शिव पुराण

शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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( १९ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| ९५- अर्जुनद्वारा बाण न लौटाये जानेपर किरात-वेषधारी शिवका उससे भीषण संग्राम छेड़ना. | ४८९ |
| ९६- शिवजीका अर्जुनपर प्रसन्न होकर उसे पाशुपत नामक अस्त्र प्रदान करना... | ४९२ |
| ९७- अत्रिपत्नी अनसूयापर गंगाजीकी कृपा तथा उसके द्वारा गंगाजीको अपना वर्षभरका किया हुआ पुण्य अर्पण किया जाना तथा गंगाजीका उसके परिणामस्वरूप काशीमें स्थिररूपसे निवास करनेका आश्वासन देना...... | ५०० |
| ९८- बालविधवा ब्राह्मणपत्नीपर मूढ़ नामक मायावी दुष्ट असुरकी कुदृष्टि और संयोग-याचना तथा शिवद्वारा प्रकट होकर दैत्यराजको तत्काल भस्म कर दिया जाना और ब्राह्मणीद्वारा शिवकी स्तुति......................................... | ५०२ |
| ९९- रोहिणीमें ही अधिक आसक्त होनेके कारण चन्द्रमाको क्षयरोगसे ग्रस्त होनेका दक्षद्वारा शाप तथा रोगके शमनार्थ चन्द्रमाका शिवलिंगकी स्थापना कर प्रभासक्षेत्रमें लगातार खड़े होकर मृत्युंजयमन्त्रसे भगवान् वृषभध्वजका पूजन तथा शिवका प्रसन्न होकर चन्द्रमाको प्रत्यक्ष दर्शन देना और चन्द्रमाद्वारा क्षयरोग-निवारणकी प्रार्थना... | ५०४ |
| १००- अवन्तिपर दूषण असुरकी चढ़ाईसे क्षुब्ध ब्राह्मणोंको शिवपर भरोसा रखनेके लिये कहनेपर शिवलिंगके पूजनमें ध्यानस्थ वेद-प्रियके चारों पुत्रों—देवप्रिय आदिको मार डालनेका असुरका अपनी सेनाको आदेश और शिवलिंगके स्थानके ही गड्ढेसे महाकाल शिवका प्रकट होकर दैत्यको भस्म कर देना................................................ | ५०७ |
| १०१- वानरराज हनुमान्जीका प्रकट होकर गोपकुमार श्रीकर, राजा चन्द्रसेन तथा अन्य राजाओंको कृपादृष्टिसे देखना................ | ५१० |
| १०२- विन्ध्याचलकी तपस्यासे प्रसन्न होकर शिवजीका योगियोंके लिये भी दुर्लभरूपमें प्रकट होना तथा देवता और निर्मल अन्तःकरणवाले ऋषियोंका वहाँ आकर उनकी पूजा करके स्थिररूपसे वहीं निवास करनेकी प्रार्थना करना....................................... | ५१२ |
| १०३- नर-नारायणकी पार्थिवलिंग-पूजासे प्रसन्न होकर शिवका प्रकट हो जाना तथा दोनोंका उनसे हिमालयके केदारतीर्थमें स्वयंज्योतिर्लिंगके रूपमें स्थित होनेका अनुरोध... | ५१३ |
| १०४- कामरूप देशके राजा सुदक्षिणके पार्थिवलिंग-पूजनमें राक्षस भीमका विघ्न डालना तथा |
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| शिवका उस लिंगसे भीमेश्वररूपमें प्रकट होकर राक्षससे युद्ध करना और नारदजीकी प्रार्थनापर समस्त राक्षसों और भीमको हुंकारमात्रसे भस्म कर डालना................ | ५१३ |
| १०५- रुद्रद्वारा भगवान् शिवसे काशीपुरीको अपनी राजधानी बनाकर उमासहित वहीं विराजमान होनेके लिये प्रार्थना.................................. | ५१८ |
| १०६- पत्नीसहित महर्षि गौतमकी आराधनासे संतुष्ट होकर भगवान् शिवका शिवा और प्रमथगणोंके साथ प्रकट होना तथा गौतमद्वारा उनका स्तवन.............................................. | ५२६ |
| १०७- भगवान् शिवसे महर्षि गौतमकी गंगा-याचना तथा शिवदत्त गंगा-जलका स्त्रीरूप धारण करके खड़ा होना, देवता आदिका आकर गंगाजीसे तथा शिवसे वहीं निवास करनेकी प्रार्थना करना और गंगा तथा शिवका क्रमशः गौतमी और त्र्यम्बकेश्वरके रूपमें वहाँ निवास... | ५२७ |
| १०८- देवताओं, ऋषियोंके सान्निध्यमें रावणकी अपनी पत्नी मन्दोदरीसहित वैद्यनाथ शिव-लिंगकी पूजा......................................... | ५२९ |
| १०९- राक्षसी दारुकाकी स्तुतिसे देवी पार्वतीका प्रसन्न हो जाना तथा उसके द्वारा वंशकी रक्षाका वरदान माँगनेपर उनका शिवसे अनुरोध करना कि यही राक्षसोंके राज्यका शासन करे.. | ५३२ |
| ११०- श्रीरामकी पूजासे प्रसन्न होकर शिवका वामांगभूता पार्वतीसहित प्रकट होकर विजय-सूचक वर देना तथा उनके ज्योतिर्लिंग (रामेश्वर)-के रूपमें स्थित होनेके लिये श्रीरामकी प्रार्थना... | ५३३ |
| १११- घुश्माके सामने ज्योतिःस्वरूप महेश्वर शिवका प्रकट होना और घुश्माकी अपनी सौत सुदेहाकी प्राणरक्षाकी उनसे प्रार्थना... | ५३६ |
| ११२- बिल्वके पेड़पर बैठे हुए गुरुद्रुह भीलका मृगीपर बाण-संधान करना तथा अनजानमें उसके हाथके धक्केसे पेड़के नीचे शिवलिंगपर थोड़े-से जल और बिल्वपत्रका गिर पड़ना... | ५६९ |
| ११३- अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार मृग और दोनों मृगियोंका गुरुद्रुह भीलके पास आ पहुँचना तथा शिवपूजाके प्रभावसे दुर्लभ ज्ञानसे सम्पन्न भीलका परोपकारमें लगे उन पशुओंकी दशा देखकर अपने-आपको धिक्कारना और उन्हें जानेकी आज्ञा देना... | ५७२ |
| ११४- पुत्रकी प्राप्तिके लिये श्रीकृष्णका तप करना और उनके तपसे प्रसन्न होकर पार्वती, कार्तिकेय तथा गणेशके सहित शिवका प्रकट |