भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 365

* रुद्रसंहिता * ३५१

तब महाबली तारकासुर बहुत बड़ी सेनाके साथ देवताओंसे युद्ध करनेके लिये वेगपूर्वक आगे बढ़ा। उस रणदुर्मद तारकको युद्धकी कामनासे आगे बढ़ते देखकर इन्द्र आदि देवता तुरंत ही उसके सामने आये। फिर तो दोनों सेनाओंमें महान् कोलाहल होने लगा। तत्पश्चात् देवों तथा असुरोंका विनाश करनेवाला ऐसा द्वन्द्वयुद्ध प्रारम्भ हुआ, जिसे देखकर वीरलोग हर्षोत्फुल्ल हो गये और कायरोंके मनमें भय समा गया। इसी समय वीरभद्र कुपित होकर महाबली प्रमथगणोंके साथ वीराभिमानी तारकके समीप आ पहुँचे। वे बलवान् गणनायक भगवान् शिवके कोपसे उत्पन्न हुए थे, अतः समस्त देवताओंको पीछे करके युद्धकी अभिलाषासे तारकके सम्मुख डट गये। उस समय प्रमथगणों तथा सारे असुरोंके मनमें परमोल्लास था, अतः वे उस महासमरमें परस्पर गुत्थमगुत्थ होकर जूझने लगे। तदनन्तर वीरभद्रसे तारकका भयानक युद्ध हुआ। इसी बीच असुरोंकी सेना रणसे विमुख हो भाग चली। इस प्रकार अपनी सेनाको तितर-बितर हुई देख उसका नायक तारकासुर क्रोधसे भर गया और दस हजार भुजाएँ धारण करके सिंहपर सवार हो देवगणोंको मार डालनेके लिये वेगपूर्वक उनकी ओर झपटा। वह युद्धके मुहानेपर देवों तथा प्रमथगणोंको मार-मारकर गिराने लगा। तब प्रमथगणोंके नेता महाबली वीरभद्र उसके उस कर्मको देखकर उसका वध करनेके लिये अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर तो उन्होंने भगवान् शिवके चरण-कमलका ध्यान करके एक ऐसा श्रेष्ठ त्रिशूल हाथमें लिया, जिसके तेजसे सारी दिशाएँ और आकाश प्रकाशित हो उठे। इसी अवसरपर महान् कौतुक प्रदर्शन करनेवाले स्वामिकार्तिकने तुरंत ही वीरबाहुद्वारा कहलाकर उस युद्धको रोक दिया। तब स्वामीकी आज्ञासे वीरभद्र उस युद्धसे हट गये। यह देखकर असुर-सेनापति महावीर तारक कुपित हो उठा। वह युद्ध-कुशल तथा नाना प्रकारके अस्त्रोंका जानकार था, अतः देवताओंको ललकार-ललकारकर उनपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा। उस समय बलवानोंमें श्रेष्ठ असुरराज तारकने ऐसा महान् कर्म किया कि सारे देवता मिलकर भी उसका सामना न कर सके। उन भयभीत देवताओंको यों पिटते हुए देखकर भगवान् अच्युतको क्रोध हो आया और वे शीघ्र ही युद्ध करनेके लिये तैयार हो गये। उन भगवान् श्रीहरिने अपने आयुध सुदर्शनचक्र और शार्ङ्गधनुषको लेकर युद्धस्थलमें महादैत्य तारकपर आक्रमण किया। मुने! तदनन्तर सबके देखते-देखते श्रीहरि और तारकासुरमें अत्यन्त भयंकर एवं रोमांचकारी महायुद्ध छिड़ गया। इसी बीच अच्युतने कुपित होकर महान् सिंहनाद किया और धधकती हुई ज्वालाओंके-से प्रकाशवाले अपने चक्रको उठाया। फिर तो श्रीहरिने उसी चक्रसे दैत्यराज तारकपर प्रहार किया। उसकी चोटसे अत्यन्त व्यथित होकर वह असुर पृथ्वीपर गिर पड़ा। परंतु वह असुरनायक तारक अत्यन्त बलवान् था, अतः तुरंत ही उठकर उस दैत्यराजने अपनी शक्तिसे चक्रके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। मुने! भगवान् विष्णु और तारकासुर दोनों बलवान् थे और दोनोंमें अगाध बल था, अतः युद्धस्थलमें वे परस्पर जूझने लगे।

(अध्याय १—८)