भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 328

३१४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

भगवान् शिवका नारदजीके द्वारा सब देवताओंको निमन्त्रण दिलाना, सबका आगमन तथा शिवका मंगलाचार एवं ग्रहपूजन आदि करके कैलाससे बाहर निकलना

नारदजी बोले-विष्णुशिष्य महाप्राज्ञ तात विधातः! आपको नमस्कार है। कृपानिधे! आपके मुँहसे यह अद्भुत कथा मुझे सुननेको मिली है। अब मैं भगवान् चन्द्रमौलिके परम मंगलमय तथा समस्त पापराशिके विनाशक वैवाहिक चरित्रको सुनना चाहता हूँ। मंगलपत्रिका पाकर महादेवजीने क्या किया? परमात्मा शंकरकी वह दिव्य कथा सुनाइये।

ब्रह्माजीने कहा-बेटा! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। भगवान् शंकरके उत्तम यशको सुनो। मंगलपत्रिका पाकर भगवान् शंकरने जो कुछ किया, वह बताता हूँ। भगवान् शिव उस मंगलपत्रिकाको प्रसन्नतापूर्वक हाथमें लेकर हृदयमें बड़े हर्षका अनुभव करते हुए हँसने लगे। फिर उन भगवान्ने उसे लानेवालोंका सम्मान किया। तत्पश्चात् उसे बाँचकर विधिपूर्वक स्वीकार किया। इसके बाद हिमाचलके यहाँसे आये हुए लोगोंको बड़े आदर-सम्मानके साथ विदा किया। तदनन्तर उन मुनियोंसे कहा- 'आपलोगोंंने मेरे शुभकार्यका भलीभाँति सम्पादन किया, अब मैंने विवाह स्वीकार कर लिया है। अतः आपलोगोंको मेरे विवाहमें आना चाहिये।'

भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर वे ऋषि बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें प्रणाम एवं उनकी परिक्रमा करके अपने परम सौभाग्यकी सराहना करते हुए अपने धामको चले गये। मुने! तदनन्तर महालीला करनेवाले देवेश्वर भगवान् शम्भुने लोकाचारका सहारा ले तत्काल ही तुम्हारा स्मरण किया। तुम अपने सौभाग्यकी प्रशंसा करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ आये और मस्तक झुका प्रणाम कर हाथ जोड़ विनीतभावसे खड़े हो गये।

तब भगवान् शिवने कहा-नारद! तुम्हारे उपदेशसे देवी पार्वतींने बड़ी भारी तपस्या की और उससे संतुष्ट होकर मैंने उन्हें यह वर दिया कि मैं पतिरूपसे तुम्हारा पाणिग्रहण करूँगा। पार्वतीकी भक्ति देखकर मैं उनके वशमें हो गया हूँ। इसलिये उनके साथ विवाह करूँगा। सप्तर्षियोंने लग्नका साधन और शोधन कर दिया है। अतः आजसे सातवें दिन मेरा विवाह होगा। उस अवसरपर लौकिक रीतिका आश्रय ले मैं महान् उत्सव करूँगा। मुने! तुम विष्णु आदि सब देवताओं, मुनियों और सिद्धोंको तथा अन्य लोगोंको भी मेरी ओरसे निमन्त्रित करो। सब लोग मेरे शासनकी गुरुताको समझकर प्रसन्नता और उत्साहके साथ सब प्रकारसे सज-धजकर स्त्री-पुत्रोंको साथ लिये यहाँ आयें।

ब्रह्माजी कहते हैं-मुने! भगवान् शंकरकी इस आज्ञाको शिरोधार्य करके तुमने शीघ्र ही सर्वत्र जाकर उन सबको निमन्त्रण दे दिया। तत्पश्चात् शम्भुके पास आकर उनकी आज्ञाके अनुसार तुम वहीं ठहर गये। भगवान् शिव भी उन सब