भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 364

३५० * संक्षिप्त शिवपुराण *

करनेके हेतु कुमारको आज्ञा दीजिये। हमलोग आज ही अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित होकर तारकको मारनेके लिये रण-यात्रा करेंगे।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! यह सुनकर भगवान् शंकरका हृदय दयार्द्र हो गया। उन्होंने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके उसी समय तारकका वध करनेके लिये अपने पुत्र कुमारको देवताओंको सौंप दिया। फिर तो शिवजीकी आज्ञा मिल जानेपर ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवता एकत्र होकर गुहको आगे करके तुरंत ही उस पर्वतसे चल दिये। उस समय श्रीहरि आदि देवताओंके मनमें पूर्ण विश्वास था (कि ये अवश्य तारकका वध कर डालेंगे); वे भगवान् शंकरके तेजसे भावित हो कुमारके सेनापतित्वमें तारकका संहार करनेके लिये (रणक्षेत्रमें) आये। उधर महाबली तारकने जब देवताओंके इस युद्धोद्योगको सुना, तब वह भी एक विशाल सेनाके साथ देवोंसे युद्ध करनेके लिये तत्काल ही चल पड़ा। उसकी उस विशाल वाहिनीको आती देख देवताओंको परम विस्मय हुआ। फिर तो वे बलपूर्वक बारंबार सिंहनाद करने लगे। उसी समय तुरंत ही भगवान् शंकरकी प्रेरणासे विष्णु आदि सम्पूर्ण देवताओंके प्रति आकाशवाणी हुई।

आकाशवाणीने कहा—देवगण! तुमलोग जो कुमारके अधिनायकत्वमें युद्ध करनेके लिये उद्यत हुए हो, इससे तुम संग्राममें दैत्योंको जीतकर विजयी होओगे।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! उस आकाशवाणीको सुनकर सभी देवताओंका उत्साह बढ़ गया। उनका भय जाता रहा और वे वीरोचित गर्जना करने लगे। उनकी युद्धकामना बलवती हो उठी और वे सब-के-सब कुमारको अग्रणी बनाकर बड़ी उतावलीके साथ महीसागर-संगमको गये। उधर बहुसंख्यक असुरोंसे घिरा हुआ वह तारक भी बहुत बड़ी सेनाके साथ शीघ्र ही वहाँ आ धमका, जहाँ वे सभी देवता खड़े थे। उस असुरके आगमन-कालमें प्रलयकालीन मेघोंके समान गर्जना करनेवाली रणभेरियाँ तथा अन्यान्य कर्कश शब्द करनेवाले रणवाद्य बज रहे थे। उस समय तारकासुरके साथ आनेवाले दैत्य ताल ठोंकते हुए गर्जना कर रहे थे। उनके पदाघातसे पृथ्वी काँप उठती थी। उस अत्यन्त भयंकर कोलाहलको सुनकर भी सभी देवता निर्भय ही बने रहे। वे एक साथ मिलकर तारकासुरसे लोहा लेनेके लिये डटकर खड़े हो गये। उस समय देवराज इन्द्र कुमारको गजराजपर बैठाकर सबसे आगे खड़े हुए। वे लोकपालोंसे घिरे हुए थे और उनके साथ देवताओंकी महती सेना थी। तत्पश्चात् कुमारने उस गजराजको तो महेन्द्रको ही दे दिया और वे स्वयं एक ऐसे विमानपर आरूढ़ हुए, जो परमाश्चर्यजनक तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित था। उस समय उस विमानपर सवार होनेसे सर्वगुणसम्पन्न महायशस्वी शंकर-पुत्र कुमार उत्कृष्ट शोभासे संयुक्त होकर सुशोभित हो रहे थे। उनपर परम प्रकाशमान चँवर डुलाये जा रहे थे। इसी बीच बलाभिमानी एवं महावीर देवता और दैत्य क्रोधसे विह्वल होकर परस्पर युद्ध करने लगे। उस समय देवताओं और दैत्योंमें बड़ा घमासान युद्ध हुआ। क्षणभरमें ही सारी रणभूमि रुण्ड-मुण्डोंसे व्याप्त हो गयी।