भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 351, कुल 850 में से

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* रुद्रसंहिता * ३३७

जीवित होनेपर ही अपनी प्रिया पार्वतीके साथ आपका सुन्दर विहार परिपूर्ण होगा। इसमें संशय नहीं है। सर्वेश्वर! आप सब कुछ करनेमें समर्थ हैं; क्योंकि आप ही परमेश्वर हैं। यहाँ अधिक कहनेसे क्या लाभ ? सर्वेश्वर! आप शीघ्र मेरे पतिको जीवित कीजिये।'

ऐसा कहकर रतिने गाँठमें बँधा हुआ कामदेवके शरीरका भस्म शम्भुको दे दिया और उनके सामने 'हा नाथ! हा नाथ!' कहकर रोने लगी। रतिका रोदन सुनकर सरस्वती आदि सभी देवियाँ रोने लगीं और अत्यन्त दीन वाणीमें बोलीं—'प्रभो! आपका नाम भक्तवत्सल है। आप दीनबन्धु और दयाके सागर हैं। अतः कामको जीवनदान दीजिये और रतिको उत्साहित कीजिये। आपको नमस्कार है।'

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! उन सबकी यह बात सुनकर महेश्वर प्रसन्न हो गये। उन करुणासागर प्रभुने तत्काल ही रतिपर कृपा की। भगवान् शूलपाणिकी अमृतमयी दृष्टि पड़ते ही पहले-जैसे रूप, वेष और चिह्नसे युक्त अद्भुत मूर्तिधारी सुन्दर कामदेव उस भस्मसे प्रकट हो गया। अपने पतिको वैसे ही रूप, आकृति, मन्द मुसकान और धनुष-बाणसे युक्त देख रतिने महेश्वरको प्रणाम किया। वह कृतार्थ हो गयी। उसने प्राणनाथकी प्राप्ति करानेवाले भगवान् शिवका अपने जीवित पतिके साथ हाथ जोड़कर बारंबार स्तवन किया। पत्नीसहित कामकी की हुई स्तुतिको सुनकर दयार्द्रहृदय भगवान् शंकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले।

शंकरने कहा—मनोभव! पत्नीसहित तुमने जो स्तुति की है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। स्वयं प्रकट होनेवाले काम! तुम वर माँगो। मैं तुम्हें मनोवांछित वस्तु दूँगा।

शम्भुका यह वचन सुनकर कामदेव महान् आनन्दमें निमग्न हो गया और हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर गद्गद वाणीमें बोला।

कामदेवने कहा—देवदेव महादेव! करुणासागर प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मेरे लिये आनन्ददायक होइये। प्रभो! पूर्वकालमें मैंने जो अपराध किया था, उसे क्षमा कीजिये। स्वजनोंके प्रति परम प्रेम और अपने चरणोंकी भक्ति दीजिये।

कामदेवका यह कथन सुनकर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो बोले—'बहुत अच्छा!' इसके बाद उन करुणानिधिने हँसकर कहा—'महामते कामदेव! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम अपने मनसे भयको निकाल दो। भगवान् विष्णुके पास जाओ और इस घरसे बाहर ही रहो।'

तदनन्तर काम शिवजीको प्रणाम करके बाहर आ गया। विष्णु आदि देवताओंने उसे आशीर्वाद दिया। इसके बाद भगवान् शंकरने उस वासभवनमें पार्वतीको बायें बिठाकर मिष्टान्न भोजन कराया और पार्वतीने भी प्रसन्नतापूर्वक उनका मुँह मीठा किया। तदनन्तर वहाँ लोकाचारका पालन करते हुए आवश्यक कृत्य करके मेना और हिमवान्‌की आज्ञा ले भगवान् शिव जनवासेमें चले गये। मुने! उस समय महान् उत्सव हुआ और वेदमन्त्रोंकी ध्वनि होने लगी। लोग चारों प्रकारके* बाजे बजाने लगे। जनवासेमें अपने


* अमरकोशमें जो चार प्रकारके बाजे बताये गये हैं, संसारके सभी प्राचीन अथवा अर्वाचीन वाद्य उन्हींके अन्तर्गत हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—तत, आनद्ध, सुषिर और घन। 'तत' वह बाजा है, जिसमें

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