भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 367

* रुद्रसंहिता * ३५३

महातेजस्वी एवं महाबली कुमार रोषावेशमें आकर गर्जना करने लगे और बहुत बड़ी सेनाके साथ युद्धके लिये डटकर खड़े हो गये। उस समय समस्त देवताओंने जय-जयकारका शब्द किया और देवर्षियोंने इष्ट वाणीद्वारा उनकी स्तुति की। तब तारक और कुमारका संग्राम प्रारम्भ हुआ, जो अत्यन्त दुस्सह, महान् भयंकर और सम्पूर्ण प्राणियोंको भयभीत करनेवाला था। कुमार और तारक दोनों ही शक्ति-युद्धमें परम प्रवीण थे, अतः अत्यन्त रोषावेशमें वे परस्पर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। परम पराक्रमी वे दोनों नाना प्रकारके पैंतरे बदलते हुए गर्जना कर रहे थे और अनेक प्रकारसे दाव-पेंचसे एक-दूसरेपर आघात कर रहे थे। उस समय देवता, गन्धर्व और किन्नर—सभी चुपचाप खड़े होकर वह दृश्य देखते रहे। उन्हें परम विस्मय हुआ—यहाँतक कि वायुका चलना बंद हो गया, सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी और पर्वत एवं वन-काननोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी। इसी अवसरपर हिमालय आदि पर्वत स्नेहाभिभूत होकर कुमारकी रक्षाके लिये वहाँ आये। तब उन सभी पर्वतोंको भयभीत देखकर शंकर एवं गिरिजाके पुत्र कुमार उन्हें सान्त्वना देते हुए बोले।

कुमारने कहा—'महाभाग पर्वतो ! तुमलोग खेद मत करो। तुम्हें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मैं आज तुम सब लोगोंकी आँखोंके सामने ही इस पापीका काम तमाम कर दूँगा।' यों उन पर्वतों तथा देवगणोंको ढाढ़स बँधाकर कुमारने गिरिजा और शम्भुको प्रणाम किया तथा अपनी कान्तिमती शक्तिको हाथमें लिया। शम्भुपुत्र कुमार महाबली तथा महान् ऐश्वर्यशाली तो थे ही। जब उन्होंने तारकका वध करनेकी इच्छासे शक्ति हाथमें ली, उस समय उनकी अद्भुत शोभा हुई। तदनन्तर शंकरजीके तेजसे सम्पन्न कुमारने उस शक्तिसे तारकासुरपर, जो समस्त लोकोंको कष्ट देनेवाला था, प्रहार किया। उस शक्तिके आघातसे तारकासुरके सभी अंग छिन्न-भिन्न हो गये और सम्पूर्ण असुरगणोंका अधिपति वह महावीर सहसा धराशायी हो गया। मुने ! सबके देखते-देखते वहीं कुमारद्वारा मारे गये तारकके प्राणपखेरू उड़ गये। उस उत्कृष्ट वीर तारकको महासमरमें प्राणरहित होकर गिरा हुआ देखकर वीरवर कुमारने पुनः उसपर वार नहीं किया। उस महाबली दैत्यराज तारकके मारे जानेपर देवताओंने बहुत-से असुरोंको मौतके घाट उतार दिया। उस युद्धमें कुछ असुरोंने भयभीत होकर हाथ जोड़ लिये, कुछके शरीर छिन्न-भिन्न हो गये और हजारों दैत्य मृत्युके अतिथि बन गये। कुछ शरणार्थी दैत्य अंजलि बाँधकर 'पाहि-पाहि—रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये' यों पुकारते हुए कुमारके शरणापन्न हो गये। कुछ मार डाले गये और कुछ मैदान छोड़कर भाग गये। सहस्रों दैत्य जीवनकी आशासे भागकर पातालमें घुस गये। उन सबकी आशाएँ भग्न हो गयी थीं और मुखपर दीनता छायी हुई थी।

मुनीश्वर ! इस प्रकार वह सारी दैत्यसेना विनष्ट हो गयी। देवगणोंके भयसे कोई भी वहाँ ठहर न सका। उस दुरात्मा तारकके मारे जानेपर सभी लोक निष्कण्टक हो गये और इन्द्र आदि सभी देवता


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