भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 315

* रुद्रसंहिता * ३०१

अपनी मायासे छलकर अपने स्थानको चले गये।' यह विचारकर उन दोनोंकी भगवान् शिवमें पराभक्ति हुई, जो महान् मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली, दिव्य तथा सम्पूर्ण आनन्द प्रदान करनेवाली है। (अध्याय ३०)


देवताओंके अनुरोधसे वैष्णव ब्राह्मणके वेषमें शिवजीका हिमवान्‌के घर जाना और शिवकी निन्दा करके पार्वतीका विवाह उनके साथ न करनेको कहना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेना और हिमवान्‌की भगवान् शिवके प्रति उच्च-कोटिकी अनन्यभक्ति देख इन्द्र आदि सब देवता परस्पर विचार करने लगे। तदनन्तर गुरु बृहस्पति और ब्रह्माजीकी सम्मतिके अनुसार सभी मुख्य देवताओंने शिवजीके पास जाकर उनको प्रणाम किया और वे हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।

देवता बोले—देवदेव! महादेव! करुणाकर! शंकर! हम आपकी शरणमें आये हैं, कृपा कीजिये। आपको नमस्कार है। स्वामिन्! आप भक्तवत्सल होनेके कारण सदा भक्तोंके कार्य सिद्ध करते हैं। दीनोंका उद्धार करनेवाले और दयाके सिन्धु हैं तथा भक्तोंको विपत्तियोंसे छुड़ानेवाले हैं।

इस प्रकार महेश्वरकी स्तुति करके इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंने मेना और हिमवान्‌की अनन्य शिवभक्तिके विषयमें सारी बातें आदरपूर्वक बतायीं। देवताओंकी वह बात सुनकर महेश्वरने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और हँसते हुए उन्हें आश्वासन देकर विदा किया। तब सब देवता अपना कार्य सिद्ध हुआ मानकर भगवान् सदाशिवकी प्रशंसा करते हुए शीघ्र अपने घरको लौटकर प्रसन्नताका अनुभव करने लगे। तदनन्तर भक्तवत्सल महेश्वर भगवान् शम्भु, जो मायाके स्वामी हैं, निर्विकार चित्तसे शैलराजके यहाँ गये। उस समय गिरिराज हिमवान् सभा-भवनमें बन्धुवर्गसे घिरे हुए पार्वतीसहित प्रसन्नतापूर्वक बैठे थे। इसी अवसरपर वहाँ सदाशिवने पदार्पण किया। वे हाथमें दण्ड, छत्र, शरीरपर दिव्य वस्त्र, ललाटमें उज्ज्वल तिलक, एक हाथमें स्फटिककी माला और गलेमें शालग्राम धारण किये भक्तिपूर्वक हरिनामका जप कर रहे थे और देखनेमें साधुवेषधारी ब्राह्मण जान पड़ते थे। उन्हें आया देख सपरिवार हिमवान् उठकर खड़े हो गये। उन्होंने उन अपूर्व अतिथि-देवताको भूतलपर दण्डके समान पड़कर भक्तिभावसे साष्टांग प्रणाम किया। देवी पार्वती ब्राह्मणरूपधारी प्राणेश्वर शिवको पहचान गयी थीं। अतः उन्होंने भी उनको मस्तक झुकाया और मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नताके साथ उनकी स्तुति की। ब्राह्मणरूपधारी शिवने उन सबको प्रेमपूर्वक आशीर्वाद दिया। किंतु शिवाको सबसे अधिक मनोवांछित शुभाशीर्वाद प्रदान किया। शैलाधिराज हिमवान्‌ने बड़े आदरसे उन्हें मधुपर्क आदि पूजन-सामग्री भेंट की और ब्राह्मणने बड़ी प्रसन्नताके साथ वह सब ग्रहण किया।