शिव पुराण

शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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( १८ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
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| पार्वतीजीको प्रसन्न करनेके लिये गणेशको सर्वाध्यक्ष घोषित करना तथा शंकरका उन्हें सम्पूर्ण गणोंका अध्यक्ष बनाना... | ३६१ | वर देना तथा कमलोंकी बनी हुई अपनी शिरोमालाको उतारकर उसके गलेमें कृपापूर्वक डाल देना... | ४५१ |
| ७६- पृथ्वी-परिक्रमा करनेमें अपने-आपको असमर्थ पाकर गणेशजीद्वारा अपने माता-पिताको दो आसनोंपर बिठाकर उनकी सात बार प्रदक्षिणाकर अपने विवाहकी प्रार्थना करना... | ३६५ | ८७- शिवजीका प्रकट होकर बालक गृहपतिको अभय-दान देना तथा अग्निपदका भागी बनाना... | ४६० |
| ७७- प्रजापति विश्वरूपकी सुन्दर कन्याओं-सिद्धि और बुद्धिके साथ विश्वकर्माद्वारा गणेशजीका विवाह-संस्कार सम्पन्न कराना... | ३६७ | ८८- रुद्रके अंशभूत कपिश्रेष्ठ हनुमान्का सूर्यके निकट जाकर उनसे सारी विद्याएँ सीखना... | ४६४ |
| ७८- तारकके तीनों पुत्र-तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमलाक्षकी तपस्यासे अत्यन्त संतुष्ट हुए महायशस्वी ब्रह्माजीका वर देनेके लिये उनके सामने प्रकट होना और उन तीनोंका अंजलि बाँधकर पितामहके चरणोंमें प्रणिपात करना... | ३६९ | ८९- भगवान् शिवका यतिरूप धारण कर भील आहुक और उसकी पत्नी आहुकाकी परीक्षा लेना तथा पतिके हिंसक पशुओंद्वारा रातमें खा लिये जानेपर प्रातःकाल यतिसे चिता जलवाकर भीलनीके उसमें प्रवेश करते ही शिवका अपने साक्षात् रूपमें प्रकट होकर वर देना... | ४७२ |
| ७९- देवराज इन्द्र, विष्णु आदिसहित देवगणोंकी त्रिपुरवासी दैत्योंके नाशके लिये भगवान् शिवकी स्तुति तथा शिवका वृषभपर सवार होकर प्रकट हो जाना और नन्दीश्वरकी पीठसे उतरकर विष्णुका आलिंगनकर नन्दीपर हाथ टेककर खड़े हो जाना... | ३७५ | ९०- देवताओं तथा बृहस्पतिजीको साथ लेकर शिवका दर्शन करनेके लिये इन्द्रका कैलास-पर्वतपर जाना तथा बीचमें ही अवधूत वेष धारण कर शिवद्वारा परीक्षा लिये जानेपर इन्द्रका उनपर वज्रसे प्रहार करना, शिवके नेत्रसे रोषवश अग्निका निकलना और बृहस्पतिकी प्रार्थनापर शिवका उस तेजको क्षारसमुद्रमें फेंकना और उसका बालक सिन्धुपुत्र जलन्धरके रूपमें परिणत हो जाना... | ४७६ |
| ८०- शिवजीद्वारा धनुषकी डोरी चढ़ाकर उसपर पाशुपतास्त्र नामक बाणका संधान कर उसे त्रिपुरपर छोड़नेका विचार करना... | ३८२ | ९१- ब्राह्मणपत्नीके सामने भिक्षुरूपमें शिवका प्रकट होकर उसे विदर्भदेशके सत्यरथ राजा, उनकी पत्नी तथा उनके नवजात शिशुके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाकर बालकके पालन-पोषणका आदेश देना तथा ब्राह्मणीको अपने उत्तम स्वरूपका दर्शन कराना... | ४७९ |
| ८१- ब्रह्माजीके आदेशसे शंखचूड़का बदरिकाश्रममें जाकर तपस्यामें लीन तुलसीसे मधुर तथा सकाम संलाप करना... | ३८८ | ९२- व्यासजीका अर्जुनको शुक्रविद्याका उपदेश देना तथा पार्थिवलिंगके पूजनका विधान बताकर उसे इन्द्रकीलपर्वतपर जाकर जाह्नवीके तटपर बैठकर तप करनेकी प्रेरणा देना... | ४८३ |
| ८२- शिवजीकी इच्छासे विष्णुका वृद्ध ब्राह्मणका वेष धारणकर शंखचूड़से उग्र कवचकी याचना करना तथा शंखचूड़द्वारा कवचका प्रदान किया जाना... | ४०० | ९३- इन्द्रकीलपर्वतपर गंगाजीके समीप एक मनोरम स्थानपर अर्जुनद्वारा तेजोरराशि शंकरजीका ध्यान करना तथा परीक्षा करनेके लिये ब्रह्मचारी ब्राह्मणके वेषमें आये हुए इन्द्रका अपने स्वरूपमें प्रकट होना और उसे शंकरका मन्त्र बताकर जप करनेकी आज्ञा देना... | ४८४ |
| ८३- हिरण्याक्षद्वारा पुत्रप्राप्तिके लिये घोर तपका अनुष्ठान तथा गौरीके साथ विराजमान शंकरका प्रसन्नतापूर्वक उसे पुत्ररूपमें अन्धकासुरको प्रदान करना... | ४०६ | ९४- मूक नामक दैत्यका शूकररूप धारण करके अर्जुनके पास आना तथा किरातवेषमें शिवजीका अर्जुनकी रक्षाके लिये आगे जाना और शिव तथा अर्जुनके बाणोंसे मरकर शूकरका भूतलपर गिर पड़ना तथा देवताओंद्वारा जय-जयकारपूर्वक पुष्पवृष्टि और स्तुति किया जाना... | ४८७ |
| ८४- युद्धमें श्रीकृष्णद्वारा दैत्यराज बाणासुरकी बहुत-सी भुजाओंका सुदर्शनचक्रसे काटा जाना तथा उसका सिर काट लेनेके लिये उद्यत होनेपर उन्हें शंकरजीका समझाना... | ४३३ | ||
| ८५- शिवका प्रसन्नतापूर्वक पूर्णसच्चिदानन्दकी कामदामूर्तिमें प्रविष्ट होकर अर्धनारी-नरके रूपसे ब्रह्माके निकट प्रकट होना तथा ब्रह्माजीका उन्हें दण्डवत्-प्रणाम करना... | ४४३ | ||
| ८६- उग्र तपस्यामें रत नन्दीको वृषभध्वज शिवका |