भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 412

३९८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

युद्धको ही अंगीकार किया। फिर तो वह तुरंत ही मन्त्रियोंसहित रथपर जा बैठा और उसने अपनी सेनाको शंकरके साथ युद्ध करनेके लिये आदेश दिया। इधर अखिलेश्वर शिवजीने भी तत्काल ही अपनी सेनाको तथा देवोंको आगे बढ़नेकी आज्ञा दी और स्वयं भी लीलावश युद्धके लिये संनद्ध हो गये। फिर तो शीघ्र ही युद्ध आरम्भ हो गया। उस समय नाना प्रकारके रणवाद्य बजने लगे। वीरोंके शब्द और कोलाहल चारों ओर गूँज उठे। मुने! इस प्रकार देवताओं और दानवोंका परस्पर युद्ध होने लगा। उस समय वे दोनों सेनाएँ धर्मपूर्वक जूझने लगीं। स्वयं महेन्द्र वृषपर्वाके साथ लड़ने लगे और विप्रचित्तिके साथ सूर्यका धर्मयुद्ध होने लगा। विष्णु दम्भके साथ भीषण संग्राम करने लगे। कालासुरसे काल, गोकर्णसे अग्नि, कालकेयसे कुबेर, मयसे विश्वकर्मा, भयंकरसे मृत्यु, संहारसे यम, कालाम्बिकसे वरुण, चंचलसे वायु, घटपृष्ठसे बुध, रक्ताक्षसे शनैश्चर, रत्नसारसे जयन्त, वर्चागणोंसे वसुगण, दोनों दीप्तिमानोंसे दोनों अश्विनीकुमार, धूम्रसे नलकुबर, धुरंधरसे धर्म, गणकाक्षसे मंगल, शोभाकरसे वैश्वानर, पिपिटसे मन्मथ, गोकामुख, चूर्ण, खड्ग, धूम्र, संहल, प्रतापी विश्व और पलाश नामक असुरोंसे बारहों आदित्य धर्मपूर्वक लोहा लेने लगे। इस प्रकार शिवकी सहायताके लिये आये हुए अमरोंका असुरोंके साथ युद्ध होने लगा। ग्यारहों महारुद्र महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न ग्यारह भयंकर असुर-वीरोंसे भिड़ गये। उग्र और चण्ड आदिके साथ महामणि, राहुके साथ चन्द्रमा और शुक्राचार्यके साथ बृहस्पति धर्मयुद्ध करने लगे। इस प्रकार उस महायुद्धमें नन्दीश्वर आदि सभी शिवगण श्रेष्ठ दानवोंके साथ संग्राम करने लगे। विस्तारभयसे उनका पृथक् वर्णन नहीं किया गया है। मुने! उस समय सारी सेनाएँ निरन्तर युद्धमें व्यस्त थीं और शम्भु काल्यसुतके साथ वटवृक्षके नीचे विराजमान थे। उधर शंखचूड़ भी रत्नाभरणोंसे विभूषित हो करोड़ों दानवोंके साथ रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठा हुआ था। फिर देवताओं तथा असुरोंमें चिरकालतक अत्यन्त भयानक युद्ध होता रहा। तदनन्तर शंखचूड़ भी आकर उस भीषण संग्राममें जुट गया। इसी बीच महाबली वीर वीरभद्र समरभूमिमें बलशाली शंखचूड़से जा भिड़े। उस युद्धमें दानवराज जिन-जिन अस्त्रोंकी वर्षा करता था, उन-उनको वीरभद्र खेल-ही-खेलमें अपने बाणोंसे काट डालते थे।

व्यासजी! इसी समय देवी भद्रकालीने समरभूमिमें जाकर बड़ा भयंकर सिंहनाद किया। उनके उस शब्दको सुनकर सभी दानव मूर्च्छित हो गये। उस समय देवीने बारंबार अट्टहास किया और मधुपान करके वे रणके मुहानेपर नृत्य करने लगीं। उनके साथ ही उग्रदंष्ट्रा, उग्रदण्डा और कोटवीने भी मधुपान किया तथा अन्यान्य देवियोंने भी खूब मधु पीकर युद्धस्थलमें नाचना आरम्भ किया। उस समय शिवगणों तथा देवोंके दलोंमें महान् कोलाहल मच गया। सारा सुरसमुदाय बहुत प्रकारसे गर्जना करता हुआ हर्षमग्न हो गया। तदनन्तर कालीने शंखचूड़के ऊपर प्रलयकालीन अग्निकी शिखाके समान उद्दीप्त आग्नेयास्त्र चलाया, परंतु दानवराजने वैष्णवास्त्रसे उसे शीघ्र ही शान्त कर दिया। तब देवी भद्रकालीने उसपर नारायणास्त्रका प्रयोग किया। वह