शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * २९९
सुन्दर फूलोंसे शिवादेवीका सानन्द पूजन किया। उस अवसरपर विमानपर बैठे हुए देवताओंने पार्वतीको नमस्कार करके उनपर फूलोंकी वर्षा करते हुए स्तुति की। नारद! उस समय तुम्हें भी एक सुन्दर रथपर बिठाकर ब्राह्मण आदि सब लोग नगरमें ले गये। फिर ब्राह्मणों, सखियों तथा दूसरी स्त्रियोंने बड़े आदरके साथ शिवाका घरके भीतर प्रवेश कराया। स्त्रियोंने उनके ऊपर बहुत-सी वस्तुएँ निछावर कीं। ब्राह्मणोंने आशीर्वाद दिये। मुनीश्वर! पिता हिमवान् और माता मेनकाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने अपने गृहस्थ-आश्रमको सफल माना और यह अनुभव किया कि कुपुत्रकी अपेक्षा सुपुत्री ही श्रेष्ठ है। गिरिराजने ब्राह्मणों और वन्दीजनोंको धन दिया और ब्राह्मणोंसे मंगलपाठ करवाया। मुने! इस प्रकार पार्वतीके साथ हर्षभरे माता-पिता, भाई तथा भौजाइयाँ भी घरके आँगनमें प्रसन्नतापूर्वक बैठीं।
तदनन्तर हिमवान् प्रसन्नचित्तसे सबका आदर-सत्कार करके गंगा-स्नानके लिये गये। इसी बीचमें सुन्दर लीला करनेवाले भक्तवत्सल भगवान् शम्भु एक अच्छा नाचनेवाला नट बनकर मेनकाके पास गये। उन्होंने बायें हाथमें सींग और दाहिने हाथमें डमरू ले रखा था। पीठपर कथरी रख छोड़ी थी। लाल वस्त्र पहने वे भगवान् रुद्र नाच और गानमें अपनी निपुणताका परिचय दे रहे थे। सुन्दर नटका रूप धारण किये हुए भगवान् शिवने मेनकाके पास बैठी हुई स्त्रियोंकी टोलीके समीप सुन्दर नृत्य किया और अत्यन्त मनोहर नाना प्रकारके गीत गाये। उन्होंने वहाँ सुन्दर ध्वनि करनेवाले शृंग और डमरूको भी बजाया तथा नाना प्रकारकी बड़ी मनोहारिणी लीला की। नटराजकी उस लीलाको देखनेके लिये नगरके सभी स्त्री-पुरुष एवं बालक और वृद्ध भी सहसा वहाँ आ पहुँचे। मुने! उस सुमधुर गीतको सुनकर और उस मनोहर उत्तम नृत्यको देखकर वहाँ आये हुए सब लोग तत्काल मोहित हो गये। मेना भी मोही गयीं। उधर पार्वतीने अपने हृदयमें भगवान् शंकरका साक्षात् दर्शन किया। वे त्रिशूल आदि चिह्न धारण किये अत्यन्त सुन्दर दिखायी देते थे। उनका सारा अंग विभूतिसे विभूषित था। वे हड्डियोंकी मालासे अलंकृत थे। उनका मुख सूर्य, चन्द्र एवं अग्निरूप तीन नेत्रोंसे उद्भासित था। उन्होंने नागका यज्ञोपवीत धारण किया था। उनके उस सुरम्य रूपको देखकर दुर्गा प्रेमावेशसे मूर्च्छित हो गयीं। गौरवर्णविभूषित दीन-बन्धु दयासिन्धु और सर्वथा मनोहर महेश्वर