शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८४ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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और महर्षियोंने नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा पुनः उनकी स्तुति की। फिर वे सब-के-सब उनके सामने खड़े हो गये। भक्तोंके अधीन रहनेवाले भगवान् शंकर भी, जो वेदमर्यादाके रक्षक हैं, देवताओंकी बात सुन हँसकर बोले—‘हे हरे! हे विधे! और हे देवताओ! तुम सब लोग आदरपूर्वक सुनो। मैं यथोचित, विशेषतः विवेकपूर्ण बात कह रहा हूँ। विवाह करना मनुष्योंके लिये उचित कार्य नहीं है; क्योंकि विवाह दृढ़तापूर्वक बाँध रखनेवाली एक बहुत बड़ी बेड़ी है। जगत्में बहुत-से कुसंग हैं; परंतु स्त्रीका संग उनमें सबसे बढ़कर है। मनुष्य सारे बन्धनोंसे छुटकारा पा सकता है, परंतु स्त्रीप्रसङ्गरूपी बन्धनसे वह मुक्त नहीं हो पाता। लोहे और काठकी बनी हुई बेड़ियोंमें दृढ़तापूर्वक बँधा हुआ पुरुष भी एक दिन उस कैदसे छुटकारा पा जाता है, परंतु स्त्री-पुत्र आदिके बन्धनमें बँधा हुआ मनुष्य कभी छूट नहीं पाता। महान् बन्धनमें डालनेवाले विषय सदा बढ़ते रहते हैं। जिसका मन विषयोंके वशीभूत हो गया है, उसके लिये मोक्ष स्वप्नमें भी दुर्लभ है। विद्वान् पुरुष यदि सुख चाहता है तो वह विषयोंको विधिपूर्वक त्याग दे। विषयोंको विषके समान बताया गया है, जिनके द्वारा मनुष्य मारा जाता है। विषयीके साथ वार्ता करने-मात्रसे मनुष्य क्षणभरमें पतित हो जाता है। आचार्योंने विषयको मिश्री मिलायी हुई वारुणी (मदिरा) कहा है*। यद्यपि मैं इस बातको जानता हूँ और यद्यपि विषयोंके इन सारे दोषोंका मुझे विशेष ज्ञान है, तथापि मैं तुम्हारी प्रार्थनाको सफल करूँगा; क्योंकि मैं भक्तोंके अधीन रहता हूँ और भक्त-वत्सलतावश उचित-अनुचित सारे कार्य करता हूँ। इसलिये तीनों लोकोंमें ‘अयथोचितकर्ता’ के रूपमें मेरी प्रसिद्धि है। भक्तोंके लिये मैंने अनेक बार बहुत-से प्रयत्न करके कष्ट सहन किये हैं, गृहपति होकर विश्वानर मुनिका दुःख दूर किया है। हरे! विधे! अब अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता। मेरी जो प्रतिज्ञा है, उसे तुम सब लोग अच्छी तरह जानते हो। मैं यह सत्य कहता हूँ कि जब-जब भक्तोंपर कहीं विपत्ति आती है, तब-तब मैं तत्काल उनके सारे कष्ट हर लेता हूँ। तारकासुरसे तुम सब लोगोंको जो दुःख प्राप्त हुआ है, उसे मैं जानता हूँ और उसका हरण करूँगा, यह भी सत्य-सत्य बता रहा हूँ। यद्यपि मेरे मनमें विवाह करनेकी कोई रुचि नहीं है तथापि मैं
* कुसङ्गा बहवो लोके स्त्रीसङ्गस्तत्र चाधिकः। उद्धरेत्सकलैर्बन्धैर्न स्त्रीसङ्गात् प्रमुच्यते॥
लोहदारुमयैः पाशैर्दृढं बद्धोऽपि मुच्यते। स्त्र्यादिपाशसुसम्बद्धो मुच्यते न कदाचन॥
वर्द्धन्ते विषयाः शश्वन्महाबन्धनकारिणः। विषयाक्रान्तमनसः स्वप्ने मोक्षोऽपि दुर्लभः॥
सुखमिच्छति चेत् प्राज्ञो विधिवद् विषयांस्त्यजेत्। विषवद् विषयानाहुर्विषयैर्येर्निहन्यते॥
जनो विषयिणा साकं वार्तातः पतति क्षणात्। विषयं प्राहुराचार्याः सितालिप्तेन्द्रवारुणीम्॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० २४।६१–६५)