भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 850 में से

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३७४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

स्त्री-पुरुष सभी दुराचारी हो गये। देवाराधन, श्राद्ध, यज्ञ, व्रत, तीर्थ, शिव-विष्णु-सूर्य-गणेश आदिका पूजन, स्नान, दान आदि सभी शुभ आचरण नष्ट हो गये। तब माया तथा अलक्ष्मी उन पुरोंमें जा पहुँची। तपसे प्राप्त लक्ष्मी वहाँसे चली गयीं। इस प्रकार वहाँ अधर्मका विस्तार हो गया। मुने! तब शिवेच्छासे भाइयोंसहित उस दैत्यराजकी तथा मयकी भी शक्ति कुण्ठित हो गयी।
(अध्याय २—५)


देवोंका शिवजीके पास जाकर उनका स्तवन करना, शिवजीके त्रिपुरवधके लिये उद्यत न होनेपर ब्रह्मा और विष्णुका उन्हें समझाना, विष्णुके बतलाये हुए शिव-मन्त्रका देवोंद्वारा तथा विष्णुद्वारा जप, शिवजीकी प्रसन्नता और उनके लिये विश्वकर्माद्वारा सर्वदेवमय रथका निर्माण

व्यासजीने पूछा—सनत्कुमारजी! जब भाइयों तथा पुरवासियोंसहित उस दैत्यराजकी बुद्धि विशेषरूपसे मोहाच्छन्न हो गयी, तब उसके बाद कौन-सी घटना घटी? विभो! वह सारा वृत्तान्त वर्णन कीजिये।

सनत्कुमारजीने कहा—महर्षे! जब तीनों पुरोंकी पूर्वोक्त दशा हो गयी, दैत्योंने शिवार्चनका परित्याग कर दिया, सम्पूर्ण स्त्री-धर्म नष्ट हो गया और चारों ओर दुराचार फैल गया, तब भगवान् विष्णु और ब्रह्माके साथ सब देवता कैलास पर्वतपर गये और सुन्दर शब्दोंमें शिवकी स्तुति करने लगे—'महेश्वर देव! आप परमोत्कृष्ट आत्मबलसे सम्पन्न हैं; आप ही सृष्टिके कर्ता ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहर्ता रुद्र हैं; परब्रह्मस्वरूप आपको नमस्कार है।' यों महादेवजीका स्तवन करके देवोंने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। फिर भगवान् विष्णुने जलमें खड़े होकर अपने स्वामी परमेश्वर शिवका मन-ही-मन स्मरण करके तन्मय हो दक्षिणामूर्तिके द्वारा प्रकटित रुद्रमन्त्रका डेढ़ करोड़की संख्यातक जप किया। तबतक सभी देवता उन महेश्वरमें मन लगाकर यों उनकी स्तुति करते रहे।

देवोंने कहा—प्रभो! आप समस्त प्राणियोंके आत्मस्वरूप, कल्याणकर्ता और भक्तोंकी पीड़ा हरनेवाले हैं। आपके गलेमें नीला चिह्न है, जिससे आप नीलकण्ठ कहलाते हैं। आप चिद्रूप एवं प्रचेता हैं, आप रुद्रको हमारा प्रणाम है। असुरनिकन्दन! आप ही हमारी सारी आपत्तियोंके निवारण करनेवाले हैं, अतः सदासे आप ही हमारी गति हैं और आप ही सर्वदा हमलोगोंके वन्दनीय हैं। आप सबके आदि हैं और आप ही अनादि भी हैं। आप ही आनन्दस्वरूप, अव्यय, प्रभु, प्रकृति-पुरुषके भी साक्षात् स्रष्टा और जगदीश्वर हैं। आप ही रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके आश्रयसे ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र होकर जगत्के कर्ता, भर्ता और संहारक बनते हैं। आप ही इस भवसागरसे तारनेवाले हैं। आप समस्त प्राणियोंके स्वामी, अविनाशी, वरदाता, वाङ्मयस्वरूप, वेदप्रतिपाद्य

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