भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* रुद्रसंहिता *
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करे। प्रातःकाल पुनः पूजन करके पुनरागमनके लिये विसर्जन कर दे। बालकोंसे आशीर्वाद ग्रहण करे, स्वस्तिवाचन कराये और व्रतकी पूर्तिके लिये पुष्पांजलि निवेदित करे। फिर नमस्कार करके नाना प्रकारके कार्योंकी कल्पना करे। इस प्रकार जो इस व्रतको पूर्ण करता है, उसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। गणेश! जो श्रद्धासहित अपनी शक्तिके अनुसार नित्य तेरी पूजा करेगा, उसके सभी मनोरथ सफल हो जायँगे। मनुष्योंको सिन्दूर, चन्दन, चावल, केतकी-पुष्प आदि अनेकों उपचारोंद्वारा गणेश्वरका पूजन करना चाहिये। यों जो लोग नाना प्रकारके उपचारोंसे भक्तिपूर्वक तेरी पूजा करेंगे, उनके विघ्नोंका सदाके लिये नाश हो जायगा और उनकी कार्यसिद्धि होती रहेगी। सभी वर्णके लोगोंको, विशेषकर स्त्रियोंको यह पूजा अवश्य करनी चाहिये तथा अभ्युदयकी कामना करनेवाले राजाओंके लिये भी यह व्रत अवश्यकर्तव्य है। व्रती मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, उसे निश्चय वह वस्तु प्राप्त हो जाती है; अतः जिसे किसी वस्तुकी अभिलाषा हो, उसे अवश्य तेरी सेवा करनी चाहिये।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने ! जब शिवजीने महात्मा गणेशको इस प्रकार वर प्रदान किया, तब सम्पूर्ण देवताओं, श्रेष्ठ ऋषियों और शिवके प्यारे समस्त गणोंने 'तथास्तु' कहकर उसका समर्थन किया और अत्यन्त विधिपूर्वक गणाधीशका पूजन किया। तत्पश्चात् शिवगणोंने आदरपूर्वक नाना प्रकारकी पूजनसामग्रीसे गणेश्वरकी विशेष-रूपसे अर्चना की और उनके चरणोंमें प्रणाम किया। मुनीश्वर! उस समय गिरिजादेवीको जो आनन्द प्राप्त हुआ, उसका वर्णन मेरे चारों मुखोंसे भी नहीं हो सकता; तब फिर मैं उसे कैसे बताऊँ। उस अवसरपर देवताओं-की दुन्दुभियाँ बजने लगीं। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गन्धर्वश्रेष्ठ गान करने लगे और पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। इस प्रकार गणेशके गणाधीशपदपर प्रतिष्ठित होनेपर वहाँ महान् उत्सव मनाया गया। सारे जगत्में शान्ति स्थापित हो गयी और सारा दुःख जाता रहा। नारद! शिव और पार्वतीको तो विशेष आनन्द प्राप्त हुआ और सर्वत्र अनेक प्रकारके सुखदायक मंगल होने लगे। तदनन्तर सम्पूर्ण देवगण और ऋषिगण जो वहाँ पधारे हुए थे, वे सभी शिवकी आज्ञासे अपने-अपने स्थानको चले। उस समय वे शिवजीकी स्तुति करके गणेश और पार्वतीकी बारंबार प्रशंसा कर रहे थे और 'कैसा अद्भुत युद्ध हुआ' यों परस्पर वार्तालाप करते हुए चले जा रहे थे। इधर जब गिरिजादेवीका क्रोध शान्त हो गया, तब शिवजी भी, जो स्वात्माराम होते हुए भी सदा भक्तोंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उद्यत रहते हैं, गिरिजाके संनिकट गये और लोकोंकी हितकामनासे पूर्ववत् नाना प्रकारके सुखदायक कार्य करने लगे। तब मैं ब्रह्मा और विष्णु दोनों भक्तिपूर्वक शिव-शिवाकी सेवा करके शिवकी आज्ञा ले अपने-अपने धामको लौट आये। जो मनुष्य जितेन्द्रिय होकर इस परम मांगलिक आख्यानको श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण मंगलोंका भागी होकर मंगलभवन हो जाता है। इसके श्रवणसे पुत्रहीनको पुत्रकी, निर्धनको धनकी, भार्यार्थीको भार्याकी,