भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

* रुद्रसंहिता * २५९

मनको यत्नपूर्वक एकाग्र करके उन्होंने समाधि लगा ली, जो समस्त दुःखोंका नाश करनेवाली है। समाधिमें वे अविनाशी स्वरूपका दर्शन करने लगे। इस तरह तीनों गुणोंसे रहित हो वे भगवान् शिव चिरकालतक सुस्थिरभावसे समाधि लगाये बैठे रहे। वे प्रभु स्वयं ही मायाके अधिपति निर्विकार परब्रह्म हैं। तदनन्तर जब असंख्य वर्ष व्यतीत हो गये, तब उन्होंने समाधि छोड़ी। उसके बाद तुरंत ही जो चरित्र हुआ, उसे मैं तुम्हें बताता हूँ। भगवान् शिवके ललाटसे उस समय श्रमजनित पसीनेकी एक बूँद पृथ्वीपर गिरी और तत्काल एक शिशुके रूपमें परिणत हो गयी। मुने! उस बालकके चार भुजाएँ थीं, शरीरकी कान्ति लाल थी और आकार मनोहर था। दिव्य द्युतिसे दीप्तिमान् वह शोभाशाली बालक अत्यन्त दुःसह तेजसे सम्पन्न था, तथापि उस समय लोकाचार-परायण परमेश्वर शिवके आगे वह साधारण शिशुकी भाँति रोने लगा। यह देख पृथ्वी भगवान् शंकरसे भय मान उत्तम बुद्धिसे विचार करनेके पश्चात् सुन्दरी स्त्रीका रूप धारण करके वहीं प्रकट हो गयीं। उन्होंने उस सुन्दर बालकको तुरंत उठाकर अपनी गोदमें रख लिया और अपने ऊपर प्रकट होनेवाले दूधको ही स्तन्यके रूपमें उसे पिलाने लगीं। उन्होंने स्नेहसे उसका मुँह चूमा और अपना ही बालक मान हँस-हँसकर उसे खेलाने लगीं। परमेश्वर शिवका हितसाधन करनेवाली पृथ्वीदेवी सच्चे भावसे स्वयं उसकी माता बन गयीं।

संसारकी सृष्टि करनेवाले, परम कौतुकी एवं विद्वान् अन्तर्यामी शम्भु वह चरित्र देखकर हँस पड़े और पृथ्वीको पहचानकर उनसे बोले—'धरणि! तुम धन्य हो! मेरे इस पुत्रका प्रेमपूर्वक पालन करो। यह श्रेष्ठ शिशु मुझ महातेजस्वी शम्भुके श्रमजल (पसीने)-से तुम्हारे ही ऊपर उत्पन्न हुआ है। वसुधे! यह प्रियकारी बालक यद्यपि मेरे श्रमजलसे प्रकट हुआ है, तथापि तुम्हारे नामसे तुम्हारे ही पुत्रके रूपमें इसकी ख्याति होगी। यह सदा त्रिविध तापोंसे रहित होगा। अत्यन्त गुणवान् और भूमि देनेवाला होगा। यह मुझे भी सुख प्रदान करेगा। तुम इसे अपनी रुचिके अनुसार ग्रहण करो।'

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर भगवान् शिव चुप हो गये। उनके हृदयसे विरहका प्रभाव कुछ कम हो गया। उनमें विरह क्या था, वे लोकाचारका पालन कर रहे थे। वास्तवमें सत्पुरुषोंके प्रिय श्रीरुद्रदेव निर्विकार परमात्मा ही हैं। शिवकी उपर्युक्त आज्ञाको शिरोधार्य करके पुत्रसहित पृथ्वीदेवी शीघ्र ही अपने स्थानको चली गयीं। उन्हें आत्यन्तिक सुख मिला। वह बालक 'भौम' नामसे प्रसिद्ध हो युवा होनेपर तुरंत काशी चला गया और वहाँ उसने दीर्घकालतक भगवान् शंकरकी सेवा की। विश्वनाथजीकी कृपासे ग्रहकी पदवी पाकर वे भूमिकुमार शीघ्र ही श्रेष्ठ एवं दिव्यलोकमें चले गये, जो शुक्रलोकसे परे है।

(अध्याय ९-१०)


789 संक्षिप्त शिवपुराण—9 C