भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 305
* रुद्रसंहिता *२९१

कहा है, उसमें मुझे परिहासका अनुमान होता है। यदि यह सब ठीक हो तो पार्वतीदेवी अपने मुँहसे कहें।'

जटिल ब्राह्मणके इस प्रकार कहनेपर पार्वतीदेवी अपने मुँहसे ही यों कहने लगीं।

(अध्याय २६)


पार्वतीकी बात सुनकर जटाधारी ब्राह्मणका शिवकी निन्दा करते हुए पार्वतीको उनकी ओरसे मनको हटा लेनेका आदेश देना

पार्वती बोलीं—जटाधारी विप्रवर! मेरा सारा वृत्तान्त सुनिये। मेरी सखीने जो कुछ कहा है, वह ज्यों-का-त्यों सत्य है; उसमें असत्य कुछ भी नहीं है। मैं मन, वाणी और क्रियाद्वारा सत्य ही कहती हूँ, असत्य नहीं। मैंने साक्षात् पतिभावसे भगवान् शंकरका ही वरण किया है। यद्यपि जानती हूँ, वह दुर्लभ वस्तु भला मुझे कैसे प्राप्त हो सकती है; तथापि मनकी उत्कण्ठासे विवश हो मैं तपस्या कर रही हूँ।

ब्राह्मणसे ऐसी बात कहकर पार्वतीदेवी उस समय चुप हो रहीं। तब उनकी वह बात सुनकर ब्राह्मणने कहा।

ब्राह्मण बोले—इस समयतक मेरे मनमें यह जाननेकी प्रबल इच्छा थी कि ये देवी किस दुर्लभ वस्तुको चाहती हैं? जिसके लिये ऐसा महान् तप कर रही हैं। किंतु देवि! तुम्हारे मुखारविन्दसे सब कुछ सुनकर उस अभीष्ट वस्तुको जान लेनेके बाद अब मैं यहाँसे जा रहा हूँ। तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो। यदि तुम मुझसे न कहती तो मित्रता निष्फल होती। अब जैसा तुम्हारा कार्य है, वैसा ही उसका परिणाम होगा। जब तुम्हें इसीमें सुख है, तब मुझे कुछ नहीं कहना है।

वहाँ ऐसी बात कहकर ब्राह्मणने ज्यों ही जानेका विचार किया, त्यों ही पार्वतीदेवीने प्रणाम करके उनसे इस प्रकार कहा।

पार्वती बोलीं—विप्रवर! आप क्यों जायँगे? ठहरिये और मेरे हितकी बात बताइये।

पार्वतीके ऐसा कहनेपर दण्डधारी ब्राह्मणदेवता रुक गये और इस प्रकार बोले—‘देवि! यदि मेरी बात सुननेका मन है और मुझे भक्तिभावसे ठहरा रही हो तो मैं वह सब तत्त्व बता रहा हूँ, जिससे तुम्हें हिताहितका ज्ञान हो जायगा। महादेवजीके प्रति मेरे मनमें गौरव-बुद्धि है, अतः मैं उनको सब प्रकारसे जानता हूँ; तो भी यथार्थ बात कहता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। वृषभके चिह्नसे अंकित ध्वजा धारण करनेवाले महादेवजी सारे शरीरमें भस्म रमाये रहते हैं, सिरपर जटा धारण करते हैं, धोतीकी जगह बाघका चाम पहनते और चादरकी जगह हाथीकी खाल ओढ़ते हैं। हाथमें भीख माँगनेके लिये एक खोपड़ी लिये रहते हैं। झुंड-के-झुंड साँप उनके सारे अंगोंमें लिपटे देखे जाते हैं। वे विष खाकर ही पुष्ट होते हैं, अभक्ष्यभक्षी हैं, उनके नेत्र बड़े भद्दे हैं और देखनेमें डरावने लगते हैं। उनका जन्म कब, कहाँ और किससे हुआ, यह आजतक प्रकट नहीं हुआ। घर-गृहस्थीके भोगसे वे सदा दूर ही रहते हैं, नंग-धड़ंग घूमते हैं और भूत-प्रेतोंको सदा


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