शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
तत्पश्चात् गिरिश्रेष्ठ हिमाचलने उनका कुशल-समाचार पूछा। मुने! अत्यन्त प्रीतिपूर्वक उन द्विजराजकी विधिवत् पूजा करके शैलराजने
पूछा—‘आप कौन हैं?’ तब उन ब्राह्मण-शिरोमणिने गिरिराजसे शीघ्र ही आदर-पूर्वक कहा।
वे श्रेष्ठ ब्राह्मण बोले—गिरिश्रेष्ठ! मैं उत्तम विद्वान् वैष्णव ब्राह्मण हूँ और ज्योतिषकी वृत्तिका आश्रय लेकर भूतलपर भ्रमण करता रहता हूँ। मनके समान मेरी गति है। मैं सर्वत्र जानेमें समर्थ और गुरुकी दी हुई शक्तिसे सर्वज्ञ, परोपकारी, शुद्धात्मा, दयासिन्धु और विकारनाशक हूँ। मुझे ज्ञात हुआ है कि तुम अपनी इस लक्ष्मी-सरीखी सुन्दर रूपवाली दिव्य सुलक्षणा अपनी पुत्रीको एक आश्रयरहित, असंग, कुरूप और गुणहीन वर—महादेवजीके हाथमें देना चाहते हो। वे रुद्र देवता मरघटमें वास करते, शरीरमें साँप लपेटे रहते और योग साधते फिरते हैं। उनके पास पहननेके लिये एक वस्त्र भी नहीं है। वैसे ही नंग-धड़ंग घूमते हैं। आभूषणकी जगह सर्प धारण करते हैं। उनके कुलका नाम आजतक किसीको ज्ञात नहीं हुआ। वे कुपात्र और कुशील हैं। स्वभावतः विहारसे दूर रहते हैं। सारे शरीरमें भस्म रमाते हैं। क्रोधी और अविवेकी हैं। उनकी अवस्था कितनी है, यह किसीको ज्ञात नहीं। वे अत्यन्त कुत्सित जटाका बोझ सदा सिरपर धारण किये रहते हैं। वे भले-बुरे सबको आश्रय देनेवाले, भ्रमणशील, नागहारधारी, भिक्षुक, कुमार्ग-परायण तथा हठपूर्वक वैदिकमार्गका त्याग करनेवाले हैं। ऐसे अयोग्य वरको आप अपनी बेटी ब्याहना चाहते हैं? अचलराज! अवश्य ही आपका यह विचार मंगलदायक नहीं है। नारायणकुलमें उत्पन्न! ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ गिरिराज! मेरे कथनका मर्म समझो। तुमने जिस पात्रको ढूँढ़ रखा है, वह इस योग्य नहीं है कि उसके हाथमें पार्वतीका हाथ दिया जाय। शैलराज! तुम्हीं देखो, उनके एक भी भाई-बन्धु नहीं हैं। तुम तो बड़े-बड़े रत्नोंकी खान हो। किंतु उनके घरमें भुजी भाँग भी नहीं है—वे सर्वथा निर्धन हैं। गिरिराज! तुम शीघ्र ही अपने भाई-बन्धुओंसे, मेनादेवीसे, सभी बेटोंसे और पण्डितोंसे भी प्रयत्नपूर्वक पूछ लो। किंतु पार्वतीसे न पूछना; क्योंकि उन्हें शिवके गुण-दोषकी परख नहीं है।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर वे ब्राह्मण देवता, जो नाना प्रकारकी लीला करनेवाले शान्तस्वरूप शिव ही थे, शीघ्र खा-पीकर आनन्दपूर्वक वहाँसे अपने घरको चल दिये।
(अध्याय ३१)