भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 434

४२० * संक्षिप्त शिवपुराण *

लुब्धक—महाव्याधस्वरूप, यज्ञसूदन—दक्षयज्ञके विनाशक, कृत्तिकासुतयुक्त—कृत्तिकाओंके पुत्र (स्वामिकार्तिक)-से युक्त, उन्मत्त—उन्मत्तका-सा वेष धारण करनेवाले, कृत्तिवासा—गजासुरके चमड़ेको ही वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले, गजकृत्तिपरीधान—हाथीका चर्म लपेटनेवाले, क्षुब्ध—भक्तोंका कष्ट देखकर क्षुब्ध हो जानेवाले, भुजगभूषण—सर्पोंको भूषणरूपमें धारण करनेवाले, दत्तालम्ब—भक्तोंके अवलम्बदाता, वेताल—वेतालस्वरूप, घोर—घोर, शाकिनीपूजित—शाकिनियोंद्वारा समाराधित, अघोर—अघोरपथके प्रवर्तक, घोरदैत्यघ्न—भयंकर दैत्योंके संहारक, घोरघोष—भीषण शब्द करनेवाले, वनस्पति—वनस्पतिस्वरूप, भस्मांग—शरीरमें भस्म रमानेवाले, जटिल—जटाधारी, शुद्ध—परम पावन, भेरुण्डशतसेवित—सैकड़ों भेरुण्डनामक पक्षियोंद्वारा सेवित, भूतेश्वर—भूतोंके अधिपति, भूतनाथ—भूतगणोंके स्वामी, पंचभूताश्रित—पंचभूतोंको आश्रय देनेवाले, खग—गगनविहारी, क्रोधित—क्रोधयुक्त, निष्ठुर—दुष्टोंपर कठोर व्यवहार करनेवाले, चण्ड—प्रचण्ड पराक्रमी, चण्डीश—चण्डीके प्राणनाथ, चण्डिकाप्रिय—चण्डिकाके प्रियतम, चण्डतुण्ड—अत्यन्त कुपित मुखवाले, गरुत्मान्—गरुडस्वरूप, निस्त्रिं‍श—खड्गस्वरूप, शवभोजन—शवका भोग लगानेवाले, लेलिहान—क्रुद्ध होनेपर जीभ लपलपानेवाले, महारौद्र—अत्यन्त भयंकर, मृत्यु—मृत्युस्वरूप, मृत्योरगोचर—मृत्युकी भी पहुँचसे परे, मृत्योर्मृत्यु—मृत्युके भी काल, महासेन—विशाल सेनावाले कार्तिकेय-स्वरूप, श्मशानारण्यवासी—श्मशान एवं अरण्यमें विचरनेवाले, राग—प्रेमस्वरूप, विराग—आसक्तिरहित, रागान्ध—प्रेममें मस्त रहनेवाले, वीतराग—वैरागी, शतार्चि—तेजकी असंख्य चिनगारियोंसे युक्त, सत्त्व—सत्त्वगुणस्वरूप, रजः—रजोगुणस्वरूप, तमः—तमोगुणस्वरूप, धर्म—धर्मस्वरूप, अधर्म—अधर्मरूप, वासवानुज—इन्द्रके छोटे भाई उपेन्द्रस्वरूप, सत्य—सत्यरूप, असत्य—सत्यसे भी परे, सद्‌रूप—उत्तम रूपवाले, असद्रूप—बीभत्स रूपधारी, अहेतुक—हेतुरहित, अर्धनारीश्वर—आधा पुरुष और आधा स्त्रीका रूप धारण करनेवाले, भानु—सूर्यस्वरूप, भानुकोटिशतप्रभ—कोटिशत सूर्योंके समान प्रभावशाली, यज्ञ—यज्ञस्वरूप, यज्ञपति—यज्ञेश्वर, रुद्र—संहारकर्ता, ईशान—ईश्वर, वरद—वरदाता, शिव—कल्याणस्वरूप। परमात्मा शिवकी इन १०८ मूर्तियोंका ध्यान करनेसे वह दानव उस महान् भयसे मुक्त हो गया*। उस


* महादेवं विरूपाक्षं चन्द्रार्धकृतशेखरम्। अमृतं शाश्वतं स्थाणुं नीलकण्ठं पिनाकिनम्॥
वृषभाक्षं महाज्ञेयं पुरुषं सर्वकामदम्। कामारिं कामदहनं कामरूपं कपर्दिनम्॥
विरूपं गिरिशं भीमं सृक्वणिं रक्तवाससम्। योगिनं कालदहनं त्रिपुरघ्नं कपालिनम्॥
गूढव्रतं गुप्तमन्त्रं गम्भीरं भावगोचरम्। अणिमादिगुणाधारं त्रिलोकैश्वर्यदायकम्॥
वीरं वीरहणं घोरं विरूपं मांसलं पटुम्। महामांसादमुन्मत्तं भैरवं वै महेश्वरम्॥

789 संक्षिप्त शिवपुराण—14 D