शिव पुराण

शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished850 पृष्ठ
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( २० )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| होना और श्रीकृष्णका उनसे स्तुतिपूर्वक वरदान माँगना... | ५८१ | ऋषियोंद्वारा दर्शन तथा मस्तकपर अंजलि बाँधकर स्तवन किया जाना... | ६६६ |
| ११५- शुभ कर्म करनेवाले प्राणीके यमपुरीमें जानेपर यमराजद्वारा उसे स्वागतपूर्वक आसन देकर पाद्य और अर्घ्य दिया जाना... | ५८५ | १२६- ब्रह्माद्वारा छोड़े गये सूर्यतुल्य तेजस्वी मनोमय चक्रका पीछा करते हुए उसके शीर्ण होनेके स्थान (नैमिषारण्य)-में मुनियोंका जाना ..... | ६७० |
| ११६- क्रूर कर्म करनेवालेका यमराजको भयंकर रूपमें देखना... | ५८५ | १२७- नैमिषारण्यमें दीर्घसत्रके अन्तमें मुनियोंके पास वायुदेवताका आगमन तथा महायज्ञके समाप्त होनेपर वे क्या करना चाहते हैं—इस सम्बन्धमें मुनियोंसे उनका प्रश्न... | ६७१ |
| ११७- शिवसे कालचक्रके सम्बन्धमें पार्वतीका प्रश्न पूछना ......... | ५९७ | १२८- ब्रह्माजीके द्वारा शिवके अर्द्धनारीश्वररूपकी स्तुति... | ६८४ |
| ११८- राजा सुरथके अपने आश्रमपर आनेपर मुनीश्वर मेधाका मीठे वचन, भोजन और आसनद्वारा उनका आदर-सत्कार करना....... | ६०५ | १२९- ब्रह्माजीकी तपस्यासे प्रसन्न होकर महादेवजीका अपने शरीरके वामभागसे देवी रुद्राणीको प्रकट करना और ब्रह्माद्वारा सर्वलोकमहेश्वरकी स्तुति... | ६८७ |
| ११९- राजा सुरथका वैश्य समाधिको साथ लेकर मेधा मुनिके पास आना तथा उनसे अपने और वैश्यके मोहपाशको काटनेकी प्रार्थना .. | ६०६ | १३०- महादेवजी और पार्वतीजीका परस्पर बातचीतके बीचमें ही देवीद्वारा आज्ञा दिये जानेपर एक सखीका देवीद्वारा ही शंकरके लिये भेंटस्वरूप लाये गये व्याघ्रको लाकर उनके सामने खड़ा कर देना... | ६९६ |
| १२०- जगज्जननी महाविद्याका त्रैलोक्य-मोहिनी शक्तिके रूपमें प्राकट्य... | ६०६ | १३१- भगवान् विष्णुके अनुरोधपर शिवका उमासहित इन्द्रके रूपमें ऐरावतपर आसीन होकर उपमन्यु मुनिके तपोवनमें जाना तथा मुनिका मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम करना... ......... | ७१५ |
| १२१- दैत्य शुम्भासुरके दूत दानवशिरोमणि सुग्रीवका हिमालयपर देवीके पास आकर शुम्भका संदेश-निवेदन... | ६१२ | १३२- देवी पार्वतीके साथ वृषभपर आरूढ़ हुए महादेवजीका दर्शनकर उपमन्युका भक्तिविनम्र चित्तसे पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़ जाना ... | ७१७ |
| १२२- सच्चिदानन्दस्वरूपिणी शिवप्रिया उमाका वर, पाश, अंकुश और अभय धारणकर प्रकट होना तथा देवताओंद्वारा भक्तिभावसे उनकी स्तुति करना... | ६१७ | १३३- नैमिषारण्यनिवासी ऋषियोंका वायुदेवसे श्रीकृष्ण और उपमन्युके मिलन तथा श्रीकृष्णके पाशुपत ज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग पूछना और वायुदेवका उसे सुनाना........... | ७१९ |
| १२३- देवताओंकी व्याकुल प्रार्थना सुनकर कृपामयी देवीका चारों हाथोंमें क्रमशः धनुष-बाण, कमल तथा अनेक प्रकारके फल-मूल लिये हुए प्रकट होना और प्रजाजनोंको कष्ट उठाते देखकर नौ दिन और नौ रात रोते रहना ... | ६१९ | १३४- उपमन्युद्वारा श्रीकृष्णको पाशुपत ज्ञानका उपदेश.......................................................... | ७२१ |
| १२४- मेरुके दक्षिण शिखर—कुमारशृंगमें कुमार स्कन्दका दर्शन और पूजनकर महामुनि वामदेवद्वारा उनका स्तवन... | ६२६ | ||
| १२५- सुन्दर रमणीय मेरुशिखरपर जाकर ब्रह्माजीका |
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