शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * ३९९
अस्त्र दानव-शत्रुको देखकर बढ़ने लगा। तब प्रलयाग्निकी ज्वालाके समान उद्दीप्त होते हुए नारायणास्त्रको देखकर शंखचूड़ दण्डकी भाँति भूमिपर लेट गया और बारंबार प्रणाम करने लगा। तब उस दानवको नम्र हुआ देखकर वह अस्त्र निवृत्त हो गया। तत्पश्चात् देवीने उसपर मन्त्रपूर्वक ब्रह्मास्त्र छोड़ा। उस अस्त्रको प्रज्वलित होता हुआ देखकर दानवराजने भूमिपर खड़े होकर उसे प्रणाम किया और ब्रह्मास्त्रसे ही उसका निवारण कर दिया। तदनन्तर वह दानवराज कुपित हो उठा और वेगपूर्वक अपने धनुषको खींचकर देवीके ऊपर मन्त्रपाठ करते हुए दिव्यास्त्रोंकी वर्षा करने लगा। भद्रकाली समरभूमिमें अपने विस्तृत मुखको फैलाकर उन अस्त्रोंको निगल गयीं और अट्टहासपूर्वक गर्जना करने लगीं, जिससे दानव भयभीत हो गये। तब शंखचूड़ने कालीके ऊपर एक सौ योजन लंबी शक्तिसे वार किया; परंतु देवीने अपने दिव्यास्त्रसमूहसे उसके सौ टुकड़े कर दिये। यों उन दोनोंमें चिरकालतक युद्ध होता रहा और सभी देवता तथा दानव दर्शक बनकर उसे देखते रहे। अन्तमें देवीने महान् कोपावेशसे उसपर वेगपूर्वक मुष्टि-प्रहार किया। उसकी चोटसे वह दानवराज चक्कर काटने लगा और उसी क्षण मूर्च्छित हो गया। फिर क्षणभरमें ही उसकी चेतना लौट आयी और वह उठ खड़ा हुआ; परंतु उस प्रतापीने मातृबुद्धि होनेके कारण देवीके साथ बाहुयुद्ध नहीं किया। तब देवीने उस दानवको पकड़कर उसे बारंबार घुमाया और बड़े क्रोधसे वेगपूर्वक ऊपरको उछाल दिया। प्रतापी शंखचूड़ वेगसे ऊपरको उछला और पृथ्वीपर गिरकर पुनः उठ खड़ा हुआ। उस महायुद्धमें वह तनिक भी भ्रान्त नहीं हुआ था; बल्कि उसका मन प्रसन्न था। तत्पश्चात् वह भद्रकालीको प्रणाम करके बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित अपने परम मनोहर विमानपर जा बैठा। इधर कालिका भूखसे विह्वल होकर दानवोंका रक्तपान करने लगीं। इसी अवसरपर वहाँ यों आकाशवाणी हुई— 'ईश्वरि! अभी रणभूमिमें सिंहनाद करनेवाले डेढ़ लाख दानवेन्द्र और बचे हैं। ये बड़े उद्धत हैं, अतः तुम इन्हें अपना आहार बना लो। परंतु देवि! संग्राममें दानवराज शंखचूड़को मारनेके लिये मन मत दौड़ाओ; क्योंकि यह तुम्हारे लिये अवध्य है—ऐसा निश्चय समझो।' आकाशवाणीद्वारा कहे हुए वचनको सुनकर देवी भद्रकालीने बहुत-से दानवोंका मांस भक्षण करके उनका रक्तपान किया और फिर वे शिवजीके निकट चली गयीं। वहाँ उन्होंने पूर्वापरके क्रमसे सारा युद्ध-वृत्तान्त कह सुनाया।
व्यासजीने पूछा—महाबुद्धिमान् सनत्कुमारजी! कालीका वह कथन सुनकर महेश्वरने उस समय क्या कहा और कौन-सा कार्य किया। उसे आप वर्णन करनेकी कृपा करें; क्योंकि मेरे मनमें उसे सुननेकी प्रबल उत्कण्ठा जाग उठी है।
सनत्कुमारजी बोले—मुने! शम्भु तो जीवोंके कल्याणकर्ता, परमेश्वर और बड़े लीलाविहारी हैं। वे कालीद्वारा कहे हुए वचनको सुनकर उन्हें आश्वासन देते हुए हँसने लगे। तदनन्तर आकाशवाणीको सुनकर तत्त्वज्ञान-विशारद स्वयं शंकर अपने गणोंके साथ समरभूमिकी ओर चले। उस