भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 437

* रुद्रसंहिता * ४२३

(अमलतास), धतूर, कनेर, कमल, मालती, कर्णिकार, कदम्ब, मौलसिरी, उत्पल, मल्लिका (चमेली), शतपत्री, सिन्धुवार, ढाक, बन्धूकपुष्प (गुलदुपहरी), पुंनाग, नागकेसर, केसर, नवमल्लिक (बेलमोगरा), चिबिलिक (रक्तदला), कुन्द (माघपुष्प), मुचुकुन्द (मोतिया), मन्दार, बिल्वपत्र, गूमा, मरुवृक (मरुआ), वृक (धूप), गँठिवन, दौना, अत्यन्त सुन्दर आमके पल्लव, तुलसी, देवजवासा, बृहत्पत्री, कुशांकु, नन्दावर्त (नाँदरूख), अगस्त्य, साल, देवदारु, कचनार, कुरबक (गुलखेरा), दुर्वांकुर, कुरंटक (करसैला)—इनमेंसे प्रत्येकके पुष्पों और अन्य पल्लवोंसे तथा नाना प्रकारके रमणीय पत्रों और सुन्दर कमलोंसे शंकरजीकी विधिवत् अर्चना की। उन्हें बहुत-से उपहार समर्पित किये तथा शिवलिंगके आगे नाचते हुए शिवसहस्रनाम एवं अन्यान्य स्तोत्रोंका गान करके शंकरजीका स्तवन किया। इस प्रकार शुक्राचार्य पाँच हजार वर्षोंतक नाना प्रकारके विधि-विधानसे महेश्वरका पूजन करते रहे; परंतु जब उन्हें थोड़ा-सा भी वर देनेके लिये उद्यत होते नहीं देखा, तब उन्होंने एक-दूसरे अत्यन्त दुःसह एवं घोर नियमका आश्रय लिया। उस समय शुक्रने इन्द्रियोंसहित मनके अत्यन्त चंचलतारूपी महान् दोषको बारंबार भावनारूपी जलसे प्रक्षालित किया। इस प्रकार चित्तरत्नको निर्मल करके उसे पिनाकधारी शिवके अर्पण कर दिया और स्वयं धूमकणका पान करते हुए तप करने लगे। इस प्रकार उनके एक सहस्र वर्ष और बीत गये। तब भृगुनन्दन शुक्रको यों दृढ़चित्तसे घोर तप करते देखकर महेश्वर उनपर प्रसन्न हो गये। फिर तो दक्षकन्या पार्वतीके स्वामी साक्षात् विरूपाक्ष शंकर, जिनके शरीरकी कान्ति सहस्रों सूर्योंसे भी बढ़कर थी, उस लिंगसे निकलकर शुक्रसे बोले।

महेश्वरने कहा—महाभाग भृगुनन्दन! तुम तो तपस्याकी निधि हो। महामुने! मैं तुम्हारे इस अविच्छिन्न तपसे विशेष प्रसन्न हूँ। भार्गव! तुम अपना सारा मनोवांछित वर माँग लो। मैं प्रीतिपूर्वक तुम्हारा सारा मनोरथ पूर्ण कर दूँगा। अब मेरे पास तुम्हारे लिये कोई वस्तु अदेय नहीं रह गयी है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! शम्भुके इस परम सुखदायक एवं उत्कृष्ट वचनको सुनकर शुक्र प्रसन्न हो आनन्द-समुद्रमें निमग्न हो गये। उन कमलनयन द्विजवर शुक्रका शरीर परमानन्दजनित रोमांचके कारण पुलकायमान हो गया। तब उन्होंने हर्षपूर्वक शम्भुके चरणोंमें प्रणाम किया। उस समय उनके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे। फिर वे मस्तकपर अंजलि रखकर जय-जयकार करते हुए अष्टमूर्तिधारी* वरदायक शिवकी स्तुति करने लगे।

भार्गवने कहा—सूर्यस्वरूप भगवन्! आप त्रिलोकीका हित करनेके लिये आकाशमें प्रकाशित होते हैं और अपनी इन किरणोंसे समस्त अन्धकारको अभिभूत


* पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, यजमान, चन्द्रमा और सूर्य—इन आठोंमें अधिष्ठित शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, महादेव और ईशान—ये अष्टमूर्तियोंके नाम हैं।