शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
मैं ? (अर्थात् मेरी आपके साथ क्या तुलना है?) महेश्वर! आपके ये युद्धकला-निपुण महाबली वीर पुत्र मेरी कृपणतापर विचार करके अब क्रोधके वशीभूत मत हों। तुषार, हार, चन्द्रकिरण, शंख, कुन्दपुष्प और चन्द्रमाके-से वर्णवाले शिव! मैं इन पार्वतीको गुरुताके गौरववश नित्य मातृ-दृष्टिसे देखूँ! मैं नित्य आप दोनोंका भक्त बना रहूँ। देवताओंके साथ होनेवाला मेरा वैर दूर हो जाय तथा मैं शान्तचित्त हो योग-चिन्तन करता हुआ गणोंके साथ निवास करूँ। महेशान! आपकी कृपासे मैं उत्पन्न हुए इस विरोधी दानवभावका पुनः कभी स्मरण न करूँ, यही उत्तम वर मुझे प्रदान कीजिये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिसत्तम! इतनी बात कहकर वह दैत्यराज माता पार्वतीकी ओर देखकर त्रिनयन शंकरका ध्यान करता हुआ मौन हो गया। तब रुद्रने उसकी ओर कृपादृष्टिसे देखा। उनकी दृष्टि पड़ते ही उसे अपने पूर्ववृत्तान्त तथा अद्भुत जन्मका स्मरण हो आया। उस घटनाका स्मरण होते ही उसका मनोरथ पूर्ण हो गया। फिर तो माता-पिता (उमा-महेश्वर)-को प्रणाम करके वह कृतकृत्य हो गया। उस समय पार्वती तथा बुद्धिमान् शंकरने उसका मस्तक सूँघकर प्यार किया। इस प्रकार अन्धकने प्रसन्न हुए चन्द्रशेखरसे अपना सारा मनोरथ प्राप्त कर लिया। मुने! महादेवजीकी कृपासे अन्धकको जिस प्रकार परम सुखद गणाध्यक्ष-पद प्राप्त हुआ था, वह सारा-का-सारा पुरातन वृत्तान्त मैंने सुना दिया और मृत्युंजय-मन्त्रका भी वर्णन कर दिया। यह मन्त्र मृत्युका विनाशक और सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला है। इसे प्रयत्नपूर्वक जपना चाहिये।
(अध्याय ४७—४९)
शुक्राचार्यकी घोर तपस्या और इनका शिवजीको चित्तरत्न अर्पण करना तथा अष्टमूर्त्यष्टक-स्तोत्रद्वारा उनका स्तवन करना, शिवजीका प्रसन्न होकर उन्हें मृतसंजीवनी विद्या तथा अन्यान्य वर प्रदान करना
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! मुनिवर शुक्राचार्यको शिवसे मृत्युंजय नामक मृत्युका प्रशमन करनेवाली परा विद्या किस प्रकार प्राप्त हुई थी, अब उसका वर्णन करता हूँ; सुनो। पूर्वकालकी बात है, इन भृगुनन्दनने वाराणसीपुरीमें जाकर प्रभावशाली विश्वनाथका ध्यान करते हुए बहुत कालतक घोर तप किया था। वेदव्यासजी! उस समय उन्होंने वहीं एक शिवलिंगकी स्थापना की और उसके सामने ही एक परम रमणीय कूप तैयार कराया। फिर प्रयत्नपूर्वक उन देवेश्वरको एक लाख बार द्रोणभर पंचामृतसे तथा बहुत-से सुगन्धित द्रव्योंसे स्नान कराया। फिर एक हजार बार परम प्रीतिपूर्वक चन्दन, यक्षकर्दम* और सुगन्धित उबटनका उस लिंगपर अनुलेप किया। तत्पश्चात् सावधानीके साथ परम प्रेमपूर्वक राजचम्पक
* एक प्रकारका अंग-लेप जो कपूर, अगुरु, कस्तूरी और कंकोलको मिलाकर बनाया जाता है।