शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 389, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें- रुद्रसंहिता * ३७५
और वाच्य-वाचकतासे रहित हैं। योगवेत्ता योगी आप ईशानसे मुक्तिकी याचना करते हैं। आप योगियोंके हृदयकमलकी कर्णिकापर विराजमान रहते हैं। वेद और संतजन कहते हैं कि आप परब्रह्मस्वरूप, तत्त्वरूप, तेजोराशि और परात्पर हैं। शर्व! आप सर्वव्यापी, सर्वात्मा और त्रिलोकीके अधिपति हैं। भव! इस जगत्में जिसे परमात्मा कहा जाता है, वह आप ही हैं। जगद्गुरो! इस जगत्में जिसे देखने, सुनने, स्तवन करने तथा जाननेयोग्य बताया जाता है और जो अणुसे भी सूक्ष्म तथा महान्से भी महान् है, वह आप ही हैं। आप चारों ओर हाथ, पैर, नेत्र, सिर, मुख, कान और नाकवाले हैं; अतः आपको चारों ओरसे नमस्कार है। सर्वव्यापिन्! आप सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, अनावृत और विश्वरूप हैं; आप विरूपाक्षको सब ओरसे अभिवादन है। आप सर्वेश्वर, भवाध्यक्ष, सत्यमय, कल्याणकर्ता, अनुपमेय और करोड़ों सूर्योंके समान प्रभावशाली हैं; आपको हम चारों ओरसे दण्डवत्-प्रणाम करते हैं। विश्वाराध्य, आदि-अन्तशून्य, छब्बीसवें तत्त्व, नियमकरहित तथा समस्त प्राणियोंको अपने-अपने कार्योंमें प्रवृत्त करनेवाले आपको हमारा सब ओरसे प्रणाम है। आप प्रकृतिके भी प्रवर्तक, सबके प्रपितामह और समस्त शरीरोंमें व्याप्त हैं; आप परमेश्वरको हमारा नमस्कार है। श्रुतियाँ तथा श्रुतितत्त्वके ज्ञाता विज्ञजन आपको वरदायक, समस्त भूतोंमें निवास करनेवाला, स्वयम्भू और श्रुतितत्त्वज्ञ बतलाते हैं। नाथ! आपने जगत्में अनेकों ऐसे कार्य किये हैं, जो हमारी समझसे परे हैं; इसीलिये देवता, असुर, ब्राह्मण और अन्यान्य स्थावर-जंगम भी आपकी ही स्तुति करते हैं। शम्भो! त्रिपुरवासी दैत्योंने हमें प्रायः नष्ट-सा कर डाला है, अतः आप शीघ्र ही उन असुरोंका विनाश करके हमारी रक्षा कीजिये; क्योंकि देववल्लभ! हम देवोंके एकमात्र आप ही गति हैं। परमेश्वर! इस समय वे आपकी मायासे मोहित हो गये हैं, अतः प्रभो! वे भगवान् विष्णुद्वारा बतायी हुई युक्तिके चक्रमें फँसकर सारा धर्म-कर्म छोड़ बैठे हैं। भक्तवत्सल! हमारे सौभाग्यवश इस समय उन दैत्योंने सम्पूर्ण धर्मोंका परित्याग कर दिया है और नास्तिक शास्त्रका आश्रय ले रखा है। शरणदाता! आप सदासे देवताओंका कार्य करते आये हैं, इसीलिये आज भी हमलोग आपके शरणापन्न हुए हैं। अब आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा कीजिये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिवर! इस प्रकार महेश्वरका स्तवन करके देवगण दीनभावसे अंजलि बाँधकर सामने खड़े हो गये। उस समय उनके मस्तक झुके हुए थे।