शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * ४२१
समय प्रसन्न हुए जटाधारी शंकरने उसे मुक्त करके उस त्रिशूलके अग्रभागसे उतार लिया और दिव्य अमृतकी वर्षासे अभिषिक्त कर दिया। तत्पश्चात् महात्मा महेश्वर उसने जो कुछ किया था, उस सबका सान्त्वना-पूर्वक वर्णन करते हुए उस महादैत्य अन्धकसे बोले।
ईश्वरने कहा—हे दैत्येन्द्र! मैं तेरे इन्द्रिय-निग्रह, नियम, शौर्य और धैर्यसे प्रसन्न हो गया हूँ; अतः सुव्रत! अब तू कोई वर माँग ले। दैत्योंके राजाधिराज! तूने निरन्तर मेरी आराधना की है, इससे तेरा सारा कल्मष धुल गया और अब तू वर पानेके योग्य हो गया है। इसीलिये मैं तुझे वर देनेके लिये आया हूँ; क्योंकि तीन हजार वर्षोंतक बिना खाये-पीये प्राण धारण किये रहनेसे तूने जो पुण्य कमाया है, उसके फलस्वरूप तुझे सुखकी प्राप्ति होनी चाहिये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! यह सुनकर अन्धकने भूमिपर अपने घुटने टेक दिये और फिर वह हाथ जोड़कर काँपता हुआ भगवान् उमापतिसे बोला।
अन्धकने कहा—भगवन्! आपकी महिमा जाने बिना मैंने पहले रणांगणमें हर्षगद्गद वाणीसे आपको जो दीन, हीन तथा नीच-से-नीच कहा है और मूर्खतावश लोकमें जो-जो निन्दित कर्म किया है, प्रभो! उस सबको आप अपने मनमें स्थान न दें अर्थात् उसे भूल जायँ। महादेव! मैं अत्यन्त ओछा और दुःखी हूँ। मैंने कामदोषवश पार्वतीके विषयमें भी जो दूषित भावना कर ली थी, उसे आप क्षमा कर दें। आपको तो अपने कृपण, दुःखी एवं दीन भक्तपर सदा ही विशेष दया करनी चाहिये। मैं उसी तरहका एक दीन भक्त हूँ और आपकी शरणमें आया हूँ। देखिये, मैंने आपके सामने अंजलि बाँध रखी है। अब आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये। ये जगज्जननी पार्वतीदेवी भी मुझपर प्रसन्न हो जायँ और सारे क्रोधको त्यागकर मुझे कृपादृष्टिसे देखें। चन्द्रशेखर! कहाँ तो इनका भयंकर क्रोध और कहाँ मैं तुच्छ दैत्य? चन्द्रमौलि! मैं किसी प्रकार उसको सहन नहीं कर सकता। शम्भो! कहाँ तो परम उदार आप और कहाँ बुढ़ापा, मृत्यु तथा काम-क्रोध आदि दोषोंके वशीभूत
त्रैलोक्यद्रावणं लुब्धं लुब्धकं यज्ञसूदनम्। कृत्तिकानां सुतैर्युक्तमुन्मत्तं कृत्तिवाससम्॥
गजकृत्तिपरीधानं क्षुब्धं भुजगभूषणम्। दत्तालम्बं च वेतालं घोरं शाकिनिपूजितम्॥
अघोरं घोरदैत्यघ्नं घोरघोषं वनस्पतिम्। भस्माङ्गं जटिलं शुद्धं भेरुण्डशतसेवितम्॥
भूतेश्वरं भूतनाथं पञ्चभूताश्रितं खगम्। क्रोधितं निष्ठुरं चण्डं चण्डीशं चण्डिकाप्रियम्॥
चण्डतुण्डं गरुत्मन्तं निस्त्रिंशं शवभोजनम्। लेलिहानं महारौद्रं मृत्युं मृत्योरगोचरम्॥
मृत्योर्मृत्युं महासेनं श्मशानारण्यवासिनम्। रागं विरागं रागान्धं वीतरागं शतार्चिषम्॥
सत्त्वं रजस्तमोधर्ममधर्मं वासवानुजम्। सत्यं त्वसत्यं सद्ग्रूपमसद्रूपमहेतुकम्॥
अर्धनारीश्वरं भानुं भानुकोटिशतप्रभम्। यज्ञं यज्ञपतिं रुद्रमीशानं वरदं शिवम्॥
अष्टोत्तरशतं ह्येतन्मूर्तीनां परमात्मनः। शिवस्य दानवो ध्यायन् मुक्तस्तस्मान्महाभयात्॥
(शि० पु० रु० सं० युद्धखण्ड ४९। ५–१८)