शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३३४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
हमलोगों ने भलीभाँति दर्शन किया है।'
तदनन्तर हिमालयने विधिके द्वारा प्रेरित हो भगवान् शिवको अपनी कन्याका दान कर दिया। कन्यादान करते समय वे बोले—
इमां कन्यां तुभ्यमहं ददामि परमेश्वर।
भार्यार्थं परिगृह्णीष्व प्रसीद सकलेश्वर॥
'परमेश्वर! मैं अपनी यह कन्या आपको देता हूँ। आप इसे अपनी पत्नी बनानेके लिये ग्रहण करें! सर्वेश्वर! इस कन्यादानसे आप संतुष्ट हों।'
इस मन्त्रका उच्चारण करके हिमाचलने अपनी पुत्री त्रिलोकजननी पार्वतीको उन महान् देवता रुद्रके हाथमें दे दिया। इस प्रकार शिवाका हाथ शिवके हाथमें रखकर शैलराज मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उस समय वे अपने मनोरथके महासागरको पार कर गये थे। परमेश्वर महादेवजीने प्रसन्न हो वेदमन्त्रके उच्चारणपूर्वक गिरिजाके करकमलको शीघ्र अपने हाथमें ले लिया। मुने! लोकाचारके पालनकी आवश्यकता-को दिखाते हुए उन भगवान् शंकरने पृथ्वीका स्पर्श करके 'कोऽदात्०' * इत्यादि रूपसे कामसम्बन्धी मन्त्रका पाठ किया। उस समय वहाँ सब ओर महान् आनन्ददायक महोत्सव होने लगा। पृथ्वीपर, अन्तरिक्षमें तथा स्वर्गमें भी जय-जयकारका शब्द गूँजने लगा। सब लोग अत्यन्त हर्षसे भरकर साधुवाद देने और नमस्कार करने लगे। गन्धर्वगण प्रेमपूर्वक गाने लगे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। हिमाचलके नगरके लोग भी अपने मनमें परम आनन्दका अनुभव करने लगे। उस समय महान् उत्सवके साथ परम मंगल मनाया जाने लगा। मैं, विष्णु, इन्द्र, देवगण तथा सम्पूर्ण मुनि हर्षसे भर गये। हम सबके मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल उठे। तदनन्तर शैलराज हिमाचलने अत्यन्त प्रसन्न हो शिवके लिये कन्यादानकी यथोचित सांगता प्रदान की। तत्पश्चात् उनके बन्धुजनोंने भक्तिपूर्वक शिवाका पूजन करके नाना विधि-विधानसे भगवान् शिवको उत्तम द्रव्य समर्पित किया। हिमालयने दहेजमें अनेक प्रकारके द्रव्य, रत्न, पात्र, एक लाख सुसज्जित गौएँ, एक लाख सजे-सजाये घोड़े, करोड़ हाथी और उतने ही सुवर्णजटित रथ आदि वस्तुएँ दीं; इस प्रकार परमात्मा शिवको विधिपूर्वक अपनी पुत्री कल्याणमयी पार्वतीका दान करके हिमालय कृतार्थ हो गये। इसके बाद शैलराजने यजुर्वेदकी माध्यंदिनी शाखामें वर्णित स्तोत्रके द्वारा दोनों हाथ जोड़ प्रसन्नतापूर्वक उत्तम वाणीमें परमेश्वर शिवकी स्तुति की। तत्पश्चात् वेदवेत्ता हिमाचलके आज्ञा देनेपर मुनियोंने बड़े उत्साहके साथ शिवाके सिरपर अभिषेक किया और महादेवजीका नाम लेकर उस अभिषेककी विधि पूरी की। मुने! उस समय बड़ा आनन्ददायक महोत्सव हो रहा था।
(अध्याय ४८)
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* विवाहमें कन्या-प्रतिग्रहके पश्चात् वर इस कामस्तुतिका पाठ करता है। पूरा मन्त्र इस प्रकार है— कोऽदात्कस्मा अदात्कामोऽदात्कामाय्यादात्कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामैतत्ते। (शु० यजुर्वेदसंहिता ७।४८)
- रुद्रसंहिता * ३३५
शिवके विवाहका उपसंहार, उनके द्वारा दक्षिणा-वितरण, वर-वधूका कोहबर और वासभवनमें जाना, वहाँ स्त्रियोंका उनसे लोकाचारका पालन कराना, रतिकी प्रार्थनासे शिवद्वारा कामको जीवनदान एवं वर-प्रदान, वर-वधूका एक-दूसरेको मिष्टान्न भोजन कराना और शिवका जनवासेमें लौटना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तदनन्तर मेरी आज्ञा पाकर महेश्वरने ब्राह्मणोंद्वारा अग्निकी स्थापना करवायी और पार्वतीको अपने आगे बिठाकर वहाँ ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदके मन्त्रोंद्वारा अग्निमें आहुतियाँ दीं। तात! उस समय कालीके भाई मैनाकने लावाकी अंजलि दी और काली तथा शिव दोनोंने आहुति देकर लोकाचारका आश्रय ले प्रसन्नतापूर्वक अग्निदेवकी परिक्रमा की।
नारद! तदनन्तर शिवकी आज्ञासे मुनियोंसहित मैंने शिवा-शिव-विवाहका शेष कार्य प्रसन्नतापूर्वक पूरा किया। फिर उन दोनों दम्पतिके मस्तकका अभिषेक हुआ। ब्राह्मणोंने उन्हें आदरपूर्वक ध्रुवका दर्शन कराया। तत्पश्चात् हृदयालम्भनका कार्य हुआ। फिर बड़े उत्साहके साथ स्वस्तिवाचन किया गया। इसके पश्चात् ब्राह्मणोंकी आज्ञासे शिवने शिवाके सिरमें सिन्दूरदान किया। उस समय गिरिराजनन्दिनी उमाकी शोभा अद्भुत और अवर्णनीय हो गयी। फिर ब्राह्मणोंके आदेशसे वे शिव-दम्पति एक आसनपर विराजमान हो भक्तोंके चित्तको आनन्द देनेवाली उत्तम शोभा पाने लगे। मुने! तदनन्तर अद्भुत लीला करनेवाले उन नवदम्पतिने मेरी आज्ञा पाकर अपने स्थानपर आ संस्रवप्राशन* किया। इस प्रकार विधिपूर्वक उस वैवाहिक यज्ञके पूर्ण हो जानेपर भगवान् शिवने मुझ लोकस्रष्टा ब्रह्माको पूर्णपात्र दान किया। फिर शम्भुने आचार्यको गोदान किया। मंगलदायक जो बड़े-बड़े दान बताये गये हैं, वे भी सहर्ष सम्पन्न किये। तत्पश्चात् उन्होंने बहुत-से ब्राह्मणोंको पृथक्-पृथक् सौ-सौ सुवर्ण मुद्राएँ दीं। करोड़ों रत्न दान किये और अनेक प्रकारके द्रव्य बाँटे। उस समय सब देवता तथा दूसरे-दूसरे चराचर जीव मनमें बड़े प्रसन्न हुए और जोर-जोरसे जय-जयकारकी ध्वनि होने लगी। सब ओर मांगलिक शब्द और गीत होने लगे। वाद्योंकी मनोहर ध्वनि सबके आनन्दको बढ़ाने लगी। इसके बाद श्रीविष्णु, मैं, देवता, ऋषि तथा अन्य सब लोग गिरिराजसे आज्ञा ले बड़ी प्रसन्नताके साथ शीघ्र ही अपने-अपने डेरेमें चले आये। उस समय हिमालयनगरकी स्त्रियाँ आनन्दमग्न हो शिव और पार्वतीको लेकर कोहबरमें गयीं। वहाँ उन सबने आदरपूर्वक वर-वधूसे
* अग्निमें घीकी आहुति देकर स्रुवामें अवशिष्ट घृतको प्रोक्षणीपात्रमें डालनेकी विधि है। प्रत्येक आहुतिमें ऐसा किया जाता है। प्रोक्षणीपात्रमें डाले हुए घीको ही 'संस्रव' कहते हैं। अन्तमें यजमान उसे पीता है। इसीको 'संस्रवप्राशन' कहा गया है।
३३६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
लोकाचारका सम्पादन कराया। उस समय सब ओर परमानन्ददायक महान् उत्साह छा रहा था। तदनन्तर वे स्त्रियाँ उन लोक-कल्याणकारी दम्पतिको साथ ले परम दिव्य वासभवन (कौतुकागार)-में गयीं और वहाँ भी प्रसन्नतापूर्वक लोकाचारका सम्पादन किया। इसके बाद गिरिराजके नगरकी स्त्रियोंने समीप आकर मंगलकृत्य करके उन नवदम्पतिको केलिगृहमें पहुँचाया और जयध्वनि करती हुई उनके गँठबन्धनकी गाँठ खोलने आदिका कार्य सम्पन्न किया।
उस समय उन नूतन दम्पतिको देखनेके लिये सोलह दिव्य नारियाँ बड़े आदरके साथ शीघ्रतापूर्वक वहाँ आयीं। उनके नाम इस प्रकार हैं—सरस्वती, लक्ष्मी, सावित्री, गंगा, अदिति, शची, लोपामुद्रा, अरुन्धती, अहल्या, तुलसी, स्वाहा, रोहिणी, पृथिवी, शतरूपा, संज्ञा तथा रति। ये देवांगनाएँ तथा मनोहारिणी देवकन्या, नागकन्या और मुनिकन्याएँ भी वहाँ आ पहुँचीं। वहाँ जितनी स्त्रियाँ उपस्थित थीं, उन सबकी गणना करनेमें कौन समर्थ है? उनके दिये हुए रत्नमय सिंहासनपर भगवान् शिव प्रसन्नतापूर्वक बैठे। उस समय उन्होंने शिवसे नाना प्रकारकी विनोदपूर्ण बातें कहीं। तदनन्तर प्रसन्नचित्त हुए महेश्वरने अपनी पत्नीके साथ मिष्टान्न भोजन और आचमन करके कपूर डाला हुआ पान खाया।
इसी अवसरपर अनुकूल समय जान प्रसन्न हुई रतिने दीनवत्सल भगवान् शंकरसे कहा—'भगवन्! पार्वतीका पाणिग्रहण करके आपने अत्यन्त दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त किया है। बताइये, मेरे प्राणनाथको, जो सर्वथा स्वार्थरहित थे, आपने क्यों भस्म कर डाला? अब यहाँ मेरे पतिको जीवित कीजिये और अपने अन्तःकरणमें काम-सम्बन्धी व्यापारको जगाइये। आपको और मुझको जो समानरूपसे वियोगजनित संताप प्राप्त हुआ है, उसे दूर कीजिये। महेश्वर! आपके इस विवाहोत्सवमें सब लोग सुखी हुए हैं। केवल मैं ही अपने पतिके बिना दुःखमें डूबी हुई हूँ। देव! शंकर! प्रसन्न होइये और मुझे सनाथ कीजिये। दीनबन्धो! परम प्रभो! अपनी कही हुई बातको सत्य कीजिये। चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें आपके सिवा दूसरा कौन है, जो मेरे दुःखका नाश करनेमें समर्थ हो? ऐसा जानकर आप मुझपर दया कीजिये। दीनोंपर दया करनेवाले नाथ! सबको आनन्द प्रदान करनेवाले अपने इस विवाहोत्सवमें मुझे भी उत्सवसम्पन्न बनाइये। मेरे प्राणनाथके
* रुद्रसंहिता * ३३७
जीवित होनेपर ही अपनी प्रिया पार्वतीके साथ आपका सुन्दर विहार परिपूर्ण होगा। इसमें संशय नहीं है। सर्वेश्वर! आप सब कुछ करनेमें समर्थ हैं; क्योंकि आप ही परमेश्वर हैं। यहाँ अधिक कहनेसे क्या लाभ ? सर्वेश्वर! आप शीघ्र मेरे पतिको जीवित कीजिये।'
ऐसा कहकर रतिने गाँठमें बँधा हुआ कामदेवके शरीरका भस्म शम्भुको दे दिया और उनके सामने 'हा नाथ! हा नाथ!' कहकर रोने लगी। रतिका रोदन सुनकर सरस्वती आदि सभी देवियाँ रोने लगीं और अत्यन्त दीन वाणीमें बोलीं—'प्रभो! आपका नाम भक्तवत्सल है। आप दीनबन्धु और दयाके सागर हैं। अतः कामको जीवनदान दीजिये और रतिको उत्साहित कीजिये। आपको नमस्कार है।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! उन सबकी यह बात सुनकर महेश्वर प्रसन्न हो गये। उन करुणासागर प्रभुने तत्काल ही रतिपर कृपा की। भगवान् शूलपाणिकी अमृतमयी दृष्टि पड़ते ही पहले-जैसे रूप, वेष और चिह्नसे युक्त अद्भुत मूर्तिधारी सुन्दर कामदेव उस भस्मसे प्रकट हो गया। अपने पतिको वैसे ही रूप, आकृति, मन्द मुसकान और धनुष-बाणसे युक्त देख रतिने महेश्वरको प्रणाम किया। वह कृतार्थ हो गयी। उसने प्राणनाथकी प्राप्ति करानेवाले भगवान् शिवका अपने जीवित पतिके साथ हाथ जोड़कर बारंबार स्तवन किया। पत्नीसहित कामकी की हुई स्तुतिको सुनकर दयार्द्रहृदय भगवान् शंकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले।
शंकरने कहा—मनोभव! पत्नीसहित तुमने जो स्तुति की है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। स्वयं प्रकट होनेवाले काम! तुम वर माँगो। मैं तुम्हें मनोवांछित वस्तु दूँगा।
शम्भुका यह वचन सुनकर कामदेव महान् आनन्दमें निमग्न हो गया और हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर गद्गद वाणीमें बोला।
कामदेवने कहा—देवदेव महादेव! करुणासागर प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मेरे लिये आनन्ददायक होइये। प्रभो! पूर्वकालमें मैंने जो अपराध किया था, उसे क्षमा कीजिये। स्वजनोंके प्रति परम प्रेम और अपने चरणोंकी भक्ति दीजिये।
कामदेवका यह कथन सुनकर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो बोले—'बहुत अच्छा!' इसके बाद उन करुणानिधिने हँसकर कहा—'महामते कामदेव! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम अपने मनसे भयको निकाल दो। भगवान् विष्णुके पास जाओ और इस घरसे बाहर ही रहो।'
तदनन्तर काम शिवजीको प्रणाम करके बाहर आ गया। विष्णु आदि देवताओंने उसे आशीर्वाद दिया। इसके बाद भगवान् शंकरने उस वासभवनमें पार्वतीको बायें बिठाकर मिष्टान्न भोजन कराया और पार्वतीने भी प्रसन्नतापूर्वक उनका मुँह मीठा किया। तदनन्तर वहाँ लोकाचारका पालन करते हुए आवश्यक कृत्य करके मेना और हिमवान्की आज्ञा ले भगवान् शिव जनवासेमें चले गये। मुने! उस समय महान् उत्सव हुआ और वेदमन्त्रोंकी ध्वनि होने लगी। लोग चारों प्रकारके* बाजे बजाने लगे। जनवासेमें अपने
* अमरकोशमें जो चार प्रकारके बाजे बताये गये हैं, संसारके सभी प्राचीन अथवा अर्वाचीन वाद्य उन्हींके अन्तर्गत हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—तत, आनद्ध, सुषिर और घन। 'तत' वह बाजा है, जिसमें
३३८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
स्थानपर पहुँचकर शिवने लोकाचारवश मुनियोंको प्रणाम किया। श्रीहरिको और मुझे भी मस्तक झुकाया। फिर सब देवता आदिने उनकी वन्दना की। उस समय वहाँ जय-जयकार, नमस्कार तथा समस्त विघ्नोंका विनाश करनेवाली शुभदायिनी वेदध्वनि भी होने लगी। इसके बाद मैंने, भगवान् विष्णुने तथा इन्द्र, ऋषि और सिद्ध आदिने भी शंकरजीकी स्तुति की। गिरिजानायक महेश्वरकी स्तुति करके वे विष्णु आदि देवता प्रसन्नतापूर्वक उनकी यथोचित सेवामें लग गये। तत्पश्चात् लीलापूर्वक शरीर धारण करनेवाले महेश्वर शम्भुने उन सबको सम्मान दिया। फिर उन परमेश्वरकी आज्ञा पाकर वे विष्णु आदि देवता अत्यन्त प्रसन्न हो अपने-अपने विश्रामस्थानको गये।
(अध्याय ४९—५१)
रातको परम सुन्दर सजे हुए वासगृहमें शयन करके प्रातःकाल भगवान् शिवका जनवासेमें आगमन
ब्रह्माजी कहते हैं—तात! तदनन्तर भाग्यवानोंमें श्रेष्ठ और चतुर गिरिराज हिमवान्ने बारातियोंको भोजन करानेके लिये अपने आँगनको सुन्दर ढंगसे सजाया तथा अपने पुत्रों एवं अन्यान्य पर्वतोंको भेजकर शिवसहित सब देवताओंको भोजनके लिये बुलाया। जब सब लोग आ गये, तब उनको बड़े आदरके साथ उत्तमोत्तम भोज्य पदार्थोंका भोजन कराया। भोजनके पश्चात् हाथ-मुँह धो, कुल्ला करके विष्णु आदि सब देवता विश्रामके लिये प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने डेरेमें गये। मेनाकी आज्ञासे साध्वी स्त्रियोंने भगवान् शिवसे भक्तिपूर्वक प्रार्थना करके उन्हें महान् उत्सवसे परिपूर्ण सुन्दर वास-भवनमें ठहराया। मेनाके दिये हुए मनोहर रत्न-सिंहासनपर बैठकर आनन्दित हुए शम्भुने उस वासमन्दिरका निरीक्षण किया। वह भवन प्रज्वलित हुए सैकड़ों रत्नमय प्रदीपोंके कारण अद्भुत प्रभासे उद्भासित हो रहा था। वहाँ रत्नमय पात्र तथा रत्नोंके ही कलश रखे गये थे। मोती और मणियोंसे सारा भवन जगमगा रहा था। रत्नमय दर्पणकी शोभासे सम्पन्न तथा श्वेत चँवरोंसे अलंकृत था। मुक्ता-मणियोंकी सुन्दर मालाओं (बंदनवारों)-से आवेष्टित हुआ वह वासभवन बड़ा समृद्धिशाली दिखायी देता था। उसकी कहीं उपमा नहीं थी। वह महादिव्य, अतिविचित्र, परम मनोहर तथा मनको आह्लाद प्रदान करनेवाला था। उसके फर्शपर नाना प्रकारकी रचनाएँ की गयी थीं—बेलबूटे निकाले गये थे। शिवजीके दिये हुए वरका ही महान् एवं अनुपम प्रभाव
तारका विस्तार हो—जैसे वीणा, सितार आदि। जिसे चमड़ेसे मढ़ाकर कसा गया हो, वह 'आनद्ध' कहलाता है—जैसे ढोल, मृदंग, नगारा आदि। जिसमें छेद हो और उसमें हवा भरकर स्वर निकाला जाता हो, उसे 'सुषिर' कहते हैं—जैसे वंशी, शंख, विगुल, हारमोनियम आदि। काँसेके झाँझ आदिको 'घन' कहते हैं।
* रुद्रसंहिता * ३३९
दिखाता हुआ वह शोभाशाली भवन शिवलोकके नामसे प्रसिद्ध किया गया था। नाना प्रकारके सुगन्धित श्रेष्ठ द्रव्योंसे सुवासित तथा सुन्दर प्रकाशसे परिपूर्ण था। वहाँ चन्दन और अगरकी सम्मिलित गन्ध फैल रही थी। उस भवनमें फूलोंकी सेज बिछी हुई थी। विश्वकर्माका बनाया हुआ वह भवन नाना प्रकारके विचित्र चित्रोंसे सुसज्जित था। श्रेष्ठ रत्नोंकी सारभूत मणियोंसे निर्मित सुन्दर हारोंद्वारा उस वासगृहको अलंकृत किया गया था। उसमें विश्वकर्माद्वारा निर्मित कृत्रिम वैकुण्ठ, ब्रह्मलोक, कैलास, इन्द्रभवन तथा शिवलोक आदि दीख रहे थे। ऐसे आश्चर्यजनक शोभासे सम्पन्न उस वासभवनको देखकर गिरिराज हिमालयकी प्रशंसा करते हुए भगवान् महेश्वर बहुत संतुष्ट हुए। वहाँ अति रमणीय रत्नजटित उत्तम पलंगपर परमेश्वर शिव बड़ी प्रसन्नतासे लीलापूर्वक सोये। इधर हिमालयने बड़ी प्रसन्नतासे अपने समस्त भाई-बन्धुओं एवं दूसरे लोगोंको भी भोजन कराया तथा जो कार्य शेष रह गये थे, उन्हें भी पूर्ण किया।
शैलराज हिमालय इस प्रकार आवश्यक कार्यमें लगे हुए थे और प्रियतम परमेश्वर शिव शयन कर रहे थे। इतनेमें ही सारी रात बीत गयी और प्रातःकाल हो गया। प्रभातकाल होनेपर धैर्यवान् और उत्साही पुरुष नाना प्रकारके बाजे बजाने लगे। उस समय श्रीविष्णु आदि सब देवता सानन्द उठे और अपने इष्टदेव देवेश्वर शिवका स्मरण करके वहाँसे कैलासको चलनेके लिये जल्दी-जल्दी तैयार हो गये। उन्होंने अपने वाहन भी सुसज्जित कर लिये। तत्पश्चात् धर्मको शिवके समीप भेजा। योगशक्तिसे सम्पन्न धर्म नारायणकी आज्ञासे वासगृहमें पहुँचकर योगीश्वर शंकरसे समयोचित बात बोले—‘प्रमथगणोंके स्वामी महेश्वर! उठिये, उठिये; आपका कल्याण हो। आप हमारे लिये भी कल्याणकारी होइये; जनवासेमें चलिये और वहाँ सब देवताओंको कृतार्थ कीजिये।’
धर्मकी यह बात सुनकर भगवान् महेश्वर हँसे। उन्होंने धर्मको कृपादृष्टिसे देखा और शय्या त्याग दी। इसके बाद धर्मसे हँसते हुए कहा—‘तुम आगे चलो। मैं भी वहाँ शीघ्र ही आऊँगा, इसमें संशय नहीं है।’
भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर धर्म जनवासेमें गये। तत्पश्चात् शम्भु भी स्वयं वहाँ जानेको उद्यत हुए। यह जानकर महान् उत्सव मनाती हुई स्त्रियाँ वहाँ आयीं और भगवान् शम्भुके युगल चरणारविन्दोंका दर्शन करती हुई मंगलगान करने लगीं। तदनन्तर लोकाचारका पालन करते हुए शम्भु प्रातःकालिक कृत्य करके मेना और हिमालयकी आज्ञा ले जनवासेको गये। मुने! उस समय बड़ा भारी उत्सव हुआ। वेदमन्त्रोंकी ध्वनि होने लगी और लोग चारों प्रकारके बाजे बजाने लगे। अपने स्थानपर आकर शम्भुने लोकाचारवश मुनियोंको, विष्णुको और मुझको प्रणाम किया। फिर देवता आदिने उनकी वन्दना की। उस समय जय-जयकार, नमस्कार तथा वेदमन्त्रोच्चारणकी मंगलदायिनी ध्वनि होने लगी। इससे सब ओर कोलाहल छा गया। (अध्याय ५२)
३४० * संक्षिप्त शिवपुराण *
चतुर्थीकर्म, बारातका कई दिनोंतक ठहरना, सप्तर्षियोंके समझानेसे हिमालयका बारातको विदा करनेके लिये राजी होना, मेनाका शिवको अपनी कन्या सौंपना तथा बारातका पुरीके बाहर जाकर ठहरना
ब्रह्माजी कहते हैं—तदनन्तर विष्णु आदि देवता तथा ऋषि कैलास लौटनेका विचार करने लगे। तब हिमालयने जनवासेमें आकर सबको भोजनके लिये निमन्त्रित किया। तत्पश्चात् देवेश्वर शिवको आमन्त्रित करके हिमाचल अपने घरको गये और नाना प्रकारके विधानसे भोजनोत्सवकी तैयारी करने लगे। उन्होंने प्रसन्नता और उत्कण्ठाके साथ भोजनके लिये परिवारसहित भगवान् शिवको यथोचित रीतिसे अपने घर बुलवाया। शम्भुके, विष्णुके, मेरे, अन्य सब देवताओंके, मुनियोंके तथा वहाँ आये हुए अन्य सब लोगोंके भी चरणोंको बड़े आदरके साथ धोकर उन सबको गिरिराजने मण्डपके भीतर सुन्दर आसनोंपर बिठाया। फिर अपने भाई-बन्धुओंको साथ लेकर उनके सहयोगसे उन सब अतिथियोंको नाना प्रकारके सरस पदार्थोंद्वारा पूर्णतया तृप्त किया। मेरे, विष्णुके तथा शम्भुके साथ सब लोगोंने अच्छी तरह भोजन किया। नारद! विधिवत् भोजन और आचमन करके तृप्त और प्रसन्न हुए सब लोग हिमालयसे आज्ञा ले अपने-अपने डेरेपर गये। मुने! इसी प्रकार तीसरे दिन भी गिरिराजने विधिवत् दान, मान और आदर आदिके द्वारा उन सबका सत्कार किया। चौथा दिन आनेपर शुद्धतापूर्वक सविधि चतुर्थीकर्म हुआ, जिसके बिना विवाहयज्ञ अधूरा ही रह जाता है। उस समय नाना प्रकारका उत्सव हुआ। साधुवाद और जय-जयकारकी ध्वनि हुई। बहुत-से सुन्दर दान दिये गये। भाँति-भाँतिके सुन्दर गान और नृत्य हुए। पाँचवें दिन सब देवताओंने बड़े हर्ष और अत्यन्त प्रेमके साथ शैलराजको सूचित किया कि 'अब हमलोग यहाँसे जाना चाहते हैं। आप आज्ञा प्रदान करें।' उनकी यह बात सुन गिरिराज हिमवान् हाथ जोड़कर बोले—'देवगण! आपलोग कुछ दिन और ठहरें तथा मुझपर कृपा करें।' यों कहकर उन्होंने स्नेहके साथ उन देवताओंको, भगवान् शिवको, विष्णुको, मुझको तथा अन्य लोगोंको बहुत दिनोंतक ठहराया और प्रतिदिन विशेष आदर-सत्कार किया।
इस प्रकार देवताओंके वहाँ रहते हुए बहुत दिन बीत गये, तब उन सबने गिरिराजके पास सप्तर्षियोंको भेजा। सप्तर्षियोंने हिमवान् और मेनासे समयोचित बात कहकर उन्हें समझाया, परम शिवतत्त्वका वर्णन किया तथा प्रसन्नतापूर्वक उनके सौभाग्यकी सराहना की। मुने! उनके समझानेसे गिरिराजने बारातको विदा करना स्वीकार कर लिया। तत्पश्चात् भगवान् शम्भु यात्राके लिये उद्यत हो देवता आदिके साथ शैलराजके पास आये। देवेश्वर शिव देवताओंसहित कैलासकी यात्राके लिये जब उद्यत हुए, उस समय मेना उच्चस्वरसे रोने लगीं और उन कृपानिधानसे बोलीं।
मेनाने कहा—कृपानिधे! कृपा करके मेरी शिवाका भलीभाँति लालन-पालन कीजियेगा। आप आशुतोष हैं। पार्वतीके
* रुद्रसंहिता * ३४१
सहस्रों अपराधोंको भी क्षमा कीजियेगा। मेरी बच्ची जन्म-जन्ममें आपके चरणारविन्दोंकी भक्त रही है और रहेगी। उसे सोते और जागते समय भी अपने स्वामी महादेवके सिवा दूसरी किसी वस्तुकी सुध नहीं रहती। मृत्युंजय ! आपके प्रति भक्तिभावकी बातें सुनते ही यह हर्षके आँसू बहाती हुई पुलकित हो उठती है और आपकी निन्दा सुनकर ऐसा मौन साध लेती है, मानो मर ही गयी हो !
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! ऐसा कहकर मेनकाने अपनी बेटी शिवको सौंप दी और उन दोनोंके सामने ही उच्चस्वरसे रोती हुई वह मूर्च्छित हो गयी। तब महादेवजीने मेनाको समझाकर सचेत किया और उनसे विदा ले देवताओंके साथ महान् उत्सवपूर्वक यात्रा की। वे सब देवता अपने स्वामी शिव तथा सेवकगणोंके साथ चुपचाप कैलास पर्वतकी ओर प्रस्थित हुए। वे मन-ही-मन शिवका चिन्तन कर रहे थे। हिमाचलपुरीके बाहरी बगीचेमें आकर शिवसहित सब देवता हर्ष और उत्साहके साथ ठहर गये और शिवाके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे। मुनीश्वर ! इस प्रकार देवताओंसहित शिवकी श्रेष्ठ यात्राका वर्णन किया गया। अब शिवाकी यात्राका वर्णन सुनो, जो विरहव्यथा और आनन्द दोनोंसे संयुक्त है।
(अध्याय ५३)
मेनाकी इच्छाके अनुसार एक ब्राह्मण-पत्नीका पार्वतीको पतिव्रतधर्मका उपदेश देना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! तदनन्तर सप्तर्षियोंने हिमालयसे कहा—‘गिरिराज ! अब आप अपनी पुत्री पार्वतीदेवीकी यात्राका उचित प्रबन्ध करें।’ मुनीश्वर ! यह सुनकर पार्वतीके भावी विरहका अनुभव करके गिरिराज कुछ कालतक अधिक प्रेमके कारण विषादमें डूबे रह गये। कुछ देर बाद सचेत हो शैलराजने ‘तथास्तु’ कहकर मेनाको संदेश दिया। मुने ! हिमवान्का संदेश पाकर हर्ष और शोकके वशीभूत हुई मेना पार्वतीको विदा करनेके लिये उद्यत हुईं। शैलराजकी प्यारी पत्नी मेनाने विधिपूर्वक वैदिक एवं लौकिक कुलाचारका पालन किया और उस समय नाना प्रकारके उत्सव मनाये। फिर उन्होंने नाना प्रकारके रत्नजटित सुन्दर वस्त्रों और बारह आभूषणोंद्वारा राजोचित श्रृंगार करके पार्वतीको विभूषित किया। तत्पश्चात् मेनाके मनोभावको जानकर एक सती-साध्वी ब्राह्मणपत्नीने गिरिजाको उत्तम पातिव्रत्यकी शिक्षा दी।
ब्राह्मणपत्नी बोली—गिरिराजकिशोरी ! तुम प्रेमपूर्वक मेरा यह वचन सुनो। यह धर्मको बढ़ानेवाला, इहलोक और परलोकमें भी आनन्द देनेवाला तथा श्रोताओंको भी सुखकी प्राप्ति करानेवाला है। संसारमें पतिव्रता नारी ही धन्य है, दूसरी नहीं। वही विशेषरूपसे पूजनीय है। पतिव्रता सब लोगोंको पवित्र करनेवाली और समस्त पापराशिको नष्ट कर देनेवाली है। शिवे ! जो पतिको परमेश्वरके समान मानकर प्रेमसे उसकी सेवा करती है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करके अन्तमें
३४२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
कल्याणमयी गतिको पाती है।$^{१}$ सावित्री, लोपामुद्रा, अरुन्धती, शाण्डिली, शतरूपा, अनसूया, लक्ष्मी, स्वधा, सती, संज्ञा, सुमति, श्रद्धा, मेना और स्वाहा—ये तथा और भी बहुत-सी स्त्रियाँ साध्वी कही गयी हैं। यहाँ विस्तारभयसे उनका नाम नहीं लिया गया। वे अपने पातिव्रत्यके बलसे ही सब लोगोंकी पूजनीया तथा ब्रह्मा, विष्णु, शिव एवं मुनीश्वरोंकी भी माननीया हो गयी हैं। इसलिये तुम्हें अपने पति भगवान् शंकरकी सदा सेवा करनी चाहिये। वे दीनदयालु, सबके सेवनीय और सत्पुरुषोंके आश्रय हैं। श्रुतियों और स्मृतियोंमें पातिव्रत्यधर्मको महान् बताया गया है। इसको जैसा श्रेष्ठ बताया जाता है, वैसा दूसरा धर्म नहीं है—यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है।
पातिव्रत्य-धर्ममें तत्पर रहनेवाली स्त्री अपने प्रिय पतिके भोजन कर लेनेपर ही भोजन करे। शिवे! जब पति खड़ा हो, तब साध्वी स्त्रीको भी खड़ी ही रहनी चाहिये। शुद्धबुद्धिवाली साध्वी स्त्री प्रतिदिन अपने पतिके सो जानेपर सोये और उसके जागनेसे पहले ही जग जाय। वह छल-कपट छोड़कर सदा उसके लिये हितकर कार्य ही करे। शिवे! साध्वी स्त्रीको चाहिये कि जबतक वस्त्राभूषणोंसे विभूषित न हो ले तबतक वह अपनेको पतिकी दृष्टिके सम्मुख न लाये। यदि पति किसी कार्यसे परदेशमें गया हो तो उन दिनों उसे कदापि शृंगार नहीं करना चाहिये। पतिव्रता स्त्री कभी पतिका नाम न ले। पतिके कटुवचन कहनेपर भी वह बदलेमें कड़ी बात न कहे। पतिके बुलानेपर वह घरके सारे कार्य छोड़कर तुरंत उसके पास चली जाय और हाथ जोड़ प्रेमसे मस्तक झुकाकर पूछे—'नाथ! किसलिये इस दासीको बुलाया है? मुझे सेवाके लिये आदेश देकर अपनी कृपासे अनुगृहीत कीजिये।' फिर पति जो आदेश दे, उसका वह प्रसन्न हृदयसे पालन करे। वह घरके दरवाजेपर देरतक खड़ी न रहे। दूसरेके घर न जाय। कोई गोपनीय बात जानकर हर एकके सामने उसे प्रकाशित न करे। पतिके बिना कहे ही उनके लिये पूजन-सामग्री स्वयं जुटा दे तथा उनके हितसाधनके यथोचित अवसरकी प्रतीक्षा करती रहे। पतिकी आज्ञा लिये बिना कहीं तीर्थयात्राके लिये भी न जाय। लोगोंकी भीड़से भरी हुई सभा या मेले आदिके उत्सवोंका देखना वह दूरसे ही त्याग दे। जिस नारीको तीर्थयात्राका फल पानेकी इच्छा हो, उसे अपने पतिका चरणोदक पीना चाहिये। उसके लिये उसीमें सारे तीर्थ और क्षेत्र हैं, इसमें संशय नहीं है।$^{२}$
पतिव्रता नारी पतिके उच्छिष्ट अन्न आदिको परम प्रिय भोजन मानकर ग्रहण करे और पति जो कुछ दे, उसे महाप्रसाद मानकर शिरोधार्य करे। देवता, पितर, अतिथि, सेवकवर्ग,
१. धन्या पतिव्रता नारी नान्या पूज्या विशेषतः। पावनी सर्वलोकानां सर्वपापौघनाशिनी ॥
सेवते या पतिं प्रेम्णा परमेश्वरवच्छिवे। इह भुक्त्वाखिलान्भोगानन्ते पत्या शिवां गतिम् ॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ९-१०)
२. तीर्थार्थिनी तु या नारी पतिपादोदकं पिबेत्। तस्मिन् सर्वाणि तीर्थानि क्षेत्राणि च न संशयः ॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। २५)
* रुद्रसंहिता * ३४३
गौ तथा भिक्षुसमुदायके लिये अन्नका भाग दिये बिना कदापि भोजन न करे। पातिव्रत-धर्ममें तत्पर रहनेवाली गृहदेवीको चाहिये कि वह घरकी सामग्रीको संयत एवं सुरक्षित रखे। गृहकार्यमें कुशल हो, सदा प्रसन्न रहे और खर्चकी ओरसे हाथ खींचे रहे। पतिकी आज्ञा लिये बिना उपवासव्रत आदि न करे, अन्यथा उसे उसका कोई फल नहीं मिलता और वह परलोकमें नरकगामिनी होती है। पति सुखपूर्वक बैठा हो या इच्छानुसार क्रीडाविनोद अथवा मनोरंजनमें लगा हो, उस अवस्थामें कोई आन्तरिक कार्य आ पड़े तो भी पतिव्रता स्त्री अपने पतिको कदापि न उठाये। पति नपुंसक हो गया हो, दुर्गतिमें पड़ा हो, रोगी हो, बूढ़ा हो, सुखी हो अथवा दुःखी हो, किसी भी दशामें नारी अपने उस एकमात्र पतिका उल्लंघन न करे। रजस्वला होनेपर वह तीन रात्रितक पतिको अपना मुँह न दिखाये अर्थात् उससे अलग रहे। जबतक स्नान करके शुद्ध न हो जाय, तबतक अपनी कोई बात भी वह पतिके कानोंमें न पड़ने दे। अच्छी तरह स्नान करनेके पश्चात् सबसे पहले वह अपने पतिके मुखका दर्शन करे, दूसरे किसीका मुँह कदापि न देखे अथवा मन-ही-मन पतिका चिन्तन करके सूर्यका दर्शन करे। पतिकी आयु बढ़नेकी अभिलाषा रखनेवाली पतिव्रता नारी हल्दी, रोली, सिन्दूर, काजल आदि; चोली, पान, मांगलिक आभूषण आदि; केशोंका सँवारना, चोटी गूँथना तथा हाथ-कानके आभूषण—इन सबको अपने शरीरसे दूर न करे। धोबिन, छिनाल या कुलटा, संन्यासिनी और भाग्यहीना स्त्रियोंको वह कभी अपनी सखी न बनाये। पतिसे द्वेष रखनेवाली स्त्रीका वह कभी आदर न करे। कहीं अकेली न खड़ी हो। कभी नंगी होकर न नहाये। सती स्त्री ओखली, मूसल, झाडू, सिल, जाँत और द्वारके चौखटके नीचेवाली लकड़ीपर कभी न बैठे। मैथुनकालके सिवा और किसी समयमें वह पतिके सामने धृष्टता न करे। जिस-जिस वस्तुमें पतिकी रुचि हो, उससे वह स्वयं भी प्रेम करे। पतिव्रता देवी सदा पतिका हित चाहनेवाली होती है। वह पतिके हर्षमें हर्ष माने। पतिके मुखपर विषादकी छाया देख स्वयं भी विषादमें डूब जाय तथा वह प्रियतम पतिके प्रति ऐसा बर्ताव करे, जिससे वह उन्हें प्यारी लगे। पुण्यात्मा पतिव्रता स्त्री सम्पत्ति और विपत्तिमें भी पतिके लिये एक-सी रहे। अपने मनमें कभी विकार न आने दे और सदा धैर्य धारण किये रहे। घी, नमक, तेल आदिके समाप्त हो जानेपर भी पतिव्रता स्त्री पतिसे सहसा यह न कहे कि अमुक वस्तु नहीं है। वह पतिको कष्ट या चिन्तामें न डाले। देवेश्वरि ! पतिव्रता नारीके लिये एकमात्र पति ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवसे भी अधिक माना गया है। उसके लिये अपना पति शिवरूप ही है*। जो पतिकी आज्ञाका उल्लंघन करके व्रत और उपवास आदिके नियमका पालन करती है, वह पतिकी आयु हर लेती है और मरनेपर नरकमें जाती है। जो स्त्री पतिके कुछ
* विधेर्विष्णोर्हराद्वापि पतिरेकोऽधिको मतः। पतिव्रताया देवेशि स्वपतिः शिव एव च॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ४३)
३४४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
कहनेपर क्रोधपूर्वक कठोर उत्तर देती है वह गाँवमें कुतिया और निर्जन वनमें सियारिन होती है। नारी पतिसे ऊँचे आसनपर न बैठे, दुष्ट पुरुषके निकट न जाय और पतिसे कभी कातर वचन न बोले। किसीकी निन्दा न करे। कलहको दूरसे ही त्याग दे। गुरुजनोंके निकट न तो उच्चस्वरसे बोले और न हँसे। जो बाहरसे पतिको आते देख तुरंत अन्न, जल, भोज्य वस्तु, पान और वस्त्र आदिसे उनकी सेवा करती है, उनके दोनों चरण दबाती है, उनसे मीठे वचन बोलती है तथा प्रियतमके खेदको दूर करनेवाले अन्यान्य उपायोंसे प्रसन्नतापूर्वक उन्हें संतुष्ट करती है, उसने मानो तीनों लोकोंको तृप्त एवं संतुष्ट कर दिया। पिता, भाई और पुत्र परिमित सुख देते हैं, परंतु पति असीम सुख देता है। अतः नारीको सदा अपने पतिका पूजन— आदर-सत्कार करना चाहिये। पति ही देवता है, पति ही गुरु है और पति ही धर्म, तीर्थ एवं व्रत है; इसलिये सबको छोड़कर एकमात्र पतिकी ही आराधना करनी चाहिये।$^१$
जो दुर्बुद्धि नारी अपने पतिको त्यागकर एकान्तमें विचरती है (या व्यभिचार करती है), वह वृक्षके खोखलेमें शयन करनेवाली क्रूर उलूकी होती है। जो पराये पुरुषको कटाक्षपूर्ण दृष्टिसे देखती है, वह ऐंचातानी देखनेवाली होती है। जो पतिको छोड़कर अकेले मिठाई खाती है, वह गाँवमें सूअरी होती है अथवा बकरी होकर अपनी ही विष्ठा खाती है। जो पतिको तू कहकर बोलती है, वह गूँगी होती है। जो सौतसे सदा ईर्ष्या रखती है, वह दुर्भाग्यवती होती है। जो पतिकी आँख बचाकर किसी दूसरे पुरुषपर दृष्टि डालती है, वह कानी, टेढ़े मुँहवाली तथा कुरूपा होती है। जैसे निर्जीव शरीर तत्काल अपवित्र हो जाता है, उसी तरह पतिहीना नारी भलीभाँति स्नान करनेपर भी सदा अपवित्र ही रहती है। लोकमें वह माता धन्य है, वह जन्मदाता पिता धन्य है तथा वह पति भी धन्य है, जिसके घरमें पतिव्रता देवी वास करती है। पतिव्रताके पुण्यसे पिता, माता और पतिके कुलोंकी तीन-तीन पीढ़ियोंके लोग स्वर्गलोकमें सुख भोगते हैं।$^२$ जो दुराचारिणी स्त्रियाँ अपना शील भंग कर देती हैं, वे अपने माता-पिता और पति तीनोंके कुलोंको नीचे गिराती हैं तथा इस लोक और परलोकमें भी दुःख भोगती हैं। पतिव्रताका पैर जहाँ-जहाँ पृथ्वीका स्पर्श करता है, वहाँ-वहाँकी भूमि पापहारिणी तथा परम पावन बन जाती है।$^३$ भगवान् सूर्य, चन्द्रमा तथा वायुदेव भी अपने-आपको पवित्र करनेके लिये ही पतिव्रताका
१-भर्ता देवो गुरुर्भर्ता धर्मतीर्थव्रतानि च। तस्मात्सर्वं परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत्॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ५१)
२-सा धन्या जननी लोके स धन्यो जनकः पिता। धन्यः स च पतिर्यस्य गृहे देवी पतिव्रता॥
पितृवंश्या मातृवंश्याः पतिवंश्यास्त्रयस्त्रयः। पतिव्रतायाः पुण्येन स्वर्गे सौख्यानि भुञ्जते॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ५८-५९)
३-पतिव्रतायाश्चरणो यत्र यत्र स्पृशेद्वुवम्। तत्र तत्र भवेत् सा हि पापहन्त्री सुपावनी॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ६१)
* रुद्रसंहिता * ३४५
स्पर्श करते हैं और किसी दृष्टिसे नहीं। जल भी सदा पतिव्रताका स्पर्श करना चाहता है और उसका स्पर्श करके वह अनुभव करता है कि आज मेरी जड़ताका नाश हो गया तथा आज मैं दूसरोंको पवित्र करनेवाला बन गया। भार्या ही गृहस्थ-आश्रमकी जड़ है, भार्या ही सुखका मूल है, भार्यासे ही धर्मके फलकी प्राप्ति होती है तथा भार्या ही संतानकी वृद्धिमें कारण है।$^१$
क्या घर-घरमें अपने रूप और लावण्य-पर गर्व करनेवाली स्त्रियाँ नहीं हैं? परंतु पतिव्रता स्त्री तो विश्वनाथ शिवके प्रति भक्ति होनेसे ही प्राप्त होती है। भार्यासे इस लोक और परलोक दोनोंपर विजय पायी जा सकती है। भार्याहीन पुरुष देवयज्ञ, पितृयज्ञ और अतिथियज्ञ करनेका अधिकारी नहीं होता। वास्तवमें गृहस्थ वही है, जिसके घरमें पतिव्रता स्त्री है। दूसरी स्त्री तो पुरुषको उसी तरह अपना ग्रास (भोग्य) बनाती है, जैसे जरावस्था एवं राक्षसी। जैसे गंगास्नान करनेसे शरीर पवित्र होता है, उसी प्रकार पतिव्रता स्त्रीका दर्शन करनेपर सब कुछ पावन हो जाता है।$^२$ पतिको ही इष्टदेव माननेवाली सती नारी और गंगामें कोई भेद नहीं है। पतिव्रता और उसके पतिदेव उमा और महेश्वरके समान हैं, अतः विद्वान् मनुष्य उन दोनोंका पूजन करे। पति प्रणव है और नारी वेदकी ऋचा; पति तप है और स्त्री क्षमा; नारी सत्कर्म है और पति उसका फल। शिवे! सती नारी और उसके पति—दोनों दम्पती धन्य हैं$^३$।
गिरिराजकुमारी! इस प्रकार मैंने तुमसे पतिव्रताधर्मका वर्णन किया है। अब तुम सावधान हो आज मुझसे प्रसन्नतापूर्वक पतिव्रताके भेदोंका वर्णन सुनो। देवि! पतिव्रता नारियाँ उत्तमा आदि भेदसे चार प्रकारकी बतायी गयी हैं, जो अपना स्मरण करनेवाले पुरुषोंका सारा पाप हर लेती हैं। उत्तमा, मध्यमा, निकृष्टा और
१-भार्या मूलं गृहस्थस्य भार्या मूलं सुखस्य च। भार्या धर्मफलावाप्त्यै भार्या संतानवृद्धये॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ६४)
२-यथा गङ्गावगाहेन शरीरं पावनं भवेत्। तथा पतिव्रतां दृष्ट्वा सकलं पावनं भवेत्॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ६८)
३-तारः पतिः श्रुतिर्नारी क्षमा सा स स्वयं तपः। फलं पतिः सत्क्रिया सा धन्यौ तौ दम्पती शिवे॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ७०)
३४६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
अतिनिकृष्टा—ये पतिव्रताके चार भेद हैं। अब मैं इनके लक्षण बताती हूँ। ध्यान देकर सुनो। भद्रे! जिसका मन सदा स्वप्नमें भी अपने पतिको ही देखता है, दूसरे किसी परपुरुषको नहीं, वह स्त्री उत्तमा या उत्तम श्रेणीकी पतिव्रता कही गयी है। शैलजे! जो दूसरे पुरुषको उत्तम बुद्धिसे पिता, भाई एवं पुत्रके समान देखती है, उसे मध्यम श्रेणीकी पतिव्रता कहा गया है। पार्वती! जो मनसे अपने धर्मका विचार करके व्यभिचार नहीं करती, सदाचारमें ही स्थित रहती है, उसे निकृष्टा अथवा निम्नश्रेणीकी पतिव्रता कहा गया है। जो पतिके भयसे तथा कुलमें कलंक लगनेके डरसे व्यभिचारसे बचनेका प्रयत्न करती है, उसे पूर्वकालके विद्वानोंने अतिनिकृष्टा अथवा निम्नतम कोटिकी पतिव्रता बताया है। शिवे! ये चारों प्रकारकी पतिव्रताएँ समस्त लोकोंका पाप नाश करनेवाली और उन्हें पवित्र बनानेवाली हैं। अत्रिकी स्त्री अनसूयाने ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीनों देवताओंकी प्रार्थनासे पातिव्रत्यके प्रभावका उपभोग करके वाराहके शापसे मरे हुए एक ब्राह्मणको जीवित कर दिया था। शैलकुमारी शिवे! ऐसा जानकर तुम्हें नित्य प्रसन्नतापूर्वक पतिकी सेवा करनी चाहिये। पतिसेवन सदा समस्त अभीष्ट फलोंको देनेवाला है। तुम साक्षात् जगदम्बा महेश्वरी हो और तुम्हारे पति साक्षात् भगवान् शिव हैं। तुम्हारा तो चिन्तन-मात्र करनेसे स्त्रियाँ पतिव्रता हो जायँगी। देवि! यद्यपि तुम्हारे आगे यह सब कहनेका कोई प्रयोजन नहीं है, तथापि आज लोकाचारका आश्रय ले मैंने तुम्हें सती-धर्मका उपदेश दिया है।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर वह ब्राह्मण-पत्नी शिवादेवीको मस्तक झुका चुप हो गयी। इस उपदेशको सुनकर शंकरप्रिया पार्वतीदेवीको बड़ा हर्ष हुआ।
(अध्याय ५४)
o
शिव-पार्वती तथा उनकी बारातकी विदाई, भगवान् शिवका समस्त देवताओंको विदा करके कैलासपर रहना और पार्वतीखण्डके श्रवणकी महिमा
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ब्राह्मणीने देवी पार्वतीको पतिव्रत-धर्मकी शिक्षा देनेके पश्चात् मेनाको बुलाकर कहा—'महारानीजी! अब अपनी पुत्रीकी यात्रा कराइये—इसे विदा कीजिये।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे प्रेमके वशीभूत हो गयीं। फिर धैर्य धारण करके उन्होंने कालीको बुलाया और उसके वियोगके भयसे व्याकुल हो वे बेटीको बारंबार गलेसे लगाकर अत्यन्त उच्चस्वरसे रोने लगीं। फिर पार्वती भी करुणाजनक बात कहती हुई जोर-जोरसे रो पड़ीं। मेना और शिवा दोनों ही विरह-शोकसे पीड़ित हो मूर्च्छित हो गयीं। पार्वतीके रोनेसे देवपत्नियां भी अपनी सुध-बुध खो बैठीं। सारी स्त्रियाँ वहाँ रोने लगीं। वे सब-की-सब अचेत-सी हो गयीं। उस यात्राके समय परम प्रभु साक्षात् योगीश्वर शिव भी रो पड़े, फिर दूसरा कौन
* रुद्रसंहिता * ३४७
चुप रह सकता था? इसी समय अपने समस्त पुत्रों, मन्त्रियों और उत्तम ब्राह्मणोंके साथ हिमालय शीघ्र वहाँ आ पहुँचे और मोहवश अपनी बच्चीको हृदयसे लगाकर रोने लगे। 'बेटी! तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली जा रही हो?' ऐसा कहकर सारे जगत्को सूना मानते हुए वे बारंबार विलाप करने लगे। तब ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ पुरोहितने अन्य ब्राह्मणोंके सहयोगसे कृपापूर्वक अध्यात्मविद्याका उपदेश देते हुए सबको सुखद रीतिसे समझाया। पार्वतीने भक्ति-भावसे माता-पिता तथा गुरुको प्रणाम किया। वे महामाया होकर भी लोकाचारवश बार-बार रो उठती थीं। पार्वतीके रोनेसे ही सब स्त्रियाँ रोने लगती थीं। माता मेना तो बहुत रोयीं। भौजाइयाँ भी रोने लगीं। यही दशा भाइयोंकी थी। शिवाकी माँ, भाभियाँ तथा अन्य युवतियाँ बार-बार रोदन करने लगीं। भाई और पिता भी प्रेम और सौहार्दवश रोये बिना न रह सके। उस समय ब्राह्मणोंने मिलकर सबको आदरपूर्वक समझाया और यह सूचित किया कि यात्राके लिये यही सबसे उत्तम तथा सुखद लग्न है।
तब हिमालय और मेनाने विवेकपूर्वक धैर्य धारण करके शिवाके बैठनेके लिये पालकी मँगवायी, ब्राह्मणोंकी पत्नियोंने शिवाको उसपर चढ़ाया और सबने मिलकर आशीर्वाद दिया। पिता-माता और ब्राह्मणोंने भी अपनी शुभ कामना प्रकट की। मेना और हिमालयने पार्वतीको ऐसे-ऐसे सामान दिये, जो महारानीके योग्य थे। नाना प्रकारके द्रव्योंकी शुभ राशि भेंट की, जो दूसरोंके लिये परम दुर्लभ थी। शिवाने समस्त गुरुजनोंको, माता-पिताको, पुरोहित और ब्राह्मणोंको तथा भौजाइयों और दूसरी स्त्रियोंको प्रणाम करके यात्रा की। पुत्रोंसहित बुद्धिमान् हिमाचल भी स्नेहके वशीभूत हो पीछे-पीछे गये और उस स्थानपर पहुँचे, जहाँ देवताओंसहित भगवान् शिव प्रसन्नतापूर्वक प्रतीक्षा कर रहे थे। वहाँ सब लोग बड़े प्रेम और आनन्दसे परस्पर मिले। उन सबने भगवान्को प्रणाम किया और उनकी प्रशंसा करते हुए वे पुरीको लौट गये।
तदनन्तर कैलास पहुँचकर भगवान् शिवने पार्वतीसे कहा—'देवेश्वरि! तुम सदासे ही मेरी प्राणप्रिया हो। तुम्हें लीला-पूर्वक इस बातकी याद दिला रहा हूँ। तुम्हें पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण है। अतः मेरे और अपने नित्य सम्बन्धका यदि तुम्हें स्मरण हो तो बताओ।' अपने प्राणनाथ महेश्वरकी यह बात सुनकर शंकरकी नित्य प्रिया पार्वती मुसकराती हुई बोलीं—'प्राणेश्वर! मुझे सब बातोंका स्मरण है, किंतु इस समय आप चुप रहिये और इस अवसरके अनुरूप जो कार्य हो, उसीको शीघ्र पूर्ण कीजिये।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! प्रिया पार्वतीके सैकड़ों सुधा-धाराओंके समान मधुर वचनको सुनकर लोकाचारपरायण भगवान् विश्वनाथ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने बहुत-सी सामग्रियाँ एकत्र करके नारायण आदि देवताओंको भाँति-भाँतिकी मनोहर भोज्य वस्तुएँ खिलायीं। इसी तरह अपने विवाहमें पधारे हुए दूसरे लोगोंको भी भगवान् शंकरने प्रेमपूर्वक सुमधुर रससे युक्त नाना प्रकारका अन्न भोजन कराया। भोजन करनेके पश्चात् उन सब देवताओंने
३४८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
नाना रत्नोंसे विभूषित हो अपनी स्त्रियों और सेवकगणोंके साथ आकर प्रभु चन्द्रशेखरको प्रणाम किया। फिर प्रिय वचनोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक उनकी स्तुति एवं परिक्रमा करके शिव-विवाहकी प्रशंसा करते हुए वे सब लोग अपने-अपने धामको चले गये। मुने! साक्षात् भगवान् शिवने लोकाचारवश भगवान् विष्णुको और मुझको भी प्रणाम किया—ठीक उसी तरह, जैसे वामनरूपधारी श्रीहरिने महर्षि कश्यपको नमस्कार किया था। तब मैंने और श्रीविष्णुने शिवको हृदयसे लगाकर उनको आशीर्वाद दिया। तदनन्तर श्रीहरिने उन्हें परब्रह्म परमात्मा मानकर उनकी उत्तम स्तुति की। इसके बाद मेरेसहित भगवान् विष्णु शिवसे विदा ले शिवा और शिवको प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़ उनके विवाहकी प्रशंसा करते हुए अपने उत्तम धामको गये। भगवान् शिव भी पार्वतीके साथ सानन्द विहार करते हुए अपने निवासभूत कैलास पर्वतपर रहने लगे। समस्त शिवगणोंको इस विवाहसे बड़ा सुख मिला। वे अत्यन्त भक्तिपूर्वक शिवा और शिवकी आराधना करने लगे।
तात! इस प्रकार मैंने परम मंगलमय शिव-विवाहका वर्णन किया। यह शोकनाशक, आनन्ददायक तथा धन और आयुकी वृद्धि करनेवाला है। जो पुरुष भगवान् शिव और शिवामें मन लगाकर पवित्र हो प्रतिदिन इस प्रसंगको सुनता अथवा नियमपूर्वक दूसरोंको सुनाता है, वह शिवलोक प्राप्त कर लेता है। यह अद्भुत आख्यान कहा गया, जो मंगलका आवासस्थान है। यह सम्पूर्ण विघ्नोंको शान्त करके समस्त रोगोंका नाश करनेवाला है। इसके द्वारा स्वर्ग, यश, आयु तथा पुत्र और पौत्रोंकी प्राप्ति होती है। यह सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करता, इस लोकमें भोग देता और परलोकमें मोक्ष प्रदान करता है। इस शुभ प्रसंगको सुननेसे अपमृत्युका शमन होता है और परम शान्तिकी प्राप्ति होती है। यह समस्त दुःस्वप्नोंका नाशक तथा बुद्धि एवं विवेक आदिका साधक है। अपने शुभकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको शिव-सम्बन्धी सभी उत्सवोंमें प्रसन्नताके साथ प्रयत्नपूर्वक इसका पाठ करना चाहिये। यह भगवान् शिवको संतोष प्रदान करनेवाला है। विशेषतः देवता आदिकी प्रतिष्ठाके समय तथा शिवसम्बन्धी सभी कार्योंके प्रसंगमें प्रसन्नतापूर्वक इसका पाठ करना चाहिये अथवा पवित्र हो शिव-पार्वतीके इस कल्याणकारी चरित्रका श्रवण करना चाहिये। ऐसा करनेसे समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। यह सत्य है, सत्य है। इसमें संशय नहीं है। (अध्याय ५५)
$$\sim\sim\circ\sim\sim$$ ॥ रुद्रसंहिताका पार्वतीखण्ड सम्पूर्ण ॥ $$\sim\sim\circ\sim\sim$$
रुद्रसंहिता: चतुर्थ (कुमार) खण्ड
रुद्रसंहिता, चतुर्थ (कुमार) खण्ड
देवताओंद्वारा स्कन्दका शिव-पार्वतीके पास लाया जाना, उनका लाड़-प्यार, देवोंके माँगनेपर शिवजीका उन्हें तारक-वधके लिये स्वामी कार्तिकको देना, कुमारकी अध्यक्षतामें देव-सेनाका प्रस्थान, महीसागर-संगमपर तारकासुरका आना और दोनों सेनाओंमें मुठभेड़, वीरभद्रका तारकके साथ घोर संग्राम, पुनः श्रीहरि और तारकमें भयानक युद्ध
वन्दे वन्दनतुष्टमानसमतिप्रेमप्रियं प्रेमदं
पूर्णं पूर्णकरं प्रपूर्णनिखिलैश्वर्यैकवासं शिवम्।
सत्यं सत्यमयं त्रिसत्यविभवं सत्यप्रियं सत्यदं
विष्णुब्रह्मनुतं स्वकीयकृपयापात्ताकृतिं शंकरम्॥
वन्दना करनेसे जिनका मन प्रसन्न हो जाता है, जिन्हें प्रेम अत्यन्त प्यारा है, जो प्रेम प्रदान करनेवाले, पूर्णानन्दमय, भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाले, सम्पूर्ण ऐश्वर्योंके एकमात्र आवासस्थान और कल्याणस्वरूप हैं, सत्य जिनका श्रीविग्रह है, जो सत्यमय हैं, जिनका ऐश्वर्य त्रिकालाबाधित है, जो सत्यप्रिय एवं सत्यप्रदाता हैं, ब्रह्मा और विष्णु जिनकी स्तुति करते हैं, स्वेच्छानुसार शरीर धारण करनेवाले उन भगवान् शंकरकी मैं वन्दना करता हूँ।
श्रीनारदजीने पूछा—देवताओंका मंगल करनेवाले देव! परमात्मा शिव तो सर्वसमर्थ हैं। आत्माराम होकर भी उन्होंने जिस पुत्रकी उत्पत्तिके लिये पार्वतीके साथ विवाह किया था, उनके वह पुत्र किस प्रकार उत्पन्न हुआ? तथा तारकासुरका वध कैसे हुआ? ब्रह्मन्! मुझपर कृपा करके यह सारा वृत्तान्त पूर्णरूपसे वर्णन कीजिये।
इसके उत्तरमें ब्रह्माजीने कथाप्रसंग सुनाकर कुमारके गंगासे उत्पन्न होने तथा कृत्तिका आदि छः स्त्रियोंके द्वारा उनके पाले जाने, उन छहोंकी संतुष्टिके लिये उनके छः मुख धारण करने और कृत्तिकाओंके द्वारा पाले जानेके कारण उनका ‘कार्तिकेय’ नाम होनेकी बात कही। तदनन्तर उनके शंकर-गिरिजाकी सेवामें लाये जानेकी कथा सुनायी। फिर ब्रह्माजीने कहा—भगवान् शंकरने कुमारको गोदमें बैठाकर अत्यन्त स्नेह किया। देवताओंने उन्हें नाना प्रकारके पदार्थ, विद्याएँ, शक्ति और अस्त्र-शस्त्रादि प्रदान किये। पार्वतीके हृदयमें प्रेम समाता नहीं था, उन्होंने हर्षपूर्वक मुसकराकर कुमारको परमोत्तम ऐश्वर्य प्रदान किया, साथ ही चिरंजीवी भी बना दिया। लक्ष्मीने दिव्य सम्पत् तथा एक विशाल एवं मनोहर हार अर्पित किया। सावित्रीने प्रसन्न होकर सारी सिद्धविद्याएँ प्रदान कीं। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार वहाँ महोत्सव मनाया गया। सभीके मन प्रसन्न थे। विशेषतः शिव और पार्वतीके आनन्दका पार नहीं था। इसी बीच देवताओंने भगवान् शंकरसे कहा—प्रभो! यह तारकासुर कुमारके हाथों ही मारा जानेवाला है, इसीलिये ही यह (पार्वती-परिणय तथा कुमारोत्पत्ति आदि) उत्तम चरित घटित हुआ है। अतः हमलोगोंके सुखार्थ उसका काम तमाम
३५० * संक्षिप्त शिवपुराण *
करनेके हेतु कुमारको आज्ञा दीजिये। हमलोग आज ही अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित होकर तारकको मारनेके लिये रण-यात्रा करेंगे।
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! यह सुनकर भगवान् शंकरका हृदय दयार्द्र हो गया। उन्होंने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके उसी समय तारकका वध करनेके लिये अपने पुत्र कुमारको देवताओंको सौंप दिया। फिर तो शिवजीकी आज्ञा मिल जानेपर ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवता एकत्र होकर गुहको आगे करके तुरंत ही उस पर्वतसे चल दिये। उस समय श्रीहरि आदि देवताओंके मनमें पूर्ण विश्वास था (कि ये अवश्य तारकका वध कर डालेंगे); वे भगवान् शंकरके तेजसे भावित हो कुमारके सेनापतित्वमें तारकका संहार करनेके लिये (रणक्षेत्रमें) आये। उधर महाबली तारकने जब देवताओंके इस युद्धोद्योगको सुना, तब वह भी एक विशाल सेनाके साथ देवोंसे युद्ध करनेके लिये तत्काल ही चल पड़ा। उसकी उस विशाल वाहिनीको आती देख देवताओंको परम विस्मय हुआ। फिर तो वे बलपूर्वक बारंबार सिंहनाद करने लगे। उसी समय तुरंत ही भगवान् शंकरकी प्रेरणासे विष्णु आदि सम्पूर्ण देवताओंके प्रति आकाशवाणी हुई।
आकाशवाणीने कहा—देवगण! तुमलोग जो कुमारके अधिनायकत्वमें युद्ध करनेके लिये उद्यत हुए हो, इससे तुम संग्राममें दैत्योंको जीतकर विजयी होओगे।
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! उस आकाशवाणीको सुनकर सभी देवताओंका उत्साह बढ़ गया। उनका भय जाता रहा और वे वीरोचित गर्जना करने लगे। उनकी युद्धकामना बलवती हो उठी और वे सब-के-सब कुमारको अग्रणी बनाकर बड़ी उतावलीके साथ महीसागर-संगमको गये। उधर बहुसंख्यक असुरोंसे घिरा हुआ वह तारक भी बहुत बड़ी सेनाके साथ शीघ्र ही वहाँ आ धमका, जहाँ वे सभी देवता खड़े थे। उस असुरके आगमन-कालमें प्रलयकालीन मेघोंके समान गर्जना करनेवाली रणभेरियाँ तथा अन्यान्य कर्कश शब्द करनेवाले रणवाद्य बज रहे थे। उस समय तारकासुरके साथ आनेवाले दैत्य ताल ठोंकते हुए गर्जना कर रहे थे। उनके पदाघातसे पृथ्वी काँप उठती थी। उस अत्यन्त भयंकर कोलाहलको सुनकर भी सभी देवता निर्भय ही बने रहे। वे एक साथ मिलकर तारकासुरसे लोहा लेनेके लिये डटकर खड़े हो गये। उस समय देवराज इन्द्र कुमारको गजराजपर बैठाकर सबसे आगे खड़े हुए। वे लोकपालोंसे घिरे हुए थे और उनके साथ देवताओंकी महती सेना थी। तत्पश्चात् कुमारने उस गजराजको तो महेन्द्रको ही दे दिया और वे स्वयं एक ऐसे विमानपर आरूढ़ हुए, जो परमाश्चर्यजनक तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित था। उस समय उस विमानपर सवार होनेसे सर्वगुणसम्पन्न महायशस्वी शंकर-पुत्र कुमार उत्कृष्ट शोभासे संयुक्त होकर सुशोभित हो रहे थे। उनपर परम प्रकाशमान चँवर डुलाये जा रहे थे। इसी बीच बलाभिमानी एवं महावीर देवता और दैत्य क्रोधसे विह्वल होकर परस्पर युद्ध करने लगे। उस समय देवताओं और दैत्योंमें बड़ा घमासान युद्ध हुआ। क्षणभरमें ही सारी रणभूमि रुण्ड-मुण्डोंसे व्याप्त हो गयी।
* रुद्रसंहिता * ३५१
तब महाबली तारकासुर बहुत बड़ी सेनाके साथ देवताओंसे युद्ध करनेके लिये वेगपूर्वक आगे बढ़ा। उस रणदुर्मद तारकको युद्धकी कामनासे आगे बढ़ते देखकर इन्द्र आदि देवता तुरंत ही उसके सामने आये। फिर तो दोनों सेनाओंमें महान् कोलाहल होने लगा। तत्पश्चात् देवों तथा असुरोंका विनाश करनेवाला ऐसा द्वन्द्वयुद्ध प्रारम्भ हुआ, जिसे देखकर वीरलोग हर्षोत्फुल्ल हो गये और कायरोंके मनमें भय समा गया। इसी समय वीरभद्र कुपित होकर महाबली प्रमथगणोंके साथ वीराभिमानी तारकके समीप आ पहुँचे। वे बलवान् गणनायक भगवान् शिवके कोपसे उत्पन्न हुए थे, अतः समस्त देवताओंको पीछे करके युद्धकी अभिलाषासे तारकके सम्मुख डट गये। उस समय प्रमथगणों तथा सारे असुरोंके मनमें परमोल्लास था, अतः वे उस महासमरमें परस्पर गुत्थमगुत्थ होकर जूझने लगे। तदनन्तर वीरभद्रसे तारकका भयानक युद्ध हुआ। इसी बीच असुरोंकी सेना रणसे विमुख हो भाग चली। इस प्रकार अपनी सेनाको तितर-बितर हुई देख उसका नायक तारकासुर क्रोधसे भर गया और दस हजार भुजाएँ धारण करके सिंहपर सवार हो देवगणोंको मार डालनेके लिये वेगपूर्वक उनकी ओर झपटा। वह युद्धके मुहानेपर देवों तथा प्रमथगणोंको मार-मारकर गिराने लगा। तब प्रमथगणोंके नेता महाबली वीरभद्र उसके उस कर्मको देखकर उसका वध करनेके लिये अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर तो उन्होंने भगवान् शिवके चरण-कमलका ध्यान करके एक ऐसा श्रेष्ठ त्रिशूल हाथमें लिया, जिसके तेजसे सारी दिशाएँ और आकाश प्रकाशित हो उठे। इसी अवसरपर महान् कौतुक प्रदर्शन करनेवाले स्वामिकार्तिकने तुरंत ही वीरबाहुद्वारा कहलाकर उस युद्धको रोक दिया। तब स्वामीकी आज्ञासे वीरभद्र उस युद्धसे हट गये। यह देखकर असुर-सेनापति महावीर तारक कुपित हो उठा। वह युद्ध-कुशल तथा नाना प्रकारके अस्त्रोंका जानकार था, अतः देवताओंको ललकार-ललकारकर उनपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा। उस समय बलवानोंमें श्रेष्ठ असुरराज तारकने ऐसा महान् कर्म किया कि सारे देवता मिलकर भी उसका सामना न कर सके। उन भयभीत देवताओंको यों पिटते हुए देखकर भगवान् अच्युतको क्रोध हो आया और वे शीघ्र ही युद्ध करनेके लिये तैयार हो गये। उन भगवान् श्रीहरिने अपने आयुध सुदर्शनचक्र और शार्ङ्गधनुषको लेकर युद्धस्थलमें महादैत्य तारकपर आक्रमण किया। मुने! तदनन्तर सबके देखते-देखते श्रीहरि और तारकासुरमें अत्यन्त भयंकर एवं रोमांचकारी महायुद्ध छिड़ गया। इसी बीच अच्युतने कुपित होकर महान् सिंहनाद किया और धधकती हुई ज्वालाओंके-से प्रकाशवाले अपने चक्रको उठाया। फिर तो श्रीहरिने उसी चक्रसे दैत्यराज तारकपर प्रहार किया। उसकी चोटसे अत्यन्त व्यथित होकर वह असुर पृथ्वीपर गिर पड़ा। परंतु वह असुरनायक तारक अत्यन्त बलवान् था, अतः तुरंत ही उठकर उस दैत्यराजने अपनी शक्तिसे चक्रके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। मुने! भगवान् विष्णु और तारकासुर दोनों बलवान् थे और दोनोंमें अगाध बल था, अतः युद्धस्थलमें वे परस्पर जूझने लगे।
(अध्याय १—८)
३५२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
ब्रह्माजीकी आज्ञासे कुमारका युद्धके लिये जाना, तारकके साथ उनका भीषण संग्राम और उनके द्वारा तारकका वध, तत्पश्चात् देवोंद्वारा कुमारका अभिनन्दन और स्तवन, कुमारका उन्हें वरदान देकर कैलासपर जा शिव-पार्वतीके पास निवास करना
तब ब्रह्माजीने कहा—शंकरसुवन स्वामी कार्तिकेय ! तुम तो देवाधिदेव हो। पार्वती-सुत ! विष्णु और तारकासुरका यह व्यर्थ युद्ध शोभा नहीं दे रहा है; क्योंकि विष्णुके हाथों इस तारककी मृत्यु नहीं होगी। यह मुझसे वरदान पाकर अत्यन्त बलवान् हो गया है। यह मैं बिलकुल सत्य बात कह रहा हूँ। पार्वतीनन्दन ! तुम्हारे अतिरिक्त इस पापीको मारनेवाला दूसरा कोई नहीं है, इसलिये महाप्रभो ! तुम्हें मेरे कथनानुसार ही करना चाहिये। परंतप ! तुम शीघ्र ही उस दैत्यका वध करनेके लिये तैयार हो जाओ; क्योंकि पार्वतीपुत्र ! तारकका संहार करनेके निमित्त ही तुम शंकरसे उत्पन्न हुए हो।
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने ! यों मेरा कथन सुनकर शंकरनन्दन कुमार कार्तिकेय ठठाकर हँस पड़े और प्रसन्नतापूर्वक बोले—‘तथास्तु—ऐसा ही होगा।’ तब महान् ऐश्वर्यशाली शंकरसुवन कुमार तारकासुरके वधका निश्चय करके विमानसे उतर पड़े और पैदल हो गये। जिस समय महाबली शिवपुत्र कुमार अपनी अत्यन्त चमकीली शक्तिको, जो लपटोंसे दमकती हुई एक बड़ी उल्का-सी जान पड़ती थी, हाथमें लेकर पैदल ही दौड़ रहे थे, उस समय उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी। उनके मनमें तनिक भी व्याकुलता नहीं थी। वे परम प्रचण्ड और अप्रमेय बलशाली थे। उन षण्मुखको अपनी ओर आते देखकर तारक सुरश्रेष्ठोंसे बोला—‘क्या शत्रुओंका संहार करनेवाला कुमार यही है? मैं अकेला वीर इसके साथ युद्ध करूँगा और मैं ही समस्त वीरों, प्रमथगणों, लोकपालों तथा श्रीहरि जिनके नायक हैं, उन देवोंको भी मार डालूँगा।’
तदनन्तर देवताओंको दुर्वचन कहकर वह असुर तारक भीषण युद्ध करने लगा। उस समय बड़ा विकट संग्राम हुआ। तब शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले कुमारने शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करके तारकके वधका विचार किया। फिर तो
* रुद्रसंहिता * ३५३
महातेजस्वी एवं महाबली कुमार रोषावेशमें आकर गर्जना करने लगे और बहुत बड़ी सेनाके साथ युद्धके लिये डटकर खड़े हो गये। उस समय समस्त देवताओंने जय-जयकारका शब्द किया और देवर्षियोंने इष्ट वाणीद्वारा उनकी स्तुति की। तब तारक और कुमारका संग्राम प्रारम्भ हुआ, जो अत्यन्त दुस्सह, महान् भयंकर और सम्पूर्ण प्राणियोंको भयभीत करनेवाला था। कुमार और तारक दोनों ही शक्ति-युद्धमें परम प्रवीण थे, अतः अत्यन्त रोषावेशमें वे परस्पर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। परम पराक्रमी वे दोनों नाना प्रकारके पैंतरे बदलते हुए गर्जना कर रहे थे और अनेक प्रकारसे दाव-पेंचसे एक-दूसरेपर आघात कर रहे थे। उस समय देवता, गन्धर्व और किन्नर—सभी चुपचाप खड़े होकर वह दृश्य देखते रहे। उन्हें परम विस्मय हुआ—यहाँतक कि वायुका चलना बंद हो गया, सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी और पर्वत एवं वन-काननोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी। इसी अवसरपर हिमालय आदि पर्वत स्नेहाभिभूत होकर कुमारकी रक्षाके लिये वहाँ आये। तब उन सभी पर्वतोंको भयभीत देखकर शंकर एवं गिरिजाके पुत्र कुमार उन्हें सान्त्वना देते हुए बोले।
कुमारने कहा—'महाभाग पर्वतो ! तुमलोग खेद मत करो। तुम्हें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मैं आज तुम सब लोगोंकी आँखोंके सामने ही इस पापीका काम तमाम कर दूँगा।' यों उन पर्वतों तथा देवगणोंको ढाढ़स बँधाकर कुमारने गिरिजा और शम्भुको प्रणाम किया तथा अपनी कान्तिमती शक्तिको हाथमें लिया। शम्भुपुत्र कुमार महाबली तथा महान् ऐश्वर्यशाली तो थे ही। जब उन्होंने तारकका वध करनेकी इच्छासे शक्ति हाथमें ली, उस समय उनकी अद्भुत शोभा हुई। तदनन्तर शंकरजीके तेजसे सम्पन्न कुमारने उस शक्तिसे तारकासुरपर, जो समस्त लोकोंको कष्ट देनेवाला था, प्रहार किया। उस शक्तिके आघातसे तारकासुरके सभी अंग छिन्न-भिन्न हो गये और सम्पूर्ण असुरगणोंका अधिपति वह महावीर सहसा धराशायी हो गया। मुने ! सबके देखते-देखते वहीं कुमारद्वारा मारे गये तारकके प्राणपखेरू उड़ गये। उस उत्कृष्ट वीर तारकको महासमरमें प्राणरहित होकर गिरा हुआ देखकर वीरवर कुमारने पुनः उसपर वार नहीं किया। उस महाबली दैत्यराज तारकके मारे जानेपर देवताओंने बहुत-से असुरोंको मौतके घाट उतार दिया। उस युद्धमें कुछ असुरोंने भयभीत होकर हाथ जोड़ लिये, कुछके शरीर छिन्न-भिन्न हो गये और हजारों दैत्य मृत्युके अतिथि बन गये। कुछ शरणार्थी दैत्य अंजलि बाँधकर 'पाहि-पाहि—रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये' यों पुकारते हुए कुमारके शरणापन्न हो गये। कुछ मार डाले गये और कुछ मैदान छोड़कर भाग गये। सहस्रों दैत्य जीवनकी आशासे भागकर पातालमें घुस गये। उन सबकी आशाएँ भग्न हो गयी थीं और मुखपर दीनता छायी हुई थी।
मुनीश्वर ! इस प्रकार वह सारी दैत्यसेना विनष्ट हो गयी। देवगणोंके भयसे कोई भी वहाँ ठहर न सका। उस दुरात्मा तारकके मारे जानेपर सभी लोक निष्कण्टक हो गये और इन्द्र आदि सभी देवता
789 संक्षिप्त शिवपुराण—12 A