शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८२ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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खोलकर ध्यानसे उपरत हुए। समाधिसे विरत हो परमज्ञानी परमात्मा एवं ईश्वर शम्भुने समस्त देवताओंसे इस प्रकार कहा।
शम्भु बोले—श्रीविष्णु और ब्रह्मा आदि देवेश्वरो ! तुम सब लोग मेरे समीप कैसे आये ? तुम अपने आनेका जो भी कारण हो, वह शीघ्र बताओ।
भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर सब देवता प्रसन्न हो कारण बतानेके लिये भगवान् विष्णुके मुँहकी ओर देखने लगे। तब शिवके महान् भक्त और देवताओंके हितकारी श्रीविष्णु मेरे बताये हुए देवताओंके महत्तर कार्यको सूचित करने लगे। उन्होंने कहा—'शम्भो! तारकासुरने देवताओंको अत्यन्त अद्भुत एवं महान् कष्ट प्रदान किया है। यही बतानेके लिये सब देवता यहाँ आये हैं। भगवन् ! आपके औरस पुत्रसे ही तारक दैत्य मारा जा सकेगा और किसी प्रकारसे नहीं। मेरा यह कथन सर्वथा सत्य है। महादेव! इस प्रकार विचार करके आप कृपा करें। आपको नमस्कार है। स्वामिन् ! तारकासुरके द्वारा उपस्थित किये गये इस कष्टसे आप देवताओंका उद्धार कीजिये। देव! शम्भो! आप दाहिने हाथसे गिरिजाका पाणिग्रहण करें। गिरिराज हिमवान्के द्वारा दी हुई महानुभावा पार्वतीको पाणिग्रहणके द्वारा ही अनुगृहीत कीजिये।'
श्रीविष्णुका यह वचन सुनकर योग-परायण भगवान् शिवने उन सबको उत्तम गतिका दर्शन कराते हुए इस प्रकार कहा—'देवताओ! ज्यों ही मैंने सर्वांगसुन्दरी गिरिजा देवीको स्वीकार किया, त्यों ही समस्त सुरेश्वर तथा ऋषि-मुनि सकाम हो जायेंगे। फिर तो वे परमार्थपथपर चलनेमें समर्थ न हो सकेंगे। दुर्गा अपने पाणिग्रहण-मात्रसे ही कामदेवको जीवित कर देंगी। विष्णो! मैंने कामदेवको जलाकर देवताओंका बहुत बड़ा कार्य सिद्ध किया है। आजसे सब लोग मेरे साथ सुनिश्चितरूपसे निष्काम होकर रहें। देवताओ! जैसे मैं हूँ, उसी तरह तुम सब लोग पृथक्-पृथक् रहकर कोई विशेष प्रयत्न किये बिना ही अत्यन्त दुष्कर एवं उत्तम तपस्या कर सकोगे। अब उस मदनके न होनेसे तुम सब देवता समाधिके द्वारा परमानन्दका अनुभव करते हुए निर्विकार हो जाओ; क्योंकि काम नरककी ही प्राप्ति करानेवाला है। कामसे क्रोध होता है, क्रोधसे मोह होता है और मोहसे तपस्या नष्ट होती है। अतः तुम सभी श्रेष्ठ देवताओंको काम और क्रोधका परित्याग कर देना चाहिये, मेरे इस कथनको कभी अन्यथा नहीं मानना चाहिये।*
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! वृषभके चिह्नसे युक्त ध्वजा धारण करनेवाले भगवान् महादेवने इस प्रकारकी बातें सुनाकर ब्रह्मा, विष्णु, देवताओं तथा मुनियोंको निष्काम धर्मका उपदेश दिया। तदनन्तर भगवान् शम्भु पुनः ध्यान लगाकर चुप हो गये और पहलेकी ही भाँति पार्षदोंसे
* कामो हि नरकायैव तस्मात् क्रोधोऽभिजायते। क्रोधाद्भवति सम्मोहो मोहाच्च भ्रंश्यते तपः॥
कामक्रोधौ परित्याज्यौ भवद्भिः सुरसत्तमैः। सर्वैरेव च मन्तव्यं मद्वाक्यं नान्यथा क्वचित्॥
(शि० पु० रू० सं० पा० खं० २४। २७-२८)