भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६० * संक्षिप्त शिवपुराण *

भगवान् शिवका गंगावतरण तीर्थमें तपस्याके लिये आना, हिमवान्‌द्वारा उनका स्वागत, पूजन और स्तवन तथा भगवान् शिवकी आज्ञाके अनुसार उनका उस स्थानपर दूसरोंको न जाने देनेकी व्यवस्था करना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! हिमवान्‌की पुत्री लोकपूजित शक्तिस्वरूपा पार्वती हिमालयके घरमें रहकर बढ़ने लगीं। जब उनकी अवस्था आठ वर्षकी हो गयी, तब सतीके विरहसे कातर हुए शम्भुको उनके जन्मका समाचार मिला। नारद! उस अद्भुत बालिका पार्वतीको हृदयमें रखकर वे मन-ही-मन बड़े आनन्दका अनुभव करने लगे। इसी बीचमें लौकिक गतिका आश्रय ले शम्भुने अपने मनको एकाग्र करनेके लिये तप करनेका विचार किया। नन्दी आदि कुछ शान्त पार्षदोंको साथ ले वे हिमालयके उत्तम शिखरपर गंगावतार* नामक तीर्थमें चले आये, जहाँ पूर्वकालमें ब्रह्मधामसे च्युत होकर समस्त पापराशिका विनाश करनेके लिये चली हुई परम पावनी गंगा पहले-पहल भूतलपर अवतीर्ण हुई थीं। जितेन्द्रिय हरने वहीं रहकर तपस्या आरम्भ की। वे आलस्यरहित हो चेतन, ज्ञानस्वरूप, नित्य, ज्योतिर्मय, निरामय, जगन्मय, चिदानन्द-स्वरूप, द्वैतहीन तथा आश्रयरहित अपने आत्मभूत परमात्माका एकाग्रभावसे चिन्तन करने लगे। भगवान् हरके ध्यानपरायण होनेपर नन्दी-भृंगी आदि कुछ अन्य पार्षदगण भी ध्यानमें तत्पर हो गये। उस समय कुछ ही प्रमथगण परमात्मा शम्भुकी सेवा करते थे। वे सब-के-सब मौन रहते और एक शब्द भी नहीं बोलते थे। कुछ द्वारपाल हो गये थे।

इसी समय गिरिराज हिमवान् उस ओषधि-बहुल शिखरपर भगवान् शंकरका शुभागमन सुनकर उनके प्रति आदरकी भावनासे वहाँ आये। आकर सेवकों-सहित गिरिराजने भगवान् रुद्रको प्रणाम किया, उनकी पूजा की और अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़ उनका सुन्दर स्तवन किया। फिर हिमालयने कहा—'प्रभो! मेरे सौभाग्यका उदय हुआ है, जो आप यहाँ पधारे हैं। आपने मुझे सनाथ कर दिया। क्यों न हो, महात्माओंने यह ठीक ही


* गंगोत्तरी।

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