शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- रुद्रसंहिता * २८३
घिरे हुए सुस्थिरभावसे बैठ गये। वे अपने मनमें ही स्वयं आत्मस्वरूप, निरंजन, निराभास, निर्विकार, निरामय, परात्पर, नित्य ममतारहित, निरवग्रह, शब्दातीत, निर्गुण, ज्ञानगम्य एवं प्रकृतिसे पर परमात्माका चिन्तन करने लगे। इस प्रकार परम स्वरूपका चिन्तन करते हुए वे ध्यानमें स्थित हो गये। बहुत-से प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले भगवान् शिव ध्यान करते-करते ही परमानन्दमें निमग्न हो गये। श्रीहरि एवं इन्द्र आदि देवताओंने जब परमेश्वर शिवको ध्यानमग्न देखा, तब उन्होंने नन्दीकी सम्मति ली। नन्दीने पुनः दीनभावसे स्तुति करनेके लिये कहा। उनकी इस सत्सम्मतिके अनुसार देवता स्तुति करने लगे। वे बोले— 'देवदेव! महादेव! करुणासागर प्रभो! हम आपकी शरणमें आये हैं। आप महान् क्लेशसे हमारा उद्धार कीजिये।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इस प्रकार बहुत दीनतापूर्ण उक्तिसे देवताओंने भगवान् शंकरकी स्तुति की। इसके बाद वे सब देवता प्रेमसे व्याकुलचित्त हो उच्चस्वरसे फूट-फूटकर रोने लगे। मेरे साथ भगवान् श्रीहरि उत्तम भक्तिभावसे युक्त हो मन-ही-मन भगवान् शम्भुका स्मरण करते हुए अत्यन्त दीनतापूर्ण वाणीद्वारा उनसे अपना अभिप्राय निवेदन करने लगे।
देवताओंके, मेरे तथा श्रीहरिके इस प्रकार बहुत स्तुति करनेपर भगवान् महेश्वर अपनी भक्तवत्सलताके कारण ध्यानसे विरत हो गये। उनका मन अत्यन्त प्रसन्न था। वे भक्तवत्सल शंकर श्रीहरि आदिको करुणा-दृष्टिसे देखकर उनका हर्ष बढ़ाते हुए बोले— 'विष्णो! ब्रह्मन्! तथा इन्द्र आदि देवताओ! तुम सब लोग एक साथ यहाँ किस अभिप्रायसे आये हो? मेरे सामने सच-सच बताओ।'
श्रीहरिने कहा—महेश्वर! आप सर्वज्ञ हैं, सबके अन्तर्यामी ईश्वर हैं। क्या आप हमारे मनकी बात नहीं जानते? अवश्य जानते हैं, तथापि आपकी आज्ञासे मैं स्वयं भी कहता हूँ। सुखदायक शंकर! हम सब देवताओंको तारकासुरसे अनेक प्रकारका दुःख प्राप्त हुआ है। इसीलिये देवताओंने आपको प्रसन्न किया है। आपके लिये ही उन्होंने गिरिराज हिमालयसे शिवाकी उत्पत्ति करायी है। शिवाके गर्भसे आपके द्वारा जो पुत्र उत्पन्न होगा, उसीसे तारकासुरकी मृत्यु होगी, दूसरे किसी उपायसे नहीं। ब्रह्माजीने उस दैत्यको यही वर दिया है। इस कारण दूसरेसे उसकी मृत्यु नहीं हो पा रही है। अतएव वह निडर होकर सारे संसारको कष्ट दे रहा है। इधर नारदजीकी आज्ञासे पार्वती कठोर तपस्या कर रही हैं। उनके तेजसे समस्त चराचर प्राणियों-सहित त्रिलोकी आच्छादित हो गयी है। इसलिये परमेश्वर! आप शिवाको वर देनेके लिये जाइये। स्वामिन्! देवताओंका दुःख मिटाइये और हमें सुख दीजिये। शंकर! मेरे तथा देवताओंके हृदयमें आपके विवाहका उत्सव देखनेके लिये बड़ा भारी उत्साह है। अतः आप यथोचित रीतिसे विवाह कीजिये। परात्पर परमेश्वर! आपने रतिको जो वर दिया था, उसकी पूर्तिका अवसर आ गया है। अतः अपनी प्रतिज्ञाको शीघ्र सफल कीजिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कह उन्हें प्रणाम करके श्रीविष्णु आदि देवताओं