शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * ३१५
देवताओंके आगमनकी उत्कण्ठापूर्वक प्रतीक्षा करते हुए अपने गणोंके साथ वहीं रहे। उनके सभी गण सम्पूर्ण दिशाओंमें नाचते हुए वहाँ बड़ा भारी उत्सव मना रहे थे। इसी बीचमें भगवान् विष्णु सुन्दर वेष धारण किये अपनी पत्नी और दल-बलके साथ शीघ्र ही कैलास पर्वतपर आये और भक्तिभावसे भगवान् शिवको प्रणाम करके उनकी आज्ञा पाकर प्रसन्नतापूर्वक उत्तम स्थानमें ठहर गये। इसी प्रकार मैं अपने गणोंके साथ स्वतन्त्रतापूर्वक शीघ्र ही कैलास गया और भगवान् शम्भुको प्रणाम करके अपने सेवकोंसहित सानन्द वहाँ ठहरा। तदनन्तर इन्द्र आदि लोकपाल और उनकी स्त्रियाँ आवश्यक सामानके साथ खूब सज-धजकर वहाँ आयीं। वे सब-के-सब उत्सव मना रहे थे। तत्पश्चात् मुनि, नाग, सिद्ध, उपदेवता तथा अन्य लोग भी निमन्त्रित हो उत्सव मनाते हुए वहाँ आये। उस समय महेश्वरने वहाँ आये हुए सब देवता आदिका पृथक्-पृथक् सहर्ष स्वागत-सत्कार किया। फिर तो कैलास पर्वतपर बड़ा अद्भुत और महान् उत्सव होने लगा। देवांगनाओंने उस अवसरपर यथायोग्य नृत्य आदि किया। विष्णु आदि जो देवता भगवान् शम्भुकी वैवाहिक यात्रा सम्पन्न करानेके लिये इस समय वहाँ आये थे, वे सब यथास्थान ठहर गये। भगवान् शिवकी आज्ञा पाकर सब लोग उनके प्रत्येक कार्यको अपना ही कार्य समझकर नियन्त्रित रूपसे करने लगे और इसे शिवकी सेवा मानने लगे। उस समय सातों मातृकाएँ वहाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ शिवको यथायोग्य आभूषण पहनाने लगीं। मुनिश्रेष्ठ! परमेश्वर भगवान् शिवका जो स्वाभाविक वेष था, वही उनकी इच्छासे उनके लिये आभूषणकी सामग्री बन गया। उस समय चन्द्रमा स्वयं उनके मुकुटके स्थानपर जा विराजे। उनका जो सुन्दर ललाटवर्ती तीसरा नेत्र था, वही शुभ तिलक बन गया। मुने! कानोंके आभूषणोंके रूपमें जो दो सर्प बताये गये हैं, वे नाना प्रकारके रत्नोंसे युक्त दो कुण्डल बन गये। अन्यान्य अंगोंमें स्थित सर्प उन-उन अंगोंके अति रमणीय नाना रत्नमय आभूषण हो गये। उनके शरीरमें जो भस्म लगा हुआ था, वही चन्दन आदिका अंगराग बन गया और उनके जो गजचर्म आदि परिधान थे, वे सुन्दर दिव्य दुकूल बन गये।
इस प्रकार उनका रूप इतना सुन्दर हो गया कि उसका वर्णन करना कठिन है। वे साक्षात् ईश्वर तो थे ही, उन्होंने पूरा-पूरा ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया। तदनन्तर समस्त देवता, यक्ष, दानव, नाग, पक्षी, अप्सरा और महर्षिगण मिलकर भगवान् शिवके समीप गये और महान् उत्सव मनाते हुए प्रसन्नतापूर्वक उनसे बोले—'महादेव! महेश्वर! अब आप महादेवी गिरिजाको ब्याह लानेके लिये हमलोगोंके साथ चलिये, चलिये। हमपर कृपा कीजिये।' तत्पश्चात् विज्ञानसे प्रसन्न हृदयवाले भगवान् विष्णुने भगवान् शंकरको भक्तिभावसे प्रणाम करके उपर्युक्त प्रस्तावके अनुरूप ही बात कही।
भगवान् विष्णु बोले—शरणागतवत्सल देवदेव! महादेव! प्रभो! आप अपने भक्तजनोंका कार्य सिद्ध करनेवाले हैं; अतः मेरा एक निवेदन सुनिये। कल्याणकारी शम्भो! आप गृह्यसूत्रोक्त विधिके अनुसार