भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* रुद्रसंहिता * २८५

पुत्रोत्पादनके लिये गिरिजाके साथ विवाह करूँगा। तुम सब देवता अब निर्भय होकर अपने-अपने घर जाओ। मैं तुम्हारा कार्य सिद्ध करूँगा। इस विषयमें अब कोई विचार नहीं करना चाहिये।'

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर भगवान् शंकर मौन हो समाधिमें स्थित हो गये और विष्णु आदि सभी देवता अपने-अपने धामको चले गये।
(अध्याय २४)


भगवान् शिवकी आज्ञासे सप्तर्षियोंका पार्वतीके आश्रमपर जा उनके शिवविषयक अनुरागकी परीक्षा करना और भगवान्‌को सब वृत्तान्त बताकर स्वर्गको जाना

ब्रह्माजी कहते हैं—देवताओंके अपने आश्रममें चले जानेपर पार्वतीके तपकी परीक्षाके लिये भगवान् शंकर समाधिस्थ हो गये। वे स्वयं अपने-आपमें, अपने ही परात्पर, स्वस्थ, मायारहित तथा उपद्रवशून्य स्वरूपका चिन्तन करने लगे। उस ध्येय वस्तुके रूपमें साक्षात् भगवान् महेश्वर ही विराजमान हैं। उनकी गतिका किसीको ज्ञान नहीं होता। वे भगवान् वृषभध्वज ही सबके स्रष्टा—परमेश्वर हैं।

तात! उन दिनों पार्वतीदेवी बड़ी भारी तपस्या कर रही थीं। उस तपस्यासे रुद्रदेव भी बड़े विस्मयमें पड़ गये। भक्ताधीन होनेके कारण ही वे समाधिसे विचलित हो गये और किसी कारणसे नहीं। तदनन्तर सृष्टिकर्ता हरने वसिष्ठ आदि सप्तर्षियोंका स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही वे सातों ऋषि शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे। उनके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी तथा वे सब-के-सब अपने सौभाग्यकी अधिक सराहना करते थे। उन्हें आया देख भगवान् शिवके नेत्र प्रसन्नतासे प्रफुल्ल कमलके समान खिल उठे और वे हँसते हुए बोले— 'तात सप्तर्षियो! तुम सब लोग मेरे हितकारी तथा सम्पूर्ण वस्तुओंके ज्ञानमें निपुण हो। अतः शीघ्र मेरी बात सुनो। गिरिराजकुमारी देवेश्वरी पार्वती इस समय सुस्थिरचित्त हो गौरी-शिखर नामक पर्वतपर तपस्या कर रही हैं। मुझे पतिरूपमें प्राप्त करना ही उनकी तपस्याका उद्देश्य है। द्विजो! इस समय केवल सखियाँ उनकी सेवामें हैं। मेरे सिवा दूसरी समस्त कामनाओं-का परित्याग करके वे एक उत्तम निश्चयपर पहुँच चुकी हैं। मुनिवरो! तुम सब लोग मेरी आज्ञासे वहाँ जाओ और प्रेमपूर्ण हृदयसे उनकी दृढ़ताकी परीक्षा करो। वहाँ तुम्हें सर्वथा छलयुक्त बातें कहनी चाहिये। उत्तम व्रतधारी महर्षियो! मेरी आज्ञासे ऐसा करना है। इसलिये तुम्हें संशय नहीं करना चाहिये।'

भगवान् शंकरकी यह आज्ञा पाकर वे सातों ऋषि तुरंत ही उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ दीप्तिमती जगन्माता पार्वती विराजमान थीं। सप्तर्षियोंने वहाँ शिवाको तपस्याकी मूर्तिमती दूसरी सिद्धिके समान देखा। उनका तेज महान् था। वे अपने उत्तम तेजसे प्रकाशित हो रही थीं। उन उत्तम व्रतधारी सप्तर्षियोंने उन्हें मन-ही-मन प्रणाम किया