भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३३८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

स्थानपर पहुँचकर शिवने लोकाचारवश मुनियोंको प्रणाम किया। श्रीहरिको और मुझे भी मस्तक झुकाया। फिर सब देवता आदिने उनकी वन्दना की। उस समय वहाँ जय-जयकार, नमस्कार तथा समस्त विघ्नोंका विनाश करनेवाली शुभदायिनी वेदध्वनि भी होने लगी। इसके बाद मैंने, भगवान् विष्णुने तथा इन्द्र, ऋषि और सिद्ध आदिने भी शंकरजीकी स्तुति की। गिरिजानायक महेश्वरकी स्तुति करके वे विष्णु आदि देवता प्रसन्नतापूर्वक उनकी यथोचित सेवामें लग गये। तत्पश्चात् लीलापूर्वक शरीर धारण करनेवाले महेश्वर शम्भुने उन सबको सम्मान दिया। फिर उन परमेश्वरकी आज्ञा पाकर वे विष्णु आदि देवता अत्यन्त प्रसन्न हो अपने-अपने विश्रामस्थानको गये।

(अध्याय ४९—५१)


रातको परम सुन्दर सजे हुए वासगृहमें शयन करके प्रातःकाल भगवान् शिवका जनवासेमें आगमन

ब्रह्माजी कहते हैं—तात! तदनन्तर भाग्यवानोंमें श्रेष्ठ और चतुर गिरिराज हिमवान्‌ने बारातियोंको भोजन करानेके लिये अपने आँगनको सुन्दर ढंगसे सजाया तथा अपने पुत्रों एवं अन्यान्य पर्वतोंको भेजकर शिवसहित सब देवताओंको भोजनके लिये बुलाया। जब सब लोग आ गये, तब उनको बड़े आदरके साथ उत्तमोत्तम भोज्य पदार्थोंका भोजन कराया। भोजनके पश्चात् हाथ-मुँह धो, कुल्ला करके विष्णु आदि सब देवता विश्रामके लिये प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने डेरेमें गये। मेनाकी आज्ञासे साध्वी स्त्रियोंने भगवान् शिवसे भक्तिपूर्वक प्रार्थना करके उन्हें महान् उत्सवसे परिपूर्ण सुन्दर वास-भवनमें ठहराया। मेनाके दिये हुए मनोहर रत्न-सिंहासनपर बैठकर आनन्दित हुए शम्भुने उस वासमन्दिरका निरीक्षण किया। वह भवन प्रज्वलित हुए सैकड़ों रत्नमय प्रदीपोंके कारण अद्भुत प्रभासे उद्भासित हो रहा था। वहाँ रत्नमय पात्र तथा रत्नोंके ही कलश रखे गये थे। मोती और मणियोंसे सारा भवन जगमगा रहा था। रत्नमय दर्पणकी शोभासे सम्पन्न तथा श्वेत चँवरोंसे अलंकृत था। मुक्ता-मणियोंकी सुन्दर मालाओं (बंदनवारों)-से आवेष्टित हुआ वह वासभवन बड़ा समृद्धिशाली दिखायी देता था। उसकी कहीं उपमा नहीं थी। वह महादिव्य, अतिविचित्र, परम मनोहर तथा मनको आह्लाद प्रदान करनेवाला था। उसके फर्शपर नाना प्रकारकी रचनाएँ की गयी थीं—बेलबूटे निकाले गये थे। शिवजीके दिये हुए वरका ही महान् एवं अनुपम प्रभाव


तारका विस्तार हो—जैसे वीणा, सितार आदि। जिसे चमड़ेसे मढ़ाकर कसा गया हो, वह 'आनद्ध' कहलाता है—जैसे ढोल, मृदंग, नगारा आदि। जिसमें छेद हो और उसमें हवा भरकर स्वर निकाला जाता हो, उसे 'सुषिर' कहते हैं—जैसे वंशी, शंख, विगुल, हारमोनियम आदि। काँसेके झाँझ आदिको 'घन' कहते हैं।