भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 348

३३४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

हमलोगों ने भलीभाँति दर्शन किया है।'

तदनन्तर हिमालयने विधिके द्वारा प्रेरित हो भगवान् शिवको अपनी कन्याका दान कर दिया। कन्यादान करते समय वे बोले—

इमां कन्यां तुभ्यमहं ददामि परमेश्वर।
भार्यार्थं परिगृह्णीष्व प्रसीद सकलेश्वर॥

'परमेश्वर! मैं अपनी यह कन्या आपको देता हूँ। आप इसे अपनी पत्नी बनानेके लिये ग्रहण करें! सर्वेश्वर! इस कन्यादानसे आप संतुष्ट हों।'

इस मन्त्रका उच्चारण करके हिमाचलने अपनी पुत्री त्रिलोकजननी पार्वतीको उन महान् देवता रुद्रके हाथमें दे दिया। इस प्रकार शिवाका हाथ शिवके हाथमें रखकर शैलराज मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उस समय वे अपने मनोरथके महासागरको पार कर गये थे। परमेश्वर महादेवजीने प्रसन्न हो वेदमन्त्रके उच्चारणपूर्वक गिरिजाके करकमलको शीघ्र अपने हाथमें ले लिया। मुने! लोकाचारके पालनकी आवश्यकता-को दिखाते हुए उन भगवान् शंकरने पृथ्वीका स्पर्श करके 'कोऽदात्०' * इत्यादि रूपसे कामसम्बन्धी मन्त्रका पाठ किया। उस समय वहाँ सब ओर महान् आनन्ददायक महोत्सव होने लगा। पृथ्वीपर, अन्तरिक्षमें तथा स्वर्गमें भी जय-जयकारका शब्द गूँजने लगा। सब लोग अत्यन्त हर्षसे भरकर साधुवाद देने और नमस्कार करने लगे। गन्धर्वगण प्रेमपूर्वक गाने लगे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। हिमाचलके नगरके लोग भी अपने मनमें परम आनन्दका अनुभव करने लगे। उस समय महान् उत्सवके साथ परम मंगल मनाया जाने लगा। मैं, विष्णु, इन्द्र, देवगण तथा सम्पूर्ण मुनि हर्षसे भर गये। हम सबके मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल उठे। तदनन्तर शैलराज हिमाचलने अत्यन्त प्रसन्न हो शिवके लिये कन्यादानकी यथोचित सांगता प्रदान की। तत्पश्चात् उनके बन्धुजनोंने भक्तिपूर्वक शिवाका पूजन करके नाना विधि-विधानसे भगवान् शिवको उत्तम द्रव्य समर्पित किया। हिमालयने दहेजमें अनेक प्रकारके द्रव्य, रत्न, पात्र, एक लाख सुसज्जित गौएँ, एक लाख सजे-सजाये घोड़े, करोड़ हाथी और उतने ही सुवर्णजटित रथ आदि वस्तुएँ दीं; इस प्रकार परमात्मा शिवको विधिपूर्वक अपनी पुत्री कल्याणमयी पार्वतीका दान करके हिमालय कृतार्थ हो गये। इसके बाद शैलराजने यजुर्वेदकी माध्यंदिनी शाखामें वर्णित स्तोत्रके द्वारा दोनों हाथ जोड़ प्रसन्नतापूर्वक उत्तम वाणीमें परमेश्वर शिवकी स्तुति की। तत्पश्चात् वेदवेत्ता हिमाचलके आज्ञा देनेपर मुनियोंने बड़े उत्साहके साथ शिवाके सिरपर अभिषेक किया और महादेवजीका नाम लेकर उस अभिषेककी विधि पूरी की। मुने! उस समय बड़ा आनन्ददायक महोत्सव हो रहा था।

(अध्याय ४८)


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* विवाहमें कन्या-प्रतिग्रहके पश्चात् वर इस कामस्तुतिका पाठ करता है। पूरा मन्त्र इस प्रकार है— कोऽदात्कस्मा अदात्कामोऽदात्कामाय्यादात्कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामैतत्ते। (शु० यजुर्वेदसंहिता ७।४८)