भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 850 में से

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पृष्ठ 278

२६४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

पार्वती और शिवका दार्शनिक संवाद, शिवका पार्वतीको अपनी सेवाके लिये आज्ञा देना तथा पार्वतीद्वारा भगवान्‌की प्रतिदिन सेवा

भवानीने कहा—योगिन्! आपने तपस्वी होकर गिरिराजसे यह क्या बात कह डाली? प्रभो! आप ज्ञानविशारद हैं, तो भी अपनी बातका उत्तर मुझसे सुनिये। शम्भो! आप तपःशक्तिसे सम्पन्न होकर ही बड़ा भारी तप करते हैं। उस शक्तिके कारण ही आप महात्माको तपस्या करनेका विचार हुआ है। सभी कर्मोंको करनेकी जो वह शक्ति है, उसे ही प्रकृति जानना चाहिये। प्रकृतिसे ही सबकी सृष्टि, पालन और संहार होते हैं। भगवन्! आप कौन हैं? और सूक्ष्म प्रकृति क्या है? इसका विचार कीजिये। प्रकृतिके बिना लिंगरूपी महेश्वर कैसे हो सकते हैं? आप सदा प्राणियोंके लिये जो अर्चनीय, वन्दनीय और चिन्तनीय हैं, वह प्रकृतिके ही कारण हैं। इस बातको हृदयसे विचारकर ही आपको जो कहना हो, वह सब कहिये।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! पार्वतीजीके इस वचनको सुनकर महती लीला करनेमें लगे हुए प्रसन्नचित्त महेश्वर हँसते हुए बोले।

महेश्वरने कहा—मैं उत्कृष्ट तपस्याद्वारा ही प्रकृतिका नाश करता हूँ और तत्त्वतः प्रकृतिरहित शम्भुके रूपमें स्थित होता हूँ। अतः सत्पुरुषोंको कभी या कहीं प्रकृतिका संग्रह नहीं करना चाहिये। लोकाचारसे दूर एवं निर्विकार रहना चाहिये।

नारद! जब शम्भुने लौकिक व्यवहारके अनुसार यह बात कही, तब काली मन-ही-मन हँसकर मधुर वाणीमें बोलीं।

कालीने कहा—कल्याणकारी प्रभो! योगिन्! आपने जो बात कही है, क्या वह वाणी प्रकृति नहीं है? फिर आप उससे परे क्यों नहीं हो गये? (क्यों प्रकृतिका सहारा लेकर बोलने लगे?) इन सब बातोंको विचार करके तात्त्विक दृष्टिसे जो यथार्थ बात हो, उसीको कहना चाहिये। यह सब कुछ सदा प्रकृतिसे बँधा हुआ है। इसलिये आपको न तो बोलना चाहिये और न कुछ करना ही चाहिये; क्योंकि कहना और करना—सब व्यवहार प्राकृत ही है। आप अपनी बुद्धिसे इसको समझिये। आप जो कुछ सुनते, खाते, देखते और करते हैं, वह सब प्रकृतिका ही कार्य है। झूठे वाद-विवाद करना व्यर्थ है। प्रभो! शम्भो! यदि आप प्रकृतिसे परे हैं तो इस समय इस हिमवान् पर्वतपर आप तपस्या किसलिये करते हैं? हर! प्रकृतिने आपको निगल लिया है। अतः आप अपने स्वरूपको नहीं जानते। ईश! आप यदि अपने स्वरूपको जानते हैं तो किसलिये तप करते हैं? योगिन्! मुझे आपके साथ वाद-विवाद करनेकी क्या आवश्यकता है? प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध होनेपर विद्वान् पुरुष अनुमान प्रमाणको नहीं मानते। जो कुछ प्राणियोंकी इन्द्रियोंका विषय होता है, वह सब ज्ञानी पुरुषोंको बुद्धिसे विचारकर प्राकृत ही मानना चाहिये। योगीश्वर! बहुत कहनेसे क्या लाभ? मेरी उत्तम बात सुनिये। मैं प्रकृति हूँ। आप पुरुष हैं। यह सत्य है, सत्य है। इसमें संशय नहीं है। मेरे अनुग्रहसे ही

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