शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * ३०१
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर निर्मल अन्तःकरणवाले उन मुनियोंने गिरिराजकुमारी पार्वतीको हाथसे छूकर आशीर्वाद देते हुए कहा—'शिवे! तुम भगवान् शिवके लिये सुखदायिनी होओ। तुम्हारा कल्याण होगा। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे गुणोंकी वृद्धि हो।' ऐसा कहकर सब मुनियोंने गिरिराजको प्रसन्नतापूर्वक फल-फूल दे विवाहके पक्के होनेका दृढ़ विश्वास कर लिया। उस समय परम सती सुमुखी अरुन्धतीने प्रसन्नतापूर्वक भगवान् शिवके गुणोंका बखान करके मेनाको लुभा लिया। तदनन्तर गिरिराज हिमवान्ने परम उत्तम मांगलिक लोकाचारका आश्रय ले हल्दी और कुंकुमसे अपनी दाढ़ी-मूंछका मार्जन किया। तत्पश्चात् चौथे दिन उत्तम लग्नका निश्चय करके परस्पर संतोष दे, वे सप्तर्षि भगवान् शिवके पास चले गये। वहाँ जाकर शिवको नमस्कार और विविध सूक्तियोंसे उनका स्तवन करके वे वसिष्ठ आदि सब मुनि परमेश्वर शिवसे बोले।
ऋषियोंने कहा—देवदेव! महादेव! परमेश्वर! महाप्रभो! आप प्रेमपूर्वक हमारी बात सुनें। आपके इन सेवकोंने जो कार्य किया है, उसे जान लें। महेश्वर! हमने नाना प्रकारके सुन्दर वचन और इतिहास सुनाकर गिरिराज और मेनाको समझा दिया है। गिरिराजने आपके लिये पार्वतीका वाग्दान कर दिया है। अब इसमें कोई ननु-नच नहीं है। अब आप अपने पार्षदों तथा देवताओंके साथ उनके यहाँ विवाहके लिये जाइये। महादेव! प्रभो! अब शीघ्र हिमाचलके घर पधारिये और वेदोक्त रीतिके अनुसार पार्वतीका अपने लिये पाणिग्रहण कीजिये।
सप्तर्षियोंका यह वचन सुनकर लोकाचारपरायण महेश्वर प्रसन्नचित्त हो हँसते हुए इस प्रकार बोले।
महेश्वरने कहा—महाभाग सप्तर्षियो! विवाहको तो मैंने न कभी देखा है और न सुना ही है। तुमलोगोंने पहले जैसा देखा हो, उसके अनुसार विवाहकी विशेष विधिका वर्णन करो।
महेश्वरके उस लौकिक शुभ वचनको सुनकर वे ऋषि हँसते हुए देवाधिदेव भगवान् सदाशिवसे बोले।
ऋषियोंने कहा—प्रभो! आप पहले तो भगवान् विष्णुको, विशेषतः उनके पार्षदोंसहित शीघ्र बुला लें। फिर पुत्रोंसहित ब्रह्माजीको, देवराज इन्द्रको, समस्त ऋषियोंको, यक्ष, गन्धर्व, किंनर, सिद्ध, विद्याधर और अप्सराओंको प्रसन्नतापूर्वक आमन्त्रित करें। इनको तथा अन्य सब लोगोंको यहाँ सादर बुलवा लें। वे सब मिलकर आपके कार्यका साधन कर लेंगे, इसमें संशय नहीं है।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर वे सातों ऋषि उनकी आज्ञा ले भगवान् शंकरकी स्थितिका वर्णन करते हुए वहाँसे प्रसन्नतापूर्वक अपने धामको चले गये।
(अध्याय ३४—३६)
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