शिव पुराण

शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished850 पृष्ठ
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* रुद्रसंहिता * ३१७
| मुने! उसने पहले शिवजीके पास एक दानवेश्वरको दूतके रूपमें भेजा। उसने शिवजीसे युद्ध न करनेके लिये कहा और शिवजीने उसे देवताओंका राज्य लौटा देनेकी बात कही। अन्तमें महेश्वरने कहा—'दूत! हम किसीका भी पक्ष नहीं लेते; क्योंकि हम तो कभी स्वतन्त्र रहते ही नहीं, सदा भक्तोंके अधीन रहते हैं और उनकी इच्छासे उन्हींका कार्य करते रहते हैं। देखो, पूर्वकालमें ब्रह्माकी प्रार्थनासे पहले-पहल प्रलय-समुद्रमें श्रीहरि और दैत्यश्रेष्ठ मधु-कैटभका भी युद्ध हुआ था। पुनः भक्तोंके हितकारी उन्हीं श्रीविष्णुने देवताओंके प्रार्थना करनेपर प्रह्लादके कारण हिरण्यकशिपुका वध किया था। तुमने यह भी सुना होगा कि पहले जो मैंने त्रिपुरोंके साथ युद्ध करके उन्हें भस्म कर डाला था, वह भी देवोंकी प्रार्थनापर ही हुआ था। पूर्वकालमें सर्वेश्वरी जगज्जननीका जो शुम्भ आदिके साथ युद्ध हुआ था और जिसमें उन्होंने उन दैत्योंका वध कर डाला था, वह भी देवताओंके प्रार्थना करनेपर ही | घटित हुआ था। वे ही सभी देवगण आज भी ब्रह्माके शरणापन्न हुए थे। तब वे उन देवताओं और श्रीहरिके साथ मेरी शरणमें आये थे। दूत! इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और देवगणोंकी प्रार्थनाके वशीभूत हो देवोंका अधीश्वर होनेके कारण मैं भी युद्धके लिये आया हूँ। तुम भी तो महात्मा श्रीकृष्णके श्रेष्ठ पार्षद हो। अबतक जो-जो दैत्य मारे गये हैं, उनमेंसे कोई भी तुम्हारी समानता नहीं कर सकता। इसलिये राजन्! देवकार्यकी सिद्धिके लिये तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें मुझे कौन-सी बड़ी लज्जा होगी। अर्थात् कुछ नहीं; क्योंकि मैं ईश्वर हूँ और देवताओंने मुझे विनयपूर्वक भेजा है। अतः तुम जाओ और शंखचूडसे मेरी बात कह दो। वह जैसा उचित समझेगा, वैसा करेगा। मुझे तो देवताओंका कार्य करना ही है।' यों कहकर कल्याणकर्ता महेश्वर चुप हो गये। तब शंखचूडका वह दूत उठा और उसके पास चल दिया। <br> (अध्याय ३१—३५) |
देवताओं और दानवोंका युद्ध, शंखचूडके साथ वीरभद्रका संग्राम, पुनः उसके साथ भद्रकालीका भयंकर युद्ध करना और आकाशवाणी सुनकर निवृत्त होना, शिवजीका शंखचूडके साथ युद्ध और आकाशवाणी सुनकर युद्धसे निवृत्त हो विष्णुको प्रेरित करना, विष्णुद्वारा शंखचूडके कवच और तुलसीके शीलका अपहरण, फिर रुद्रके हाथों त्रिशूलद्वारा शंखचूडका वध, शंखकी उत्पत्तिका कथन
| सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! जब उस दूतने शंखचूडके पास जाकर विस्तारपूर्वक शिवजीका वचन कह सुनाया | तथा तत्त्वतः उनके यथार्थ निश्चयको भी प्रकट किया, तब उसे सुनकर प्रतापी दानवराज शंखचूडने भी परम प्रसन्नतापूर्वक |