योंसे उसकी विचित्र शोभा होती है। देवता, ऋषि, सिद्ध और मुनि उस पर्वतका आश्रय लेकर रहते हैं। भगवान् शिवको वह बहुत ही प्रिय है, तपस्या करनेका स्थान है। स्वरूपसे ही वह अत्यन्त पवित्र और महात्माओंको भी पावन करनेवाला है। तपस्यामें वह अत्यन्त शीघ्र सिद्धि प्रदान करता है। अनेक प्रकारके धातुओंकी खान और शुभ है। वही दिव्य शरीर धारण करके सर्वांग-सुन्दर रमणीय देवताके रूपमें भी स्थित है। भगवान् विष्णुका अविकृत अंश है, इसीलिये वह शैलराज साधु-संतोंको अधिक प्रिय है।
एक समय गिरिवर हिमवान्ने अपनी कुल-परम्पराकी स्थिति और धर्मकी वृद्धिके लिये देवताओं तथा पितरोंका हित करनेकी अभिलाषासे अपना विवाह करनेकी इच्छा की। मुनीश्वर! उस अवसरपर सम्पूर्ण देवता अपने स्वार्थका विचार करके दिव्य पितरोंके पास आकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक बोले।
देवताओंने कहा—पितरो ! आप सब लोग प्रसन्नचित्त होकर हमारी बात सुनें और यदि देवताओंका कार्य सिद्ध करना आपको भी अभीष्ट हो तो शीघ्र वैसा ही करें। आपकी ज्येष्ठ पुत्री जो मेना नामसे प्रसिद्ध है, वह मंगळरूपिणी है। उसका विवाह आपलोग अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक हिमवान् पर्वतसे कर दें। ऐसा करनेपर आप सब लोगोंको सर्वथा महान् लाभ होगा और देवताओंके दुःखोंका निवारण भी पग-पगपर होता रहेगा।
देवताओंकी यह बात सुनकर पितरोंने
२४४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
परस्पर विचार करके स्वीकृति दे दी और अपनी पुत्री मेनाको विधिपूर्वक हिमालयके हाथमें दे दिया। उस परम मंगलमय विवाहमें बड़ा उत्सव मनाया गया। मुनीश्वर नारद! मेनाके साथ हिमालयके शुभ विवाहका यह सुखद प्रसंग मैंने तुमसे प्रसन्नतापूर्वक कहा है। अब और क्या सुनना चाहते हो?
नारदजीने पूछा—विधे! विद्वन्! अब आदरपूर्वक मेरे सामने मेनाकी उत्पत्तिका वर्णन कीजिये। उसे किस प्रकार शाप प्राप्त हुआ था, यह कहिये और मेरे संदेहका निवारण कीजिये।
ब्रह्माजी बोले—मुने! मैंने अपने दक्ष नामक जिस पुत्रकी पहले चर्चा की है, उनके साठ कन्याएँ हुई थीं, जो सृष्टिकी उत्पत्तिमें कारण बनीं। नारद! दक्षने कश्यप आदि श्रेष्ठ मुनियोंके साथ उनका विवाह किया था, यह सब वृत्तान्त तो तुम्हें विदित ही है। अब प्रस्तुत विषयको सुनो। उन कन्याओंमें एक स्वधा नामकी कन्या थी, जिसका विवाह उन्होंने पितरोंके साथ किया। स्वधाकी तीन पुत्रियाँ थीं, जो सौभाग्य-शालिनी तथा धर्मकी मूर्ति थीं। उनमेंसे ज्येष्ठ पुत्रीका नाम 'मेना' था। मँझली 'धन्या' के नामसे प्रसिद्ध थी और सबसे छोटी कन्याका नाम 'कलावती' था। ये सारी कन्याएँ पितरोंकी मानसी पुत्रियाँ थीं—उनके मनसे प्रकट हुई थीं। इनका जन्म किसी माताके गर्भसे नहीं हुआ था, अतएव ये अयोनिजा थीं; केवल लोकव्यवहारसे स्वधाकी पुत्री मानी जाती थीं। इनके सुन्दर नामोंका कीर्तन करके मनुष्य सम्पूर्ण अभीष्टको प्राप्त कर लेता है। ये सदा सम्पूर्ण जगत्की वन्दनीया लोकमाताएँ हैं और उत्तम अभ्युदयसे सुशोभित रहती हैं। सब-की-सब परम योगिनी, ज्ञाननिधि तथा तीनों लोकोंमें सर्वत्र जा सकनेवाली हैं। मुनीश्वर! एक समय वे तीनों बहिनें भगवान् विष्णुके निवासस्थान श्वेतद्वीपमें उनका दर्शन करनेके लिये गयीं। भगवान् विष्णुको प्रणाम और भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति करके वे उन्हींकी आज्ञासे वहाँ ठहर गयीं। उस समय वहाँ संतोंका बड़ा भारी समाज एकत्र हुआ था।
मुने! उसी अवसरपर मेरे पुत्र सनकादि सिद्धगण भी वहाँ गये और श्रीहरिकी स्तुति-वन्दना करके उन्हींकी आज्ञासे वहाँ ठहर गये। सनकादि मुनि देवताओंके आदिपुरुष और सम्पूर्ण लोकोंमें वन्दित हैं। वे जब वहाँ आकर खड़े हुए, उस समय श्वेतद्वीपके सब लोग उन्हें देख प्रणाम करते हुए उठकर खड़े हो गये। परंतु ये तीनों बहिनें उन्हें देखकर भी वहाँ नहीं उठीं। इससे सनत्कुमारने उनको (मर्यादा-रक्षार्थ) उन्हें स्वर्गसे दूर होकर नर-स्त्री बननेका शाप दे दिया। फिर उनके प्रार्थना करनेपर वे प्रसन्न हो गये और बोले।
सनत्कुमारने कहा—पितरोंकी तीनों कन्याओ! तुम प्रसन्नचित्त होकर मेरी बात सुनो। यह तुम्हारे शोकका नाश करनेवाली और सदा ही तुम्हें सुख देनेवाली है। तुममेंसे जो ज्येष्ठ है, वह भगवान् विष्णुकी अंशभूत हिमालय गिरिकी पत्नी हो। उससे जो कन्या होगी, वह 'पार्वती' के नामसे विख्यात होगी। पितरोंकी दूसरी प्रिय कन्या, योगिनी धन्या राजा जनककी पत्नी होगी। उसकी कन्याके रूपमें महालक्ष्मी अवतीर्ण होंगी, जिनका नाम 'सीता' होगा। इसी प्रकार पितरोंकी छोटी पुत्री कलावती द्वापरके
* रुद्रसंहिता * २४५
अन्तिम भागमें वृषभानु वैश्यकी पत्नी होगी और उसकी प्रिय पुत्री 'राधा' के नामसे विख्यात होगी। योगिनी मेनका (मेना) पार्वतीजीके वरदानसे अपने पतिके साथ उसी शरीरसे कैलास नामक परमपदको प्राप्त हो जायगी। धन्या तथा उनके पति, जनककुलमें उत्पन्न हुए जीवन्मुक्त महायोगी राजा सीरध्वज, लक्ष्मीस्वरूपा सीताके प्रभावसे वैकुण्ठधाममें जायँगे। वृषभानुके साथ वैवाहिक मंगलकृत्य सम्पन्न होनेके कारण जीवन्मुक्त योगिनी कलावती भी अपनी कन्या राधाके साथ गोलोकधाममें जायगी—इसमें संशय नहीं है। विपत्तिमें पड़े बिना कहाँ किनकी महिमा प्रकट होती है। उत्तम कर्म करनेवाले पुण्यात्मा पुरुषोंका संकट जब टल जाता है, तब उन्हें दुर्लभ सुखकी प्राप्ति होती है। अब तुमलोग प्रसन्नतापूर्वक मेरी दूसरी बात भी सुनो, जो सदा सुख देनेवाली है। मेनाकी पुत्री जगदम्बा पार्वतीदेवी अत्यन्त दुस्सह तप करके भगवान् शिवकी प्रिय पत्नी बनेंगी। धन्याकी पुत्री सीता भगवान् श्रीरामजीकी पत्नी होंगी और लोकाचारका आश्रय ले श्रीरामके साथ विहार करेंगी। साक्षात् गोलोकधाममें निवास करनेवाली राधा ही कलावतीकी पुत्री होंगी। वे गुप्त स्नेहमें बँधकर श्रीकृष्णकी प्रियतमा बनेंगी।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इस प्रकार शापके ब्याजसे दुर्लभ वरदान देकर सबके द्वारा प्रशंसित भगवान् सनत्कुमार मुनि भाइयोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गये। तात! पितरोंकी मानसी पुत्री वे तीनों बहिनें इस प्रकार शापमुक्त हो सुख पाकर तुरंत अपने घरको चली गयीं। (अध्याय १-२)
~~ ० ~~
देवताओंका हिमालयके पास जाना और उनसे सत्कृत हो उन्हें उमाराधनकी विधि बता स्वयं भी एक सुन्दर स्थानमें जाकर उनकी स्तुति करना
नारदजी बोले—महामते! आपने मेनाके पूर्वजन्मकी यह शुभ एवं अद्भुत कथा कही है। उनके विवाहका प्रसंग भी मैंने सुन लिया। अब आगेके उत्तम चरित्रका वर्णन कीजिये।
ब्रह्माजीने कहा—नारद! जब मेनाके साथ विवाह करके हिमवान् अपने घरको गये, तब तीनों लोकोंमें बड़ा भारी उत्सव मनाया गया। हिमालय भी अत्यन्त प्रसन्न हो मेनाके साथ अपने सुखदायक सदनमें निवास करने लगे। मुने! उस समय श्रीविष्णु आदि समस्त देवता और महात्मा मुनि गिरिराजके पास गये। उन सब देवताओंको आया देख महान् हिमगिरिने प्रशंसापूर्वक उन्हें प्रणाम किया और अपने भाग्यकी सराहना करते हुए भक्तिभावसे उन सबका आदर-सत्कार किया। हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर वे बड़े प्रेमसे स्तुति करनेको उद्यत हुए। शैलराजके शरीरमें महान् रोमांच हो आया। उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहने लगे। मुने! हिमशैलने प्रसन्नमनसे अत्यन्त प्रेमपूर्वक प्रणाम किया और विनीतभावसे खड़े हो श्रीविष्णु आदि देवताओंसे कहा।
हिमाचल बोले—आज मेरा जन्म सफल हो गया, मेरी बड़ी भारी तपस्या
२४६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
सफल हुई। आज मेरा ज्ञान सफल हुआ और आज मेरी सारी क्रियाएँ सफल हो गयीं। आज मैं धन्य हुआ। मेरी सारी भूमि धन्य हुई। मेरा कुल धन्य हुआ। मेरी स्त्री तथा मेरा सब कुछ धन्य हो गया, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि आप सब महान् देवता एक साथ मिलकर एक ही समय यहाँ पधारे हैं। मुझे अपना सेवक समझकर प्रसन्नतापूर्वक उचित कार्यके लिये आज्ञा दें।
हिमगिरिका यह वचन सुनकर वे सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और अपने कार्यकी सिद्धि मनाते हुए बोले।
देवताओंने कहा—महाप्राज्ञ हिमाचल! हमारा हितकारक वचन सुनो। हम सब लोग जिस कामके लिये यहाँ आये हैं, उसे प्रसन्नतापूर्वक बता रहे हैं। गिरिराज! पहले जो जगदम्बा उमा दक्षकन्या सतीके रूपमें प्रकट हुई थीं और रुद्रपत्नी होकर सुदीर्घकालतक इस भूतलपर क्रीडा करती रहीं, वे ही अम्बिका सती अपने पितासे अनादर पाकर अपनी प्रतिज्ञाका स्मरण करके यज्ञमें शरीर त्याग अपने परम धामको पधार गयीं। हिमगिरे! वह कथा लोकमें विख्यात है और तुम्हें भी विदित है। यदि वे सती पुनः तुम्हारे घरमें प्रकट हो जायँ तो देवताओंका महान् लाभ हो सकता है।
ब्रह्माजी कहते हैं—श्रीविष्णु आदि देवताओंकी यह बात सुनकर गिरिराज हिमालय मन-ही-मन प्रसन्न हो आदरसे झुक गये और बोले—'प्रभो! ऐसा हो तो बड़े सौभाग्यकी बात है।' तदनन्तर वे देवता उन्हें बड़े आदरसे उमाको प्रसन्न करनेकी विधि बताकर स्वयं सदाशिव-पत्नी उमाकी शरणमें गये। एक सुन्दर स्थानमें स्थित हो समस्त देवताओंने जगदम्बाका स्मरण किया और बारंबार प्रणाम करके वे वहाँ श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति करने लगे।
देवता बोले—शिवलोकमें निवास करनेवाली देवि! उमे! जगदम्बे! सदाशिव-प्रिये! दुर्गे! महेश्वरि! हम आपको नमस्कार करते हैं। आप पावन शान्तस्वरूप श्रीशक्ति हैं, परमपावन पुष्टि हैं। अव्यक्त प्रकृति और महत्तत्त्व—ये आपके ही रूप हैं। हम भक्तिपूर्वक आपको नमस्कार करते हैं। आप कल्याणमयी शिवा हैं। आपके हाथ भी कल्याणकारी हैं। आप शुद्ध, स्थूल, सूक्ष्म और सबका परम आश्रय हैं। अन्तर्विद्या और सुविद्यासे अत्यन्त प्रसन्न रहनेवाली आप देवीको हम प्रणाम करते हैं। आप श्रद्धा हैं। आप धृति हैं। आप श्री हैं और आप ही सबमें व्याप्त रहनेवाली देवी हैं। आप ही सूर्यकी किरणें हैं और आप ही अपने प्रपंचको प्रकाशित करनेवाली हैं। ब्रह्माण्डरूप शरीरमें और जगत्के जीवोंमें रहकर जो ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्की पुष्टि करती हैं, उन आदिदेवीको हम नमस्कार करते हैं। आप ही वेदमाता गायत्री हैं, आप ही सावित्री और सरस्वती हैं। आप ही सम्पूर्ण जगत्के लिये वार्ता नामक वृत्ति हैं और आप ही धर्मस्वरूपा वेदत्रयी हैं। आप ही सम्पूर्ण भूतोंमें निद्रा बनकर रहती हैं। उनकी क्षुधा और तृप्ति भी आप ही हैं। आप ही तृष्णा, कान्ति, छवि, तुष्टि और सदा सम्पूर्ण आनन्दको देनेवाली हैं। आप ही पुण्यकर्ताओंके यहाँ लक्ष्मी बनकर रहती हैं और आप ही पापियोंके घर सदा ज्येष्ठा (लक्ष्मीकी बड़ी बहिन दरिद्रता)-के रूपमें वास करती हैं। आप ही सम्पूर्ण
* रुद्रसंहिता * २४७
जगत्की शान्ति हैं। आप ही धारण करनेवाली धात्री एवं प्राणोंका पोषण करनेवाली शक्ति हैं। आप ही पाँचों भूतोंके सारतत्त्वको प्रकट करनेवाली तत्त्वस्वरूपा हैं। आप ही नीतिज्ञोंकी नीति तथा व्यवसायरूपिणी हैं। आप ही सामवेदकी गीति हैं। आप ही ग्रन्थि हैं। आप ही यजुर्मन्त्रोंकी आहुति हैं। ऋग्वेदकी मात्रा तथा अथर्ववेदकी परम गति भी आप ही हैं। जो प्राणियोंके नाक, कान, नेत्र, मुख, भुजा, वक्षःस्थल और हृदयमें धृतिरूपसे स्थित हो सदा ही उनके लिये सुखका विस्तार करती हैं। जो निद्राके रूपमें संसारके लोगोंको अत्यन्त सुभग प्रतीत होती हैं, वे देवी उमा जगत्की स्थिति एवं पालनके लिये हम सबपर प्रसन्न हों।
इस प्रकार जगज्जननी सती-साध्वी महेश्वरी उमाकी स्तुति करके अपने हृदयमें विशुद्ध प्रेम लिये वे सब देवता उनके दर्शनकी इच्छासे वहाँ खड़े हो गये।
(अध्याय ३)
उमादेवीका दिव्यरूपसे देवताओंको दर्शन देना, देवताओंका उनसे अपना अभिप्राय निवेदन करना और देवीका अवतार लेनेकी बात स्वीकार करके देवताओंको आश्वासन देना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर दुर्गम पीड़ाका नाश करनेवाली जगज्जननी देवी दुर्गा उनके सामने प्रकट हुईं। वे परम अद्भुत दिव्य रत्नमय रथपर बैठी हुई थीं। उस श्रेष्ठ रथमें घुँघुरू लगे हुए थे और मुलायम बिस्तर बिछे थे। उनके श्रीविग्रहका एक-एक अंग करोड़ों सूर्योंसे भी अधिक प्रकाशमान और रमणीय था। ऐसे अवयवोंसे वे अत्यन्त उद्भासित हो रही थीं। सब ओर फैली हुई अपनी तेजोराशिके मध्यभागमें वे विराजमान थीं। उनका रूप बहुत ही सुन्दर था और उनकी छविकी कहीं तुलना नहीं थी। सदाशिवके साथ विलास करनेवाली उन महामायाकी किसीके साथ समानता नहीं थी। शिवलोकमें निवास करनेवाली वे देवी त्रिविध चिन्मय गुणोंसे युक्त थीं। प्राकृत गुणोंका अभाव होनेसे उन्हें निर्गुणा कहा जाता है। वे नित्यरूपा हैं। वे दुष्टोंपर प्रचण्ड कोप करनेके कारण चण्डी कहलाती हैं, परंतु स्वरूपसे शिवा (कल्याणमयी) हैं। सबकी सम्पूर्ण पीड़ाओंका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण जगत्की माता हैं। वे ही
२४८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
प्रलयकालमें महानिद्रा होकर सबको अपने अंकमें सुला लेती हैं तथा वे समस्त स्वजनों (भक्तों)-का संसार-सागरसे उद्धार कर देती हैं। शिवादेवीकी तेजोरशिके प्रभावसे देवता उन्हें अच्छी तरह देख न सके। तब उनके दर्शनकी अभिलाषासे देवताओंने फिर उनका स्तवन किया। तदनन्तर दर्शनकी इच्छा रखनेवाले विष्णु आदि सब देवता उन जगदम्बाकी कृपा पाकर वहाँ उनका सुस्पष्ट दर्शन कर सके।
इसके बाद देवता बोले—अम्बिके! महादेवि! हम सदा आपके दास हैं। आप प्रसन्नतापूर्वक हमारा निवेदन सुनें। पहले आप दक्षकी पुत्रीरूपसे अवतीर्ण हो लोकमें रुद्रदेवकी वल्लभा हुई थीं। उस समय आपने ब्रह्माजीके तथा दूसरे देवताओंके महान् दुःखका निवारण किया था। तदनन्तर पितासे अनादर पाकर अपनी की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार आपने शरीरको त्याग दिया और स्वधाममें पधार आयीं। इससे भगवान् हरको भी बड़ा दुःख हुआ। महेश्वरि! आपके चले आनेसे देवताओंका कार्य पूरा नहीं हुआ। अतः हम देवता और मुनि व्याकुल होकर आपकी शरणमें आये हैं। महेशानि! शिवे! आप देवताओंका मनोरथ पूर्ण करें, जिससे सनत्कुमारका वचन सफल हो। देवि! आप भूतलपर अवतीर्ण हो पुनः रुद्रदेवकी पत्नी होइये और यथायोग्य ऐसी लीला कीजिये, जिससे देवताओंको सुख प्राप्त हो। देवि! इससे कैलास पर्वतपर निवास करनेवाले रुद्रदेव भी सुखी होंगे। आप ऐसी कृपा करें, जिससे सब सुखी हों और सबका सारा दुःख नष्ट हो जाय।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर विष्णु आदि सब देवता प्रेममें मग्न हो गये और भक्तिसे विनम्र होकर चुपचाप खड़े रहे। देवताओंकी यह स्तुति सुनकर शिवादेवीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई। उसके हेतुका विचार करके अपने प्रभु शिवका स्मरण करती हुई भक्तवत्सला दयामयी उमादेवी उस समय विष्णु आदि देवताओंको सम्बोधित करके हँसकर बोलीं।
उमाने कहा—हे हरे! हे विधे! और हे देवताओ तथा मुनियो! तुम सब लोग अपने मनसे व्यथाको निकाल दो और मेरी बात सुनो। मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, इसमें संशय नहीं है। सब लोग अपने-अपने स्थानको जाओ और चिरकालतक सुखी रहो। मैं अवतार ले मेनाकी पुत्री होकर उन्हें सुख दूँगी और रुद्रदेवकी पत्नी हो जाऊँगी। यह मेरा अत्यन्त गुप्त मत है। भगवान् शिवकी लीला अद्भुत है। वह ज्ञानियोंको भी मोहमें डालनेवाली है। देवताओ! उस यज्ञमें जाकर पिताके द्वारा अपने स्वामीका अनादर देख जबसे मैंने दक्षजनित शरीरको त्याग दिया है, तभीसे वे मेरे स्वामी कालाग्नि रुद्रदेव तत्काल दिगम्बर हो गये। वे मेरी ही चिन्तामें डूबे रहते हैं। उनके मनमें यह विचार उठा करता है कि धर्मको जाननेवाली सती मेरा रोष देखकर पिताके यज्ञमें गयी और वहाँ मेरा अनादर देख मुझमें प्रेम होनेके कारण उसने अपना शरीर त्याग दिया। यही सोचकर वे घर-बार छोड़ अलौकिक वेष धारण करके योगी हो गये। मेरी स्वरूपभूता सतीके वियोगको वे महेश्वर सहन न कर सके। देवताओ! भगवान् रुद्रकी भी यह अत्यन्त इच्छा है कि भूतलपर मेना और
* रुद्रसंहिता * २४९
हिमाचलके घरमें मेरा अवतार हो; क्योंकि वे पुनः मेरा पाणिग्रहण करनेकी अधिक अभिलाषा रखते हैं। अतः मैं रुद्रदेवके सन्तोषके लिये अवतार लूँगी और लौकिक गतिका आश्रय लेकर हिमालय-पत्नी मेनाकी पुत्री होऊँगी।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर जगदम्बा शिवा उस समय समस्त देवताओंके देखते-देखते ही अदृश्य हो गयीं और तुरंत अपने लोकमें चली गयीं। तदनन्तर हर्षसे भरे हुए विष्णु आदि समस्त देवता और मुनि उस दिशाको प्रणाम करके अपने-अपने धाममें चले गये।
(अध्याय ४)
मेनाको प्रत्यक्ष दर्शन देकर शिवादेवीका उन्हें अभीष्ट वरदानसे संतुष्ट करना तथा मेनासे मैनाकका जन्म
नारदजीने पूछा—पिताजी! जब देवी दुर्गा अन्तर्धान हो गयीं और देवगण अपने-अपने धामको चले गये, उसके बाद क्या हुआ?
ब्रह्माजीने कहा—मेरे पुत्रोंमें श्रेष्ठ विप्रवर नारद! जब विष्णु आदि देवसमुदाय हिमालय और मेनाको देवीकी आराधनाका उपदेश दे चले गये, तब गिरिराज हिमाचल और मेना दोनों दम्पतिने बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की। वे दिन-रात शम्भु और शिवाका चिन्तन करते हुए भक्तियुक्त चित्तसे नित्य उनकी सम्यक् रीतिसे आराधना करने लगे। हिमवान्की पत्नी मेना बड़ी प्रसन्नतासे शिवसहित शिवादेवीकी पूजा करने लगीं। वे उन्हींके संतोषके लिये सदा ब्राह्मणोंको दान देती रहती थीं। मनमें संतानकी कामना ले मेना चैत्रमासके आरम्भसे लेकर सत्ताईस वर्षोंतक प्रतिदिन तत्परतापूर्वक शिवा-देवीकी पूजा और आराधनामें लगी रहीं। वे अष्टमीको उपवास करके नवमीको लड्डू, बलि-सामग्री, पीठी, खीर और गन्ध-पुष्प आदि देवीको भेंट करती थीं। गंगाके किनारे ओषधिप्रस्थमें उमाकी मिट्टीकी मूर्ति बनाकर नाना प्रकारकी वस्तुएँ समर्पित करके उसकी पूजा करती थीं। मेनादेवी कभी निराहार रहतीं, कभी व्रतके नियमोंका पालन करतीं, कभी जल पीकर रहतीं और कभी हवा पीकर ही रह जाती थीं। विशुद्ध तेजसे दमकती हुई दीप्तिमती मेनाने प्रेमपूर्वक शिवामें चित्त लगाये सत्ताईस वर्ष व्यतीत कर दिये। सत्ताईस वर्ष पूरे होनेपर जगन्मयी शंकरकामिनी जगदम्बा उमा अत्यन्त प्रसन्न हुईं। मेनाकी उत्तम भक्तिसे संतुष्ट हो वे परमेश्वरी देवी उनपर अनुग्रह करनेके लिये उनके सामने प्रकट हुईं। तेजोमण्डलके बीचमें विराजमान तथा दिव्य अवयवोंसे संयुक्त उमादेवी प्रत्यक्ष दर्शन दे मेनासे हँसती हुई बोलीं।
देवीने कहा—गिरिराज हिमालयकी रानी महासाध्वी मेना! मैं तुम्हारी तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसे कहो। मेना! तुमने तपस्या, व्रत और समाधिके द्वारा जिस-जिस वस्तुके लिये प्रार्थना की है, वह सब मैं तुम्हें दूँगी। तब मेनाने प्रत्यक्ष प्रकट हुई कालिकादेवीको देखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा।
२५० * संक्षिप्त शिवपुराण *
मेना बोलीं—देवि! इस समय मुझे आपके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है। अतः मैं आपकी स्तुति करना चाहती हूँ। कालिके! इसके लिये आप प्रसन्न हों।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेनाके ऐसा कहनेपर सर्वमोहिनी कालिकादेवीने मनमें अत्यन्त प्रसन्न हो अपनी दोनों बाहोंसे खींचकर मेनाको हृदयसे लगा लिया। इससे उन्हें तत्काल महाज्ञानकी प्राप्ति हो गयी। फिर तो मेनादेवी प्रिय वचनोंद्वारा भक्ति-भावसे अपने सामने खड़ी हुई कालिकाकी स्तुति करने लगीं।
मेना बोलीं—जो महामाया जगत्को धारण करनेवाली चण्डिका, लोकधारिणी तथा सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थोंको देनेवाली हैं, उन महादेवीको मैं प्रणाम करती हूँ। जो नित्य आनन्द प्रदान करनेवाली माया, योगनिद्रा, जगज्जननी तथा सुन्दर कमलोंकी मालासे अलंकृत हैं, उन नित्य-सिद्धा उमादेवीको मैं नमस्कार करती हूँ। जो सबकी मातामही, नित्य आनन्दमयी, भक्तोंके शोकका नाश करनेवाली तथा कल्पपर्यन्त नारियों एवं प्राणियोंकी बुद्धिरूपिणी हैं, उन देवीको मैं प्रणाम करती हूँ। आप यतियोंके अज्ञानमय बन्धनके नाशकी हेतुभूता ब्रह्मविद्या हैं। फिर मुझ-जैसी नारियाँ आपके प्रभावका क्या वर्णन कर सकती हैं। अथर्ववेदकी जो हिंसा (मारण आदिका प्रयोग) है, वह आप ही हैं। देवि! आप मेरे अभीष्ट फलको सदा प्रदान कीजिये। भावहीन (आकाररहित) तथा अदृश्य नित्यानित्य तन्मात्राओंसे आप ही पंचभूतोंके समुदायको संयुक्त करती हैं। आप ही उनकी शाश्वत शक्ति हैं। आपका स्वरूप नित्य है। आप समय-समयपर योगयुक्त एवं समर्थ नारीके रूपमें प्रकट होती हैं। आप ही जगत्की योनि और आधार-शक्ति हैं। आप ही प्राकृत तत्त्वोंसे परे नित्या प्रकृति कही गयी हैं। जिसके द्वारा ब्रह्मके स्वरूपको वशमें किया जाता (जाना जाता) है, वह नित्या विद्या आप ही हैं। मातः! आज मुझपर प्रसन्न होइये। आप ही अग्निके भीतर व्याप्त उग्र दाहिका शक्ति हैं। आप ही सूर्य-किरणोंमें स्थित प्रकाशिका शक्ति हैं। चन्द्रमामें जो आह्लादिका शक्ति है, वह भी आप ही हैं। ऐसी आप चण्डी-देवीका मैं स्तवन और वन्दन करती हूँ। आप स्त्रियोंको बहुत प्रिय हैं। ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारियोंकी ध्येयभूता नित्या ब्रह्मशक्ति
- रुद्रसंहिता * २५१
भी आप ही हैं। सम्पूर्ण जगत्की वांछा तथा श्रीहरिकी माया भी आप ही हैं। जो देवी इच्छानुसार रूप धारण करके सृष्टि, पालन और संहारमयी हो उन कार्योंका सम्पादन करती हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रके शरीरकी भी हेतुभूता हैं, वे आप ही हैं। देवि! आज आप मुझपर प्रसन्न हों। आपको पुनः मेरा नमस्कार है।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेनाके इस प्रकार स्तुति करनेपर दुर्गा कालिकाने पुनः उन मेनादेवीसे कहा—'तुम अपना मनोवांछित वर माँग लो। हिमाचलप्रिये! तुम मुझे प्राणोंके समान प्यारी हो। तुम्हारी जो इच्छा हो, वह माँगो। उसे मैं निश्चय ही दे दूँगी। तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।'
महेश्वरी उमाका यह अमृतके समान मधुर वचन सुनकर हिमगिरिकामिनी मेना बहुत संतुष्ट हुईं और इस प्रकार बोलीं—'शिवे! आपकी जय हो, जय हो। उत्कृष्ट ज्ञानवाली महेश्वरि! जगदम्बिके! यदि मैं वर पानेके योग्य हूँ तो फिर आपसे श्रेष्ठ वर माँगती हूँ। जगदम्बे! पहले तो मुझे सौ पुत्र हों। उन सबकी बड़ी आयु हो। वे बल-पराक्रमसे युक्त तथा ऋद्धि-सिद्धिसे सम्पन्न हों। उन पुत्रोंके पश्चात् मेरे एक पुत्री हो, जो स्वरूप और गुणोंसे सुशोभित होनेवाली हो; वह दोनों कुलोंको आनन्द देनेवाली तथा तीनों लोकोंमें पूजित हो। जगदम्बिके! शिवे! आप ही देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मेरी पुत्री तथा रुद्रदेवकी पत्नी होइये और तदनुसार लीला कीजिये।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेनकाकी बात सुनकर प्रसन्नहृदया देवी उमाने उनके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये मुसकराकर कहा।
देवी बोलीं—पहले तुम्हें सौ बलवान् पुत्र प्राप्त होंगे। उनमें भी एक सबसे अधिक बलवान् और प्रधान होगा, जो सबसे पहले उत्पन्न होगा। तुम्हारी भक्तिसे संतुष्ट हो मैं स्वयं तुम्हारे यहाँ पुत्रीके रूपमें अवतीर्ण होऊँगी और समस्त देवताओंसे सेवित हो उनका कार्य सिद्ध करूँगी।
ऐसा कहकर जगद्धात्री परमेश्वरी कालिका शिवा मेनकाके देखते-देखते वहीं अदृश्य हो गयीं। तात! महेश्वरीसे अभीष्ट वर पाकर मेनकाको भी अपार हर्ष हुआ। उनका तपस्याजनित सारा क्लेश नष्ट हो गया। मुने! फिर कालक्रमसे मेनाके गर्भ रहा और वह प्रतिदिन बढ़ने लगा। समयानुसार उसने एक उत्तम पुत्रको उत्पन्न किया, जिसका नाम मैनाक था। उसने समुद्रके साथ उत्तम मैत्री बाँधी। वह अद्भुत पर्वत नागवधुओंके उपभोगका स्थल बना हुआ है। उसके समस्त अंग श्रेष्ठ हैं। हिमालयके सौ पुत्रोंमें वह सबसे श्रेष्ठ और महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न है। अपनेसे या अपने बाद प्रकट हुए समस्त पर्वतोंमें एकमात्र मैनाक ही पर्वतराजके पदपर प्रतिष्ठित है।
(अध्याय ५)
२५२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
देवी उमाका हिमवान्के हृदय तथा मेनाके गर्भमें आना, गर्भस्था देवीका देवताओंद्वारा स्तवन, उनका दिव्यरूपमें प्रादुर्भाव, माता मेनासे बातचीत तथा नवजात कन्याके रूपमें परिवर्तित होना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तदनन्तर मेना और हिमालय आदरपूर्वक देवकार्यकी सिद्धिके लिये कन्याप्राप्तिके हेतु वहाँ जगज्जननी भगवती उमाका चिन्तन करने लगे। जो प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली हैं, वे महेश्वरी उमा अपने पूर्ण अंशसे गिरिराज हिमवान्के चित्तमें प्रविष्ट हुईं। इससे उनके शरीरमें अपूर्व एवं सुन्दर प्रभा उतर आयी। वे आनन्दमग्न हो अत्यन्त प्रकाशित होने लगे। उस अद्भुत तेजोराशिसे सम्पन्न महामना हिमालय अग्निके समान अधृष्य हो गये थे। तत्पश्चात् सुन्दर कल्याणकारी समयमें गिरिराज हिमालयने अपनी प्रिया मेनाके उदरमें शिवाके उस परिपूर्ण अंशका आधान किया। इस तरह गिरिराजकी पत्नी मेनाने हिमवान्के हृदयमें विराजमान करुणानिधान देवीकी कृपासे सुखदायक गर्भ धारण किया। सम्पूर्ण जगत्की निवासभूता देवीके गर्भमें आनेसे गिरिप्रिया मेना सदा तेजोमण्डलके बीचमें स्थित होकर अधिक शोभा पाने लगीं। अपनी प्रिया शुभांगी मेनाको देखकर गिरिराज हिमवान् बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करने लगे। गर्भमें जगदम्बाके आ जानेसे वे महान् तेजसे सम्पन्न हो गयी थीं। मुने! उस अवसरमें विष्णु आदि देवता और मुनियोंने वहाँ आकर गर्भमें निवास करनेवाली शिवा-देवीकी स्तुति की और तदनन्तर महेश्वरीकी नाना प्रकारसे स्तुति करके प्रसन्नचित्त हुए वे सब देवता अपने-अपने धामको चले गये। जब नवाँ महीना बीत गया और दसवाँ भी पूरा हो चला, तब जगदम्बा कालिकाने समय पूर्ण होनेपर गर्भस्थ शिशुकी जो गति होती है, उसीको धारण किया अर्थात् जन्म ले लिया। उस अवसरपर आद्याशक्ति सती-साध्वी शिवा पहले मेनाके सामने अपने ही रूपसे प्रकट हुईं। वसन्त-ऋतुमें चैत्र मासकी नवमी तिथिको मृगशिरा नक्षत्रमें आधी रातके समय चन्द्रमण्डलसे आकाशगंगाकी भाँति मेनकाके उदरसे देवी शिवाका अपने ही स्वरूपमें प्रादुर्भाव हुआ। उस समय सम्पूर्ण संसारमें प्रसन्नता छा गयी। अनुकूल हवा चलने लगी, जो सुन्दर, सुगन्धित एवं गम्भीर थी। उस समय जलकी वर्षाके साथ फूलोंकी वृष्टि हुई। विष्णु आदि सब देवता वहाँ आये। सबने सुखी होकर प्रसन्नताके साथ जगदम्बाके दर्शन किये और शिवलोकमें निवास करनेवाली दिव्यरूपामहामाया शिवकामिनी मंगलमयी कालिका माताका स्तवन किया।
नारद! जब देवतालोग स्तुति करके चले गये, तब मेनका उस समय प्रकट हुई नील कमल-दलके समान कान्तिवाली श्यामवर्णा देवीको देखकर अतिशय आनन्दका अनुभव करने लगीं। देवीके उस दिव्य रूपका दर्शन करके गिरिप्रिया मेनाको ज्ञान प्राप्त हो गया। वे उन्हें परमेश्वरी समझकर अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो उठीं और संतोषपूर्वक बोलीं।
* रुद्रसंहिता * २५३
मेनाने कहा—जगदम्बे! महेश्वरि! आपने बड़ी कृपा की, जो मेरे सामने प्रकट हुईं। अम्बिके! आपकी बड़ी शोभा हो रही है। शिवे! आप सम्पूर्ण शक्तियोंमें आद्याशक्ति तथा तीनों लोकोंकी जननी हैं। देवि! आप भगवान् शिवको सदा ही प्रिय हैं तथा सम्पूर्ण देवताओंसे प्रशंसित पराशक्ति हैं। महेश्वरि! आप कृपा करें और इसी रूपसे मेरे ध्यानमें स्थित हो जायँ। साथ ही मेरी पुत्रीके अनुरूप प्रत्यक्ष दर्शनीय रूप धारण करें।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! पर्वतपत्नी मेनाकी यह बात सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुई शिवादेवीने उस गिरिप्रियाको इस प्रकार उत्तर दिया।
देवी बोलीं—मेना! तुमने पहले तत्परतापूर्वक मेरी बड़ी सेवा की थी। उस समय तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न हो मैं वर देनेके लिये तुम्हारे निकट आयी। 'वर माँगो' मेरी इस वाणीको सुनकर तुमने जो वर माँगा, वह इस प्रकार है—'महादेवि! आप मेरी पुत्री हो जायँ और देवताओंका हित-साधन करें।' तब मैंने 'तथास्तु' कहकर तुम्हें सादर यह वर दे दिया और मैं अपने धामको चली गयी। गिरिकामिनि! उस वरके अनुसार समय पाकर आज मैं तुम्हारी पुत्री हुई हूँ। आज मैंने जो दिव्य रूपका दर्शन कराया है, इसका उद्देश्य इतना ही है कि तुम्हें मेरे स्वरूपका स्मरण हो जाय; अन्यथा मनुष्य-रूपमें प्रकट होनेपर मेरे विषयमें तुम अनजान ही बनी रहतीं। अब तुम दोनों दम्पति पुत्रीभावसे अथवा दिव्यभावसे मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए मुझमें स्नेह रखो। इससे मेरी उत्तम गति प्राप्त होगी। मैं पृथ्वीपर अद्भुत लीला करके देवताओंका कार्य सिद्ध करूँगी। भगवान् शम्भुकी पत्नी होऊँगी और सज्जनोंका संकटसे उद्धार करूँगी।
ऐसा कहकर जगन्माता शिवा चुप हो गयीं और उसी क्षण माताके देखते-देखते प्रसन्नतापूर्वक नवजात पुत्रीके रूपमें परिवर्तित हो गयीं।
(अध्याय ६)
$$\sim\sim\sim\circ\sim\sim\sim$$
पार्वतीका नामकरण और विद्याध्ययन, नारदका हिमवान्के यहाँ जाना, पार्वतीका हाथ देखकर भावी फल बताना, चिन्तित हुए हिमवान्को आश्वासन दे पार्वतीका विवाह शिवजीके साथ करनेको कहना और उनके संदेहका निवारण करना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेनाके सामने महातेजस्विनी कन्या होकर लौकिक गतिका आश्रय ले वह रोने लगी। उसका मनोहर रुदन सुनकर घरकी सब स्त्रियाँ हर्षसे खिल उठीं और बड़े वेगसे प्रसन्नतापूर्वक वहाँ आ पहुँचीं। नील कमल-दलके समान श्याम कान्तिवाली उस परम तेजस्विनी और मनोरम कन्याको देखकर गिरिराज हिमालय अतिशय आनन्दमें निमग्न हो गये। तदनन्तर सुन्दर मुहूर्तमें मुनियोंके साथ हिमवान्ने अपनी पुत्रीके काली आदि सुखदायक नाम रखे। देवी शिवा गिरिराजके भवनमें
२५४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
दिनोंदिन बढ़ने लगीं—ठीक उसी तरह, जैसे वर्षाके समयमें गंगाजीकी जलराशि और शरद्-ऋतुके शुक्लपक्षमें चाँदनी बढ़ती है। सुशीलता आदि गुणोंसे संयुक्त तथा बन्धुजनोंकी प्यारी उस कन्याको कुटुम्बके लोग अपने कुलके अनुरूप पार्वती नामसे पुकारने लगे। माताने कालिकाको 'उमा' (अरी! तपस्या मत कर) कहकर तप करनेसे रोका था। मुने! इसलिये वह सुन्दर मुखवाली गिरिराजनन्दिनी आगे चलकर लोकमें उमाके नामसे विख्यात हो गयी। नारद! तदनन्तर जब विद्याके उपदेशका समय आया, तब शिवादेवी अपने चित्तको एकाग्र करके बड़ी प्रसन्नताके साथ श्रेष्ठ गुरुसे विद्या पढ़ने लगीं। पूर्वजन्मकी सारी विद्याएँ उन्हें उसी तरह प्राप्त हो गयीं, जैसे शरत्कालमें हंसोंकी पाँत अपने-आप स्वर्गंगाके तटपर पहुँच जाती है और रात्रिमें अपना प्रकाश स्वतः महौषधियोंको प्राप्त हो जाता है। मुने! इस प्रकार मैंने शिवाकी किसी एक लीलाका ही वर्णन किया है। अब अन्य लीलाका वर्णन करूँगा, सुनो।
एक समयकी बात है तुम भगवान् शिवकी प्रेरणासे प्रसन्नतापूर्वक हिमाचलके घर गये। मुने! तुम शिवतत्त्वके ज्ञाता और उनकी लीलाके जानकारोंमें श्रेष्ठ हो। नारद! गिरिराज हिमालयने तुम्हें घरपर आया देख प्रणाम करके तुम्हारी पूजा की और अपनी पुत्रीको बुलाकर उससे तुम्हारे चरणोंमें प्रणाम करवाया। मुनीश्वर! फिर स्वयं ही तुम्हें नमस्कार करके हिमाचलने अपने सौभाग्यकी सराहना की और अत्यन्त मस्तक झुका हाथ जोड़कर तुमसे कहा।
हिमालय बोले—हे मुने नारद! हे ब्रह्मपुत्रोंमें श्रेष्ठ ज्ञानवान् प्रभो! आप सर्वज्ञ हैं और कृपापूर्वक दूसरोंके उपकारमें लगे रहते हैं। मेरी पुत्रीकी जन्मकुण्डलीमें जो गुण-दोष हो, उसे बताइये। मेरी बेटी किसकी सौभाग्यवती प्रिय पत्नी होगी।
ब्रह्माजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ! तुम बातचीतमें कुशल और कौतुकी तो हो ही, गिरिराज हिमालयके ऐसा कहनेपर तुमने कालिकाका हाथ देखा और उसके सम्पूर्ण अंगोंपर विशेषरूपसे दृष्टिपात करके हिमालयसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
नारद बोले—शैलराज और मेना! आपकी यह पुत्री चन्द्रमाकी आदिकलाके समान बढ़ी है। समस्त शुभ लक्षण इसके अंगोंकी शोभा बढ़ाते हैं। यह अपने पतिके लिये अत्यन्त सुखदायिनी होगी और माता-पिताकी भी कीर्ति बढ़ायेगी। संसारकी समस्त नारियोंमें यह परम साध्वी और स्वजनोंको सदा महान् आनन्द देनेवाली होगी। गिरिराज! तुम्हारी पुत्रीके हाथमें
* रुद्रसंहिता * २५५
सब उत्तम लक्षण ही विद्यमान हैं। केवल एक रेखा विलक्षण है, उसका यथार्थ फल सुनो। इसे ऐसा पति प्राप्त होगा, जो योगी, नंग-धड़ंग रहनेवाला, निर्गुण और निष्काम होगा। उसके न माँ होगी न बाप। उसे मान-सम्मानका भी कोई खयाल नहीं रहेगा और वह सदा अमंगल वेष धारण करेगा।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तुम्हारी इस बातको सुन और सत्य मानकर मेना तथा हिमाचल दोनों पति-पत्नी बहुत दुःखित हुए, परंतु जगदम्बा शिवा तुम्हारे ऐसे वचनको सुनकर और लक्षणोंद्वारा उस भावी पतिको शिव मानकर मन-ही-मन हर्षसे खिल उठीं। 'नारदजीकी बात कभी झूठ नहीं हो सकती' यह सोचकर शिवा भगवान् शिवके युगलचरणोंमें सम्पूर्ण हृदयसे अत्यन्त स्नेह करने लगीं। नारद! उस समय मन-ही-मन दुःखी हो हिमवान्ने तुमसे कहा—'मुने! उस रेखाका फल सुनकर मुझे बड़ा दुःख हुआ है। मैं अपनी पुत्रीको उससे बचानेके लिये क्या उपाय करूँ?'
'मुने! तुम महान् कौतुक करनेवाले और वार्तालाप-विशारद हो।' हिमवान्की बात सुनकर अपने मंगलकारी वचनोंद्वारा उनका हर्ष बढ़ाते हुए तुमने इस प्रकार कहा।
नारद बोले—गिरिराज! तुम स्नेहपूर्वक सुनो, मेरी बात सच्ची है। वह झूठ नहीं होगी। हाथकी रेखा ब्रह्माजीकी लिपि है। निश्चय ही वह मिथ्या नहीं हो सकती। अतः शैलप्रवर! इस कन्याको वैसा ही पति मिलेगा, इसमें संशय नहीं। परंतु इस रेखाके कुफलसे बचनेके लिये एक उपाय भी है, उसे प्रेमपूर्वक सुनो। उसे करनेसे तुम्हें सुख मिलेगा। मैंने जैसे वरका निरूपण किया है, वैसे ही भगवान् शंकर हैं। वे सर्वसमर्थ हैं और लीलाके लिये अनेक रूप धारण करते रहते हैं। उनमें समस्त कुलक्षण सद्गुणोंके समान हो जायँगे। समर्थ पुरुषमें कोई दोष भी हो तो वह उसे दुःख नहीं देता। असमर्थके लिये ही वह दुःखदायक होता है। इस विषयमें सूर्य, अग्नि और गंगाका दृष्टान्त सामने रखना चाहिये। इसलिये तुम विवेकपूर्वक अपनी कन्या शिवाको भगवान् शिवके हाथमें सौंप दो। भगवान् शिव सबके ईश्वर, सेव्य, निर्विकार, सामर्थ्यशाली और अविनाशी हैं। वे जल्दी ही प्रसन्न हो जाते हैं। अतः शिवाको ग्रहण कर लेंगे, इसमें संशय नहीं है। विशेषतः वे तपस्यासे वशमें हो जाते हैं। यदि शिवा तप करे तो सब काम ठीक हो जायगा। सर्वेश्वर शिव सब प्रकारसे समर्थ हैं। वे इन्द्रके वज्रका भी विनाश कर सकते हैं। ब्रह्माजी उनके अधीन हैं तथा वे सबको सुख देनेवाले हैं। पार्वती भगवान् शंकरकी प्यारी पत्नी होगी। वह सदा रुद्रदेवके अनुकूल रहेगी; क्योंकि यह महासाध्वी और उत्तम व्रतका पालन करनेवाली है तथा माता-पिताके सुखको बढ़ानेवाली है। यह तपस्या करके भगवान् शिवके मनको अपने वशमें कर लेगी और वे भगवान् भी इसके सिवा किसी दूसरी स्त्रीसे विवाह नहीं करेंगे। इन दोनोंका प्रेम एक-दूसरेके अनुरूप है। वैसा उच्चकोटिका प्रेम न तो किसीका हुआ है, न इस समय है और न आगे होगा। गिरिश्रेष्ठ! इन्हें देवताओंके कार्य करने हैं। उनके जो-जो काम नष्टप्राय हो गये हैं, उन सबका इनके द्वारा पुनः उज्जीवन या उद्धार होगा। अद्रिराज! आपकी कन्याको पाकर ही
| २५६ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
|---|
भगवान् हर अर्द्धनारीश्वर होंगे। इन दोनोंका पुनः हर्षपूर्वक मिलन होगा। आपकी यह पुत्री अपनी तपस्याके प्रभावसे सर्वेश्वर महेश्वरको संतुष्ट करके उनके शरीरके आधे भागको अपने अधिकारमें कर लेगी, उनका अर्धांग बन जायगी। गिरिश्रेष्ठ! तुम्हें अपनी यह कन्या भगवान् शंकरके सिवा दूसरे किसीको नहीं देनी चाहिये। यह देवताओंका गुप्त रहस्य है, इसे कभी प्रकाशित नहीं करना चाहिये।
हिमालयने कहा—ज्ञानी मुने नारद! मैं आपको एक बात बता रहा हूँ, उसे प्रेमपूर्वक सुनिये और आनन्दका अनुभव कीजिये। सुना जाता है, महादेवजी सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करके अपने मनको संयममें रखते हुए नित्य तपस्या करते हैं। देवताओंकी भी दृष्टिमें नहीं आते। देवर्षे! ध्यानमार्गमें स्थित हुए वे भगवान् शम्भु परब्रह्ममें लगाये हुए अपने मनको कैसे हटायेंगे? ध्यान छोड़कर विवाह करनेको कैसे उद्यत होंगे? इस विषयमें मुझे महान् संदेह है। दीपककी लौके समान प्रकाशमान, अविनाशी, प्रकृतिसे परे, निर्विकार, निर्गुण, सगुण, निर्विशेष और निरीह जो परब्रह्म है, वही उनका अपना सदाशिव नामक स्वरूप है। अतः वे उसीका सर्वत्र साक्षात्कार करते हैं, किसी बाह्य—अनात्मवस्तुपर दृष्टि नहीं डालते। मुने! यहाँ आये हुए किंनरोंके मुखसे उनके विषयमें नित्य ऐसी ही बात सुनी जाती है। क्या वह बात मिथ्या ही है। विशेषतः यह बात भी सुननेमें आती है कि भगवान् हरने पूर्वकालमें सतीके समक्ष एक प्रतिज्ञा की थी। उन्होंने कहा था—'दक्षकुमारी प्यारी सती! मैं तुम्हारे सिवा दूसरी किसी स्त्रीका अपनी पत्नी बनानेके लिये न वरण करूँगा न ग्रहण। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।' इस प्रकार सतीके साथ उन्होंने पहले ही प्रतिज्ञा कर ली है। अब सतीके मर जानेपर वे दूसरी किसी स्त्रीको कैसे ग्रहण करेंगे?
यह सुनकर तुम (नारद)-ने कहा—महामते! गिरिराज! इस विषयमें तुम्हें चिन्ता नहीं करनी चाहिये। तुम्हारी यह पुत्री काली ही पूर्वकालमें दक्षकन्या सती हुई थी। उस समय इसीका सदा सर्वमंगलदायी सती नाम था। वे सती दक्षकन्या होकर रुद्रकी प्यारी पत्नी हुई थीं। उन्होंने पिताके यज्ञमें अनादर पाकर तथा भगवान् शंकरका भी अपमान हुआ देख क्रोधपूर्वक अपने शरीरको त्याग दिया था। वे ही सती फिर तुम्हारे घरमें उत्पन्न हुई हैं। तुम्हारी पुत्री साक्षात् जगदम्बा शिवा है। यह पार्वती भगवान् हरकी पत्नी होगी, इसमें संशय नहीं है।
नारद! ये सब बातें तुमने हिमवान्को विस्तारपूर्वक बतायीं। पार्वतीका वह पूर्वरूप और चरित्र प्रीतिको बढ़ानेवाला है। कालीके उस सम्पूर्ण पूर्ववृत्तान्तको तुम्हारे मुखसे सुनकर हिमवान् अपनी पत्नी और पुत्रके साथ तत्काल संदेहरहित हो गये। इसी तरह तुम्हारे मुखसे अपनी उस पूर्वकथाको सुनकर कालीने लज्जाके मारे मस्तक झुका लिया और उसके मुखपर मन्द मुसकानकी प्रभा फैल गयी। गिरिराज हिमालय पार्वतीके उस चरित्रको सुनकर उसके माथेपर हाथ फेरने लगे और मस्तक सूँघकर उसे अपने आसनके पास ही बिठा लिया।
नारद! इसके पश्चात् तुम उसी क्षण