भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 338

३२४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

मुनीश्वर ! उनके ऐसा कहनेपर वसिष्ठ आदि सप्तर्षियोंने वहाँ आकर यह बात कही—'पितरोंकी कन्या तथा गिरिराजकी रानी मेने! हमलोग तुम्हारा कार्य सिद्ध करनेके लिये आये हैं। जो कार्य सर्वथा उचित और उपयोगी है, उसे तुम्हारे हठके कारण हम विपरीत कैसे मान लें? भगवान् शंकरका दर्शन सबसे बड़ा लाभ है। वे दानपात्र होकर स्वयं तुम्हारे घर पधारे हैं।'

उनके ऐसा कहनेपर भी ज्ञानदुर्बला मेनाने उनकी बात मिथ्या कर दी और रुष्ट होकर उनसे कहा—'मैं शस्त्र आदिसे अपनी बेटीके टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगी, परंतु उसे शंकरके हाथमें नहीं दूँगी, तुम सब लोग दूर हट जाओ, किसीको मेरे पास नहीं आना चाहिये।'

ऐसा कह अत्यन्त विह्वल हो विलाप करके मेना चुप हो गयीं। मुने! वहाँ उनके इस बर्तावसे हाहाकार मच गया। तब हिमालय अत्यन्त व्याकुल हो वहाँ आये और मेनाको समझानेके लिये प्रेमपूर्वक तत्त्व दर्शाते हुए बोले।

हिमालयने कहा—प्रिये मेने! मेरी बात सुनो, तुम इतनी व्याकुल क्यों हो गयी? देखो तो, कौन-कौन-से महात्मा तुम्हारे घर पधारे हैं। तुम इनकी निन्दा क्यों करती हो? भगवान् शंकरको तुम भी जानती हो, किंतु नाना नामरूपवाले शम्भुके विकट रूपको देखकर घबरा गयी हो। मैं शंकरजीको भलीभाँति जानता हूँ। वे ही सबके प्रतिपालक हैं, पूजनीयोंके भी पूजनीय हैं तथा अनुग्रह एवं निग्रह करनेवाले हैं। निष्पाप प्राणप्रिये! हठ न करो, मानसिक दुःख छोड़ो। सुव्रते! शीघ्र उठो और सब कार्य करो। पहली बार विकटरूपधारी शम्भुने मेरे द्वारपर आकर जो नाना प्रकारकी लीलाएँ की थीं, मैं उनका आज तुम्हें स्मरण दिला रहा हूँ। उनके उस परम माहात्म्यको देख और समझकर उस समय मैंने और तुमने उन्हें कन्या देना स्वीकार किया था। प्रिये! अपनी उस बातको प्रमाण मानकर सार्थक करो।

इस बातको सुनकर शिवाकी माता मेना हिमालयसे बोलीं—नाथ! मेरी बात सुनिये और सुनकर आपको वैसा ही करना चाहिये। आप अपनी पुत्री पार्वतीके गलेमें रस्सी बाँधकर इसे बेखटके पर्वतसे नीचे गिरा दीजिये, परंतु मैं इसे हरके हाथमें नहीं दूँगी। अथवा नाथ! अपनी इस बेटीको ले जाकर निर्दयतापूर्वक समुद्रमें डुबा दीजिये। गिरिराज! ऐसा करके आप पूर्ण सुखी हो जाइये। स्वामिन्! यदि विकटरूपधारी


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