भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* रुद्रसंहिता * २८१

मुने! इन्द्रादि देवताओंकी बात सुनकर लक्ष्मीपति श्रीहरिने उन सबको सान्त्वना देते हुए कहा।

श्रीहरि बोले—हे देवताओ! तुम सब लोग प्रेम और आदरके साथ मेरी बात सुनो। भगवान् शिव देवताओंके स्वामी तथा उनके भयका नाश करनेवाले हैं। वे तुम्हें नहीं दग्ध करेंगे। तुम सब लोग बड़े चतुर हो। अतः तुम्हें शम्भुको कल्याणकारी मानकर हमारे साथ सबके उत्तम प्रभु उन महादेवजीकी शरणमें चलना चाहिये। भगवान् शिव पुराणपुरुष, सर्वेश्वर, वरणीय, परात्पर, तपस्वी और परमात्मस्वरूप हैं; अतः हमें उनकी शरणमें अवश्य चलना चाहिये।

प्रभावशाली विष्णुके ऐसा कहनेपर सब देवता उनके साथ पिनाकपाणि शिवका दर्शन करनेके लिये गये। मार्गमें पार्वतीका आश्रम पहले पड़ता था। अतः उन गिरिराजनन्दिनीकी तपस्या देखनेके लिये विष्णु आदि सब देवता कौतूहलपूर्वक उनके आश्रमपर गये। पार्वतीके श्रेष्ठ तपको देखकर सब देवता उनके उत्तम तेजसे व्याप्त हो गये। उन्होंने तपस्यामें लगी हुई उन तेजोमयी जगदम्बाको नमस्कार किया और साक्षात् सिद्धिस्वरूपा शिवादेवीके तपकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए वे सब देवता उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् वृषभध्वज विराजमान थे। मुने! वहाँ पहुँचकर सब देवताओंने पहले तुम्हें उनके पास भेजा और स्वयं वे मदनदहनकारी भगवान् हरसे दूर ही खड़े रहे। वे वहींसे यह देखते रहे कि भगवान् शिव कुपित हैं या प्रसन्न। नारद! तुम तो सदा निर्भय रहनेवाले और विशेषतः शिवके भक्त हो। अतः तुमने भगवान् शिवके स्थानपर जाकर उन्हें सर्वथा प्रसन्न देखा। फिर वहाँसे लौटकर तुम श्रीविष्णु आदि सब देवताओंको भगवान् शिवके स्थानपर ले गये। वहाँ पहुँचकर विष्णु आदि सब देवताओंने देखा, भक्तवत्सल भगवान् शिव सुखपूर्वक प्रसन्न मुद्रामें बैठे हैं। अपने गणोंसे घिरे हुए शम्भु तपस्वीका रूप धारण किये योगपट्टपर आसीन थे। उन परमेश्वररूपी शंकरका दर्शन करके मेरे सहित श्रीविष्णु तथा अन्य देवताओं, सिद्धों और मुनीश्वरोंने उन्हें प्रणाम करके वेदों और उपनिषदोंके सूत्रोंद्वारा उनका स्तवन किया।

(अध्याय २३)


देवताओंका भगवान् शिवसे पार्वतीके साथ विवाह करनेका अनुरोध, भगवान्‌का विवाहके दोष बताकर अस्वीकार करना तथा उनके पुनः प्रार्थना करनेपर स्वीकार कर लेना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! देवताओंने वहाँ पहुँचकर भगवान् रुद्रको प्रणाम करके उनकी स्तुति की। तब नन्दिकेश्वरने भगवान् शिवसे उनकी दीनबन्धुता एवं भक्त-वत्सलताकी प्रशंसा करते हुए कहा—‘प्रभो! देवता और मुनि संकटमें पड़कर आपकी शरणमें आये हैं। सर्वेश्वर! आप उनका उद्धार करें।’

दयालु नन्दीके इस प्रकार सूचित करनेपर भगवान् शम्भु धीरे-धीरे आँखें