भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 339

* रुद्रसंहिता * ३२५

रुद्रको आप पुत्री दे देंगे तो मैं निश्चय ही अपना शरीर त्याग दूँगी।

मेनाने जब हठपूर्वक ऐसी बात कही, तब पार्वती स्वयं आकर यह रमणीय वचन बोलीं—'माँ! तुम्हारी बुद्धि तो बड़ी शुभकारक है। इस समय विपरीत कैसे हो गयी ? धर्मका अवलम्बन करनेवाली होकर भी तुम धर्मको कैसे छोड़ रही हो ? ये रुद्रदेव सबकी उत्पत्तिके कारणभूत साक्षात् ईश्वर हैं, इनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। समस्त श्रुतियोंमें यह वर्णन है कि भगवान् शम्भु सुन्दर रूपवाले तथा सुखद हैं। कल्याणकारी महेश्वर समस्त देवताओंके स्वामी तथा स्वयंप्रकाश हैं। इनके नाम और रूप अनेक हैं। माताजी! श्रीविष्णु और ब्रह्मा आदि भी इनकी सेवा करते हैं। ये सबके अधिष्ठान हैं, कर्ता, हर्ता और स्वामी हैं। विकारोंकी इनतक पहुँच नहीं है। ये तीनों देवताओंके स्वामी, अविनाशी एवं सनातन हैं। इनके लिये ही सब देवता किंकर होकर तुम्हारे द्वारपर पधारे हैं और उत्सव मना रहे हैं। इससे बढ़कर सुखकी बात और क्या हो सकती है। अतः यत्नपूर्वक उठो और जीवन सफल करो। मुझे शिवके हाथमें सौंप दो और अपने गृहस्थाश्रमको सार्थक करो। माँ! मुझे परमेश्वर शंकरकी सेवामें दे दो। मैं स्वयं तुमसे यह बात कहती हूँ। तुम मेरी इतनी-सी ही विनती मान लो। यदि तुम इनके हाथमें मुझे नहीं दोगी तो मैं दूसरे किसी वरका वरण नहीं करूँगी; क्योंकि जो सिंहका भाग है, उसे दूसरोंको ठगनेवाला सियार कैसे पा सकता है? माँ! मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा स्वयं हरका वरण किया है, हरका ही वरण किया है। अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वह करो।'

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! पार्वतीकी यह बात सुनकर शैलेश्वरप्रिया मेना बहुत ही उत्तेजित हो गयीं और पार्वतीको डाँटती हुई दुर्वचन कहकर रोने तथा विलाप करने लगीं। तदनन्तर स्वयं मैंने तथा सनकादि सिद्धोंने भी मेनाको बहुत समझाया। परंतु वे किसीकी बात न मानकर सबको डाँटती रहीं। इसी बीचमें उनके सुदृढ़ एवं महान् हठकी बात सुनकर शिवप्रिय भगवान् विष्णु भी तुरंत वहाँ आ पहुँचे और इस प्रकार बोले।

श्रीविष्णुने कहा—देवि! तुम पितरोंकी मानसी पुत्री एवं उन्हें बहुत ही प्यारी हो; साथ ही गिरिराज हिमालयकी गुणवती पत्नी हो। इस प्रकार तुम्हारा सम्बन्ध साक्षात् ब्रह्माजीके उत्तम कुलसे है। संसारमें तुम्हारे सहायक भी ऐसे ही हैं। तुम धन्य हो। मैं तुमसे क्या कहूँ? तुम तो धर्मकी आधारभूता हो, फिर धर्मका त्याग कैसे करती हो? तुम्हीं अच्छी तरह सोचो तो सही। सम्पूर्ण देवता, ऋषि, ब्रह्माजी और मैं—सभी लोग विपरीत बात ही क्यों कहेंगे? तुम शिवको नहीं जानती। वे निर्गुण भी हैं और सगुण भी हैं। कुरूप भी हैं और सुरूप भी। सबके सेव्य तथा सत्पुरुषोंके आश्रय हैं। उन्हींने मूलप्रकृतिरूपा देवी ईश्वरीका निर्माण किया और उसके बगलमें पुरुषोत्तमका निर्माण करके बिठाया। उन्हीं दोनोंसे सगुण-रूपमें मेरी तथा ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई। फिर लोकोंका हित करनेके लिये वे स्वयं भी रुद्र-रूपसे प्रकट हुए। तदनन्तर वेद, देवता तथा स्थावर-जंगमरूपसे जो कुछ दिखायी देता है, वह सारा जगत् भी भगवान् शंकरसे ही