भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 279
  • रुद्रसंहिता * २६५

आप सगुण और साकार माने गये हैं। मेरे बिना तो आप निरीह हैं। कुछ भी नहीं कर सकते हैं। आप जितेन्द्रिय होनेपर भी प्रकृतिके अधीन हो सदा नाना प्रकारके कर्म करते रहते हैं। फिर निर्विकार कैसे हैं? और मुझसे लिप्त कैसे नहीं? शंकर! यदि आप प्रकृतिसे परे हैं और यदि आपका यह कथन सत्य है तो आपको मेरे समीप रहनेपर भी डरना नहीं चाहिये।

ब्रह्माजी कहते हैं—पार्वतीका यह सांख्य-शास्त्रके अनुसार कहा हुआ वचन सुनकर भगवान् शिव वेदान्तमतमें स्थित हो उनसे यों बोले।

श्रीशिवने कहा—सुन्दर भाषण करनेवाली गिरिजें! यदि तुम सांख्य-मतको धारण करके ऐसी बात कहती हो तो प्रतिदिन मेरी सेवा करो; परंतु वह सेवा शास्त्रनिषिद्ध नहीं होनी चाहिये।

गिरिजासे ऐसा कहकर भक्तोंपर अनुग्रह और उनका मनोरंजन करनेवाले भगवान् शिव हिमवान्‌से बोले।

शिवने कहा—गिरिराज! मैं यहीं तुम्हारे अत्यन्त रमणीय श्रेष्ठ शिखरकी भूमिपर उत्तम तपस्या तथा अपने आनन्दमय परमार्थस्वरूपका विचार करता हुआ विचरूँगा। पर्वतराज! आप मुझे यहाँ तपस्या करनेकी अनुमति दें। आपकी अनुज्ञाके बिना कोई तप नहीं किया जा सकता।

देवाधिदेव शूलधारी भगवान् शिवका यह कथन सुनकर हिमवान्‌ने उन्हें प्रणाम करके कहा—'महादेव! देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत् तो आपका ही है। मैं तुच्छ होकर आपसे क्या कहूँ?'

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! गिरिराज हिमवान्‌के ऐसा कहनेपर लोककल्याणकारी भगवान् शंकर हँस पड़े और आदरपूर्वक उनसे बोले—'अब तुम जाओ।' शंकरकी आज्ञा पाकर हिमवान् अपने घर लौट गये। वे गिरिजाके साथ प्रतिदिन उनके दर्शनके लिये आते थे। काली अपने पिताके बिना भी दोनों सखियोंके साथ नित्य शंकरजीके पास जातीं और भक्तिपूर्वक उनकी सेवामें लगी रहतीं। नन्दीश्वर आदि कोई भी गण उन्हें रोकता नहीं था। तात! महेश्वरके आदेशसे ही ऐसा होता था। प्रत्येक गण पवित्रतापूर्वक रहकर उनकी आज्ञाका पालन करता था। जो विचार करनेसे परस्पर अभिन्न सिद्ध होते हैं, उन्हीं शिवा और शिवने सांख्य और वेदान्त-मतमें स्थित हो जो कल्याणदायक संवाद किया, वह सर्वदा सुख देनेवाला है। वह संवाद मैंने यहाँ कह सुनाया। इन्द्रियातीत भगवान् शंकरने गिरिराजके कहनेसे उनका गौरव मानकर उनकी पुत्रीको अपने पास रहकर सेवा करनेके लिये स्वीकार कर लिया।

काली अपनी दो सखियोंके साथ चन्द्रशेखर महादेवजीकी सेवाके लिये प्रतिदिन आती-जाती रहती थीं। वे भगवान् शंकरके चरण धोकर उस चरणामृतका पान करती थीं। आगसे तपाकर शुद्ध किये हुए वस्त्रसे (अथवा गरम जलसे धोये हुए वस्त्रके द्वारा) उनके शरीरका मार्जन करतीं, उसे मलती-पोंछती थीं। फिर सोलह उपचारोंसे विधिवत् हरकी पूजा करके बारंबार उनके चरणोंमें प्रणाम करनेके पश्चात् प्रतिदिन पिताके घर लौट जाती रहीं। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार