शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०० * संक्षिप्त शिवपुराण *
समय वे महावृषभ नन्दीश्वरपर सवार थे और उन्हींके समान पराक्रमी वीरभद्र, भैरव और क्षेत्रपाल आदि उनके साथ थे। रणभूमिमें पहुँचकर महेश्वरने वीररूप धारण किया। उस समय उन रुद्रकी बड़ी शोभा हो रही थी और वे मूर्तिमान् काल-से दीख रहे थे। जब शंखचूड़की दृष्टि शिवजीपर पड़ी, तब वह विमानसे उतर पड़ा और परम भक्तिके साथ दण्डकी भाँति पृथ्वीपर लोटकर उसने सिरके बल उन्हें प्रणाम किया। इस प्रकार नमस्कार करनेके पश्चात् वह तुरंत ही अपने विमानपर जा बैठा और कवच धारण करके उसने धनुष-बाण उठाया। फिर तो दोनों ओरसे बाणोंकी झड़ी लग गयी। यों व्यर्थ ही बाण-वर्षा करनेवाले शिव और शंखचूड़का वह उग्र युद्ध सैकड़ों वर्षोंतक चलता रहा। अन्तमें युद्धस्थलमें शंखचूड़का वध करनेके लिये महाबली महेश्वरने सहसा अपना वह त्रिशूल उठाया, जिसका निवारण करना बड़े-बड़े तेजस्वियोंके लिये भी अशक्य है। तब तत्काल ही उसका निषेध करनेके लिये यों आकाशवाणी हुई—‘‘शंकर! मेरी प्रार्थना सुनिये और इस समय इस त्रिशूलको मत चलाइये। ईश! यद्यपि आप क्षणमात्रमें पूरे ब्रह्माण्डका विनाश करनेमें सर्वथा समर्थ हैं, फिर इस अकेले दानव शंखचूड़की तो बात ही क्या है, तथापि आप स्वामीके द्वारा देवमर्यादाका विनाश नहीं होना चाहिये। महादेव! आप उस (देवमर्यादा)-को सुनिये और उसे सत्य एवं सफल बनाइये।'(वह देवमर्यादा यह है कि) जबतक इस शंखचूड़के हाथमें श्रीहरिका परम उग्र कवच वर्तमान रहेगा और इसकी पतिव्रता पत्नी (तुलसी)-का सतीत्व अखण्डित रहेगा, तबतक इसपर जरा और मृत्यु अपना प्रभाव नहीं डाल सकेंगे।' अतः जगदीश्वर शंकर! ब्रह्माके इस वचनको सत्य कीजिये।''
तब सत्पुरुषोंके आश्रयस्वरूप शिवजीने उस आकाशवाणीको सुनकर ‘तथास्तु’ कहकर उसे स्वीकार कर लिया और विष्णुको उस कार्यके लिये प्रेरित किया। फिर तो शिवजीकी इच्छासे विष्णु वहाँसे चल पड़े। वे तो मायावियोंमें भी श्रेष्ठ मायावी ठहरे। अतः उन्होंने एक वृद्ध ब्राह्मणका वेष धारण किया और शंखचूड़के निकट जाकर उससे यों कहा।
वृद्ध ब्राह्मण बोले—‘दानवेन्द्र! इस समय मैं याचक होकर तुम्हारे पास आया हूँ, तुम मुझे भिक्षा दो। दीनवत्सल! अभी मैं अपने मनोरथको प्रकट नहीं करूँगा। (जब तुम देना स्वीकार कर लोगे, तब) पीछे मैं उसे बताऊँगा और तब तुम उसे पूर्ण करना।' ब्राह्मणकी बात सुनकर राजेन्द्र शंखचूड़का मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। जब उसने ‘ओम्’ कहकर उसे स्वीकार कर लिया, तब ब्राह्मणने छलपूर्वक कहा—