शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
प्रजार्थीको प्रजाकी, रोगीको आरोग्यकी और अभागेको सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। जिस स्त्रीका पुत्र और धन नष्ट हो गया हो और पति परदेश चला गया हो, उसे उसका पति मिल जाता है। जो शोक-सागरमें डूब रहा हो, वह इसके श्रवणसे निस्संदेह शोकरहित हो जाता है। यह गणेश-चरित्रसम्बन्धी ग्रन्थ जिसके घरमें सदा वर्तमान रहता है, वह मंगलसम्पन्न होता है—इसमें तनिक भी संशयकी गुंजाइश नहीं है। जो यात्राके अवसरपर अथवा किसी भी पुण्यपर्वपर इसे मन लगाकर सुनता है, वह श्रीगणेशजीकी कृपासे सम्पूर्ण अभीष्ट फल प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १९)
स्वामिकार्तिक और गणेशकी बाल-लीला, दोनोंका परस्पर विवाहके विषयमें विवाद, शिवजीद्वारा पृथ्वी-परिक्रमाका आदेश, कार्तिकेयका प्रस्थान, गणेशका माता-पिताकी परिक्रमा करके उनसे पृथ्वी-परिक्रमा स्वीकृत कराना, विश्वरूपकी सिद्धि और बुद्धि नामक दोनों कन्याओंके साथ गणेशका विवाह और उनसे क्षेम तथा लाभ नामक दो पुत्रोंकी उत्पत्ति, कुमारका पृथ्वी-परिक्रमा करके लौटना और क्षुब्ध होकर क्रौंचपर्वतपर चला जाना, कुमारखण्डके श्रवणकी महिमा
नारदजीने पूछा—तात! मैंने गणेशके जन्मसम्बन्धी अनुपम वृत्तान्त तथा परम पराक्रमसे विभूषित उनका दिव्य चरित्र भी सुन लिया। सुरेश्वर! उसके बाद कौन-सी घटना घटी, उसका वर्णन कीजिये; क्योंकि पिताजी! शिव और पार्वतीका उज्ज्वल यश महान् आनन्द प्रदान करनेवाला है।
ब्रह्माजीने कहा—मुनिश्रेष्ठ! तुम तो बड़े कारुणिक हो। तुमने बड़ी उत्तम बात पूछी है। ऋषिसत्तम! अच्छा, अब मैं उसका वर्णन करता हूँ, तुम ध्यान लगाकर सुनो। विप्रेन्द्र! शिव और पार्वती अपने दोनों पुत्रोंकी बाललीला देख-देखकर महान् प्रेममें मग्न रहने लगे। पुत्रोंका लाड़-प्यार करनेके कारण माता-पिताका सुख दिनोंदिन बढ़ता जाता था और वे दोनों कुमार प्रीतिपूर्वक आनन्दके साथ तरह-तरहकी लीलाएँ करते थे। मुनीश्वर! वे दोनों बालक स्वामिकार्तिक और गणेश भक्तिपूरित चित्तसे सदा माता-पिताकी परिचर्या किया करते थे। इससे माता-पिताका महान् स्नेह षण्मुख और गणेशपर शुक्ल-पक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही गया। एक समय शिव और शिवा दोनों प्रेमपूर्वक एकान्तमें बैठकर यों विचार करने लगे कि 'हमारे ये दोनों पुत्र विवाहके योग्य हो गये, अब इन दोनोंका शुभ विवाह कैसे सम्पन्न हो। हमें तो जैसे षडानन प्यारा है, वैसे ही गणेश भी है।' ऐसी चिन्तामें पड़कर वे दोनों लीलावश आनन्दमग्न हो गये।