भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 366

३५२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

ब्रह्माजीकी आज्ञासे कुमारका युद्धके लिये जाना, तारकके साथ उनका भीषण संग्राम और उनके द्वारा तारकका वध, तत्पश्चात् देवोंद्वारा कुमारका अभिनन्दन और स्तवन, कुमारका उन्हें वरदान देकर कैलासपर जा शिव-पार्वतीके पास निवास करना

तब ब्रह्माजीने कहा—शंकरसुवन स्वामी कार्तिकेय ! तुम तो देवाधिदेव हो। पार्वती-सुत ! विष्णु और तारकासुरका यह व्यर्थ युद्ध शोभा नहीं दे रहा है; क्योंकि विष्णुके हाथों इस तारककी मृत्यु नहीं होगी। यह मुझसे वरदान पाकर अत्यन्त बलवान् हो गया है। यह मैं बिलकुल सत्य बात कह रहा हूँ। पार्वतीनन्दन ! तुम्हारे अतिरिक्त इस पापीको मारनेवाला दूसरा कोई नहीं है, इसलिये महाप्रभो ! तुम्हें मेरे कथनानुसार ही करना चाहिये। परंतप ! तुम शीघ्र ही उस दैत्यका वध करनेके लिये तैयार हो जाओ; क्योंकि पार्वतीपुत्र ! तारकका संहार करनेके निमित्त ही तुम शंकरसे उत्पन्न हुए हो।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने ! यों मेरा कथन सुनकर शंकरनन्दन कुमार कार्तिकेय ठठाकर हँस पड़े और प्रसन्नतापूर्वक बोले—‘तथास्तु—ऐसा ही होगा।’ तब महान् ऐश्वर्यशाली शंकरसुवन कुमार तारकासुरके वधका निश्चय करके विमानसे उतर पड़े और पैदल हो गये। जिस समय महाबली शिवपुत्र कुमार अपनी अत्यन्त चमकीली शक्तिको, जो लपटोंसे दमकती हुई एक बड़ी उल्का-सी जान पड़ती थी, हाथमें लेकर पैदल ही दौड़ रहे थे, उस समय उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी। उनके मनमें तनिक भी व्याकुलता नहीं थी। वे परम प्रचण्ड और अप्रमेय बलशाली थे। उन षण्मुखको अपनी ओर आते देखकर तारक सुरश्रेष्ठोंसे बोला—‘क्या शत्रुओंका संहार करनेवाला कुमार यही है? मैं अकेला वीर इसके साथ युद्ध करूँगा और मैं ही समस्त वीरों, प्रमथगणों, लोकपालों तथा श्रीहरि जिनके नायक हैं, उन देवोंको भी मार डालूँगा।’

तदनन्तर देवताओंको दुर्वचन कहकर वह असुर तारक भीषण युद्ध करने लगा। उस समय बड़ा विकट संग्राम हुआ। तब शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले कुमारने शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करके तारकके वधका विचार किया। फिर तो