भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 314

३०० * संक्षिप्त शिवपुराण *

पार्वतीसे कह रहे थे कि 'वर माँगो।' अपने हृदयमें विराजमान महादेवजीको इस रूपमें देखकर पार्वतीदेवीने उन्हें प्रणाम किया और मन-ही-मन यह वर माँगा कि 'आप मेरे पति हो जाइये।' प्रीतियुक्त हृदयसे शिवाको वैसा कल्याणकारी वर देकर वे पुनः अन्तर्धान हो गये और वहाँ पूर्ववत् भिक्षा माँगनेवाला नट बनकर उत्तम नृत्य करने लगे।

उस समय मेना सोनेकी थालीमें रखे हुए बहुत-से सुन्दर रत्न ले उन्हें प्रसन्नतापूर्वक देनेके लिये गयीं। उनका वह ऐश्वर्य देखकर भगवान् शंकर मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। परंतु उन्होंने उन रत्नोंको स्वीकार नहीं किया। वे भिक्षामें उनकी पुत्री शिवाको ही माँगने लगे और पुनः कौतुकवश सुन्दर नृत्य एवं गान करनेको उद्यत हुए। मेना उस भिक्षुक नटकी बात सुनकर अत्यन्त कुपित हो उठीं और उसे डाँटने-फटकारने लगीं। उनके मनमें उसे बाहर निकाल देनेकी इच्छा हुई। इसी बीचमें गिरिराज हिमवान् गंगाजीसे नहाकर लौट आये। उन्होंने अपने सामने उस नराकार भिक्षुकको आँगनमें खड़ा देखा। मेनाके मुखसे सारी बातें सुनकर उनको भी बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अपने सेवकोंको आज्ञा दी कि इस नटको बाहर निकाल दो। मुनिश्रेष्ठ! वे नटराज विशालकाय अग्निकी भाँति अपने उत्तम तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्हें छूना भी कठिन था। इसलिये कोई भी उन्हें बाहर न निकाल सका। तात! फिर तो नाना प्रकारकी लीलाओंमें विशारद उन भिक्षुशिरोमणिने शैलराजको अपना अनन्त प्रभाव दिखाना आरम्भ किया। हिमवान्‌ने देखा, भिक्षुने वहाँ तत्काल ही भगवान् विष्णुका रूप धारण कर लिया है। उनके मस्तकपर किरीट, कानोंमें कुण्डल और शरीरपर पीतवस्त्र शोभा पाते हैं। उनके चार भुजाएँ हैं। हिमवान्‌ने पूजाके समय गदाधारी श्रीहरिको जो-जो पुष्प आदि चढ़ाये थे, वे सब उन्होंने भिक्षुके शरीर और मस्तकपर देखे। तत्पश्चात् गिरिराजने उन भिक्षुशिरोमणिको जगत्स्रष्टा चतुर्मुख ब्रह्माके रूपमें देखा। उनके शरीरका वर्ण लाल था और वे वैदिक सूक्तका पाठ कर रहे थे। तदनन्तर शैलराजने उन कौतुककारी नटराजको एक क्षणमें जगत्‌के नेत्ररूप सूर्यके आकारमें देखा। तात! इसके बाद वे महान् अद्भुत रुद्रके रूपमें दिखायी दिये। उनके साथ देवी पार्वती भी थीं। वे उत्तम तेजसे सम्पन्न रमणीय रुद्र धीरे-धीरे हँस रहे थे। फिर वे केवल तेजोमय रूपमें दृष्टिगोचर हुए। उनका वह स्वरूप निराकार, निरंजन, उपाधिशून्य, निरीह एवं अत्यन्त अद्भुत था। इस प्रकार हिमवान्‌ने उनके बहुत-से रूप देखे। इससे उन्हें बड़ा विस्मय हुआ और वे तुरंत ही परमानन्दमें निमग्न हो गये। तदनन्तर सुन्दर लीला करनेवाले उन भिक्षुशिरोमणिने हिमवान् और मेनासे दुर्गाको ही भिक्षाके रूपमें माँगा। दूसरी कोई वस्तु ग्रहण नहीं की। परंतु शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण शैलराजने उनकी उस प्रार्थनाको स्वीकार नहीं किया। फिर भिक्षुने कोई वस्तु नहीं ली और वे वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तब मेना और शैलराजको उत्तम ज्ञान हुआ और वे सोचने लगे—'भगवान् शिव हमें