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शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

* रुद्रसंहिता * ४२१

समय प्रसन्न हुए जटाधारी शंकरने उसे मुक्त करके उस त्रिशूलके अग्रभागसे उतार लिया और दिव्य अमृतकी वर्षासे अभिषिक्त कर दिया। तत्पश्चात् महात्मा महेश्वर उसने जो कुछ किया था, उस सबका सान्त्वना-पूर्वक वर्णन करते हुए उस महादैत्य अन्धकसे बोले।

ईश्वरने कहा—हे दैत्येन्द्र! मैं तेरे इन्द्रिय-निग्रह, नियम, शौर्य और धैर्यसे प्रसन्न हो गया हूँ; अतः सुव्रत! अब तू कोई वर माँग ले। दैत्योंके राजाधिराज! तूने निरन्तर मेरी आराधना की है, इससे तेरा सारा कल्मष धुल गया और अब तू वर पानेके योग्य हो गया है। इसीलिये मैं तुझे वर देनेके लिये आया हूँ; क्योंकि तीन हजार वर्षोंतक बिना खाये-पीये प्राण धारण किये रहनेसे तूने जो पुण्य कमाया है, उसके फलस्वरूप तुझे सुखकी प्राप्ति होनी चाहिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! यह सुनकर अन्धकने भूमिपर अपने घुटने टेक दिये और फिर वह हाथ जोड़कर काँपता हुआ भगवान् उमापतिसे बोला।

अन्धकने कहा—भगवन्! आपकी महिमा जाने बिना मैंने पहले रणांगणमें हर्षगद्गद वाणीसे आपको जो दीन, हीन तथा नीच-से-नीच कहा है और मूर्खतावश लोकमें जो-जो निन्दित कर्म किया है, प्रभो! उस सबको आप अपने मनमें स्थान न दें अर्थात् उसे भूल जायँ। महादेव! मैं अत्यन्त ओछा और दुःखी हूँ। मैंने कामदोषवश पार्वतीके विषयमें भी जो दूषित भावना कर ली थी, उसे आप क्षमा कर दें। आपको तो अपने कृपण, दुःखी एवं दीन भक्तपर सदा ही विशेष दया करनी चाहिये। मैं उसी तरहका एक दीन भक्त हूँ और आपकी शरणमें आया हूँ। देखिये, मैंने आपके सामने अंजलि बाँध रखी है। अब आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये। ये जगज्जननी पार्वतीदेवी भी मुझपर प्रसन्न हो जायँ और सारे क्रोधको त्यागकर मुझे कृपादृष्टिसे देखें। चन्द्रशेखर! कहाँ तो इनका भयंकर क्रोध और कहाँ मैं तुच्छ दैत्य? चन्द्रमौलि! मैं किसी प्रकार उसको सहन नहीं कर सकता। शम्भो! कहाँ तो परम उदार आप और कहाँ बुढ़ापा, मृत्यु तथा काम-क्रोध आदि दोषोंके वशीभूत


त्रैलोक्यद्रावणं लुब्धं लुब्धकं यज्ञसूदनम्। कृत्तिकानां सुतैर्युक्तमुन्मत्तं कृत्तिवाससम्॥
गजकृत्तिपरीधानं क्षुब्धं भुजगभूषणम्। दत्तालम्बं च वेतालं घोरं शाकिनिपूजितम्॥
अघोरं घोरदैत्यघ्नं घोरघोषं वनस्पतिम्। भस्माङ्गं जटिलं शुद्धं भेरुण्डशतसेवितम्॥
भूतेश्वरं भूतनाथं पञ्चभूताश्रितं खगम्। क्रोधितं निष्ठुरं चण्डं चण्डीशं चण्डिकाप्रियम्॥
चण्डतुण्डं गरुत्मन्तं निस्त्रिंशं शवभोजनम्। लेलिहानं महारौद्रं मृत्युं मृत्योरगोचरम्॥
मृत्योर्मृत्युं महासेनं श्मशानारण्यवासिनम्। रागं विरागं रागान्धं वीतरागं शतार्चिषम्॥
सत्त्वं रजस्तमोधर्ममधर्मं वासवानुजम्। सत्यं त्वसत्यं सद्ग्रूपमसद्रूपमहेतुकम्॥
अर्धनारीश्वरं भानुं भानुकोटिशतप्रभम्। यज्ञं यज्ञपतिं रुद्रमीशानं वरदं शिवम्॥
अष्टोत्तरशतं ह्येतन्मूर्तीनां परमात्मनः। शिवस्य दानवो ध्यायन् मुक्तस्तस्मान्महाभयात्॥
(शि० पु० रु० सं० युद्धखण्ड ४९। ५–१८)

४२२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

मैं ? (अर्थात् मेरी आपके साथ क्या तुलना है?) महेश्वर! आपके ये युद्धकला-निपुण महाबली वीर पुत्र मेरी कृपणतापर विचार करके अब क्रोधके वशीभूत मत हों। तुषार, हार, चन्द्रकिरण, शंख, कुन्दपुष्प और चन्द्रमाके-से वर्णवाले शिव! मैं इन पार्वतीको गुरुताके गौरववश नित्य मातृ-दृष्टिसे देखूँ! मैं नित्य आप दोनोंका भक्त बना रहूँ। देवताओंके साथ होनेवाला मेरा वैर दूर हो जाय तथा मैं शान्तचित्त हो योग-चिन्तन करता हुआ गणोंके साथ निवास करूँ। महेशान! आपकी कृपासे मैं उत्पन्न हुए इस विरोधी दानवभावका पुनः कभी स्मरण न करूँ, यही उत्तम वर मुझे प्रदान कीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिसत्तम! इतनी बात कहकर वह दैत्यराज माता पार्वतीकी ओर देखकर त्रिनयन शंकरका ध्यान करता हुआ मौन हो गया। तब रुद्रने उसकी ओर कृपादृष्टिसे देखा। उनकी दृष्टि पड़ते ही उसे अपने पूर्ववृत्तान्त तथा अद्भुत जन्मका स्मरण हो आया। उस घटनाका स्मरण होते ही उसका मनोरथ पूर्ण हो गया। फिर तो माता-पिता (उमा-महेश्वर)-को प्रणाम करके वह कृतकृत्य हो गया। उस समय पार्वती तथा बुद्धिमान् शंकरने उसका मस्तक सूँघकर प्यार किया। इस प्रकार अन्धकने प्रसन्न हुए चन्द्रशेखरसे अपना सारा मनोरथ प्राप्त कर लिया। मुने! महादेवजीकी कृपासे अन्धकको जिस प्रकार परम सुखद गणाध्यक्ष-पद प्राप्त हुआ था, वह सारा-का-सारा पुरातन वृत्तान्त मैंने सुना दिया और मृत्युंजय-मन्त्रका भी वर्णन कर दिया। यह मन्त्र मृत्युका विनाशक और सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला है। इसे प्रयत्नपूर्वक जपना चाहिये।

(अध्याय ४७—४९)


शुक्राचार्यकी घोर तपस्या और इनका शिवजीको चित्तरत्न अर्पण करना तथा अष्टमूर्त्यष्टक-स्तोत्रद्वारा उनका स्तवन करना, शिवजीका प्रसन्न होकर उन्हें मृतसंजीवनी विद्या तथा अन्यान्य वर प्रदान करना

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! मुनिवर शुक्राचार्यको शिवसे मृत्युंजय नामक मृत्युका प्रशमन करनेवाली परा विद्या किस प्रकार प्राप्त हुई थी, अब उसका वर्णन करता हूँ; सुनो। पूर्वकालकी बात है, इन भृगुनन्दनने वाराणसीपुरीमें जाकर प्रभावशाली विश्वनाथका ध्यान करते हुए बहुत कालतक घोर तप किया था। वेदव्यासजी! उस समय उन्होंने वहीं एक शिवलिंगकी स्थापना की और उसके सामने ही एक परम रमणीय कूप तैयार कराया। फिर प्रयत्नपूर्वक उन देवेश्वरको एक लाख बार द्रोणभर पंचामृतसे तथा बहुत-से सुगन्धित द्रव्योंसे स्नान कराया। फिर एक हजार बार परम प्रीतिपूर्वक चन्दन, यक्षकर्दम* और सुगन्धित उबटनका उस लिंगपर अनुलेप किया। तत्पश्चात् सावधानीके साथ परम प्रेमपूर्वक राजचम्पक


* एक प्रकारका अंग-लेप जो कपूर, अगुरु, कस्तूरी और कंकोलको मिलाकर बनाया जाता है।

* रुद्रसंहिता * ४२३

(अमलतास), धतूर, कनेर, कमल, मालती, कर्णिकार, कदम्ब, मौलसिरी, उत्पल, मल्लिका (चमेली), शतपत्री, सिन्धुवार, ढाक, बन्धूकपुष्प (गुलदुपहरी), पुंनाग, नागकेसर, केसर, नवमल्लिक (बेलमोगरा), चिबिलिक (रक्तदला), कुन्द (माघपुष्प), मुचुकुन्द (मोतिया), मन्दार, बिल्वपत्र, गूमा, मरुवृक (मरुआ), वृक (धूप), गँठिवन, दौना, अत्यन्त सुन्दर आमके पल्लव, तुलसी, देवजवासा, बृहत्पत्री, कुशांकु, नन्दावर्त (नाँदरूख), अगस्त्य, साल, देवदारु, कचनार, कुरबक (गुलखेरा), दुर्वांकुर, कुरंटक (करसैला)—इनमेंसे प्रत्येकके पुष्पों और अन्य पल्लवोंसे तथा नाना प्रकारके रमणीय पत्रों और सुन्दर कमलोंसे शंकरजीकी विधिवत् अर्चना की। उन्हें बहुत-से उपहार समर्पित किये तथा शिवलिंगके आगे नाचते हुए शिवसहस्रनाम एवं अन्यान्य स्तोत्रोंका गान करके शंकरजीका स्तवन किया। इस प्रकार शुक्राचार्य पाँच हजार वर्षोंतक नाना प्रकारके विधि-विधानसे महेश्वरका पूजन करते रहे; परंतु जब उन्हें थोड़ा-सा भी वर देनेके लिये उद्यत होते नहीं देखा, तब उन्होंने एक-दूसरे अत्यन्त दुःसह एवं घोर नियमका आश्रय लिया। उस समय शुक्रने इन्द्रियोंसहित मनके अत्यन्त चंचलतारूपी महान् दोषको बारंबार भावनारूपी जलसे प्रक्षालित किया। इस प्रकार चित्तरत्नको निर्मल करके उसे पिनाकधारी शिवके अर्पण कर दिया और स्वयं धूमकणका पान करते हुए तप करने लगे। इस प्रकार उनके एक सहस्र वर्ष और बीत गये। तब भृगुनन्दन शुक्रको यों दृढ़चित्तसे घोर तप करते देखकर महेश्वर उनपर प्रसन्न हो गये। फिर तो दक्षकन्या पार्वतीके स्वामी साक्षात् विरूपाक्ष शंकर, जिनके शरीरकी कान्ति सहस्रों सूर्योंसे भी बढ़कर थी, उस लिंगसे निकलकर शुक्रसे बोले।

महेश्वरने कहा—महाभाग भृगुनन्दन! तुम तो तपस्याकी निधि हो। महामुने! मैं तुम्हारे इस अविच्छिन्न तपसे विशेष प्रसन्न हूँ। भार्गव! तुम अपना सारा मनोवांछित वर माँग लो। मैं प्रीतिपूर्वक तुम्हारा सारा मनोरथ पूर्ण कर दूँगा। अब मेरे पास तुम्हारे लिये कोई वस्तु अदेय नहीं रह गयी है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! शम्भुके इस परम सुखदायक एवं उत्कृष्ट वचनको सुनकर शुक्र प्रसन्न हो आनन्द-समुद्रमें निमग्न हो गये। उन कमलनयन द्विजवर शुक्रका शरीर परमानन्दजनित रोमांचके कारण पुलकायमान हो गया। तब उन्होंने हर्षपूर्वक शम्भुके चरणोंमें प्रणाम किया। उस समय उनके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे। फिर वे मस्तकपर अंजलि रखकर जय-जयकार करते हुए अष्टमूर्तिधारी* वरदायक शिवकी स्तुति करने लगे।

भार्गवने कहा—सूर्यस्वरूप भगवन्! आप त्रिलोकीका हित करनेके लिये आकाशमें प्रकाशित होते हैं और अपनी इन किरणोंसे समस्त अन्धकारको अभिभूत


* पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, यजमान, चन्द्रमा और सूर्य—इन आठोंमें अधिष्ठित शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, महादेव और ईशान—ये अष्टमूर्तियोंके नाम हैं।

४२४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

करके रातमें विचरनेवाले असुरोंका मनोरथ नष्ट कर देते हैं। जगदीश्वर! आपको नमस्कार है। घोर अन्धकारके लिये चन्द्र-स्वरूप शंकर! आप अमृतके प्रवाहसे परिपूर्ण तथा जगत्के सभी प्राणियोंके नेत्र हैं। आप अपनी अमर्याद तेजोमय किरणोंसे आकाशमें और भूतलपर अपार प्रकाश फैलाते हैं, जिससे सारा अंधकार दूर हो जाता है; आपको प्रणाम है। सर्वव्यापिन्! आप पावन पथ—योगमार्गका आश्रय लेनेवालोंकी सदा गति तथा उपास्यदेव हैं। भुवनजीवन! आपके बिना भला, इस लोकमें कौन जीवित रह सकता है। सर्पकुलके संतोषदाता ! आप निश्चल वायुरूपसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी वृद्धि करनेवाले हैं, आपको अभिवादन है। विश्वके एकमात्र पावनकर्ता ! आप शरणागतरक्षक और अग्निकी एकमात्र शक्ति हैं। पावक आपका ही स्वरूप है। आपके बिना मृतकोंका वास्तविक दिव्य कार्य दाह आदि नहीं हो सकता। जगत्के अन्तरात्मा ! आप प्राणशक्तिके दाता, जगत्स्वरूप और पद-पदपर शान्ति प्रदान करनेवाले हैं; आपके चरणोंमें मैं सिर झुकाता हूँ। जलस्वरूप परमेश्वर ! आप निश्चय ही जगत्के पवित्रकर्ता और चित्र-विचित्र सुन्दर चरित्र करनेवाले हैं। विश्वनाथ! जलमें अवगाहन करनेसे आप विश्वको निर्मल एवं पवित्र बना देते हैं, इसलिये आपको नमस्कार है। आकाशरूप ईश्वर! आपसे अवकाश प्राप्त करनेके कारण यह विश्व बाहर और भीतर विकसित होकर सदा स्वभाववश श्वास लेता है अर्थात् इसकी परम्परा चलती रहती है तथा आपके द्वारा यह संकुचित भी होता है अर्थात् नष्ट हो जाता है; इसलिये दयालु भगवन्! मैं आपके आगे नतमस्तक होता हूँ। विश्वम्भरात्मक! आप ही इस विश्वका भरण-पोषण करते हैं। सर्वव्यापिन्! आपके अतिरिक्त दूसरा कौन अज्ञानान्धकारको दूर करनेमें समर्थ हो सकता है। अतः विश्वनाथ! आप मेरे अज्ञानरूपी तमका विनाश कर दीजिये। नागभूषण! आप स्तवनीय पुरुषोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। इसलिये आप परात्पर प्रभुको मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ। आत्मस्वरूप शंकर! आप समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मामें निवास करनेवाले, प्रत्येक रूपमें व्याप्त हैं और मैं आप परमात्माका जन हूँ। अष्टमूर्ते! आपकी इन रूप-परम्पराओंसे यह चराचर विश्व विस्तारको प्राप्त हुआ है, अतः मैं सदासे आपको नमस्कार करता हूँ। मुक्तपुरुषोंके बन्धो! आप विश्वके समस्त प्राणियोंके स्वरूप, प्रणतजनोंके सम्पूर्ण योगक्षेमका निर्वाह करनेवाले और परमार्थस्वरूप हैं। आप अपनी इन अष्टमूर्तियोंसे युक्त होकर इस फैले हुए विश्वको भलीभाँति विस्तृत करते हैं, अतः आपको मेरा अभिवादन है।*


* त्वं भाभिराभिरभिभूय तमस्समस्तमस्तं नयस्यभिमतानि निशाचराणाम्।
देदीप्यसे दिवमणे गगने हिताय लोकत्रयस्य जगदीश्वर तन्नमस्ते॥
लोकेऽतिवेलमतिवेलमहामोभिर्निभासि कौ च गगनेऽखिललोकनेत्रः।
विद्राविताखिलतमास्सुतमो हिमांशो पीयूषपूरपरिपूरित तन्नमस्ते॥

* रुद्रसंहिता * ४२५

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिवर! भृगुनन्दन शुक्रने इस प्रकार अष्टमूर्त्यष्टक-स्तोत्रद्वारा शिवजीका स्तवन करके भूमिपर मस्तक रखकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया। जब अमित तेजस्वी भार्गवने महादेवकी इस प्रकार स्तुति की, तब शिवजीने चरणोंमें पड़े हुए उन द्विजवरको अपनी दोनों भुजाओंसे पकड़कर उठा लिया और परम प्रेमपूर्वक मेघगर्जनकी-सी गम्भीर एवं मधुर वाणीमें कहा। उस समय शंकरजीके दाँतोंकी चमकसे सारी दिशाएँ प्रकाशित हो उठी थीं।

महादेवजी बोले—विप्रवर कवे! तुम मेरे पावन भक्त हो। तात! तुम्हारे इस उग्र तपसे, उत्तम आचरणसे, लिंगस्थापनजन्य पुण्यसे, लिंगकी आराधना करनेसे, चित्तका उपहार प्रदान करनेसे, पवित्र अटलभावसे, अविमुक्त महाक्षेत्र काशीमें पावन आचरण करनेसे मैं तुम्हें पुत्ररूपसे देखता हूँ; अतः तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है। तुम अपने इसी शरीरसे मेरी उदरदरीमें प्रवेश करोगे और मेरे श्रेष्ठ इन्द्रियमार्गसे निकलकर पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण करोगे। महाशुचे! मेरे पास जो मृतसंजीवनी नामकी निर्मल विद्या है, जिसका मैंने ही अपने महान् तपोबलसे निर्माण किया है, उस महामन्त्ररूपा विद्याको आज मैं तुम्हें प्रदान करूँगा; क्योंकि तुम पवित्र तपकी निधि हो, अतः तुममें उस विद्याको धारण करनेकी योग्यता वर्तमान है। तुम नियमपूर्वक जिस-जिसके उद्देश्यसे विद्येश्वरकी इस श्रेष्ठ विद्याका प्रयोग करोगे, वह निश्चय ही जीवित हो जायगा—यह सर्वथा सत्य है। तुम आकाशमें अत्यन्त दीप्तिमान् तारारूपसे स्थित होओगे। तुम्हारा तेज सूर्य और अग्निके तेजका भी अतिक्रमण कर जायगा। तुम ग्रहोंमें प्रधान माने जाओगे। जो स्त्री अथवा पुरुष तुम्हारे सम्मुख रहनेपर यात्रा करेंगे, उनका सारा कार्य तुम्हारी दृष्टि


त्वं पावने पथि सदा गतिरप्युपास्यः कस्तवां विना भुवनजीवन जीवतीह।
स्तब्धप्रभञ्जनविवर्धितसर्वजन्तो संतोषिताहिकुल सर्वग वै नमस्ते॥
विश्वैकपावक नतावक पावकैक शक्ते ऋते मृतवतामृतदिव्यकार्यम्।
प्राणिष्यदो जगदहो जगदान्तरात्मंस्त्वं पावकः प्रतिपदं शमदो नमस्ते॥
पानीयरूप परमेश जगत्पवित्र चित्रातिचित्रसुचरित्रकरोऽसि नूनम्।
विश्वं पवित्रममलं किल विश्वनाथ पानीयगाहनत एतदतो नतोऽस्मि॥
आकाशरूपबहिरन्तरुतावकाशादानाद् विकस्वरमिहेश्वर विश्वमेतत्।
त्वत्तस्सदा सदय संश्वसिति स्वभावात् संकोचमेति भवतोऽस्मि नतस्ततस्त्वाम्॥
विश्वम्भरात्मक बिभर्षि विभोऽत्र विश्वं को विश्वनाथ भवतोऽन्यतमस्तमोऽरिः।
स त्वं विनाशय तमो मम चाहिभूष स्तव्यात्परः परपरं प्रणतस्ततस्त्वाम्॥
आत्मस्वरूप तव रूपपरम्पराभिराभिस्ततं हर चराचररूपमेतत्।
सर्वान्तरात्मनिलय प्रतिरूपरूप नित्यं नतोऽस्मि परमात्मजनोऽष्टमूर्ते॥
इत्यष्टमूर्तिभिरिमाभिरबन्धबन्धो युक्तः करोषि खलु विश्वजनीनमूर्ते।
एतत्ततं सुविततं प्रणतप्रणीत सर्वार्थसार्थपरमार्थ ततो नतोऽस्मि॥
(शि० पु० रु० सं० युद्धखण्ड ५०।२४-३२)

४२६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

पड़नेसे नष्ट हो जायगा। सुव्रत! तुम्हारे उदय होनेपर जगत्में मनुष्योंके विवाह आदि समस्त धर्मकार्य सफल होंगे। सभी नन्दा (प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी) तिथियाँ तुम्हारे संयोगसे शुभ हो जायँगी और तुम्हारे भक्त वीर्यसम्पन्न तथा बहुत-सी संतानवाले होंगे। तुम्हारे द्वारा स्थापित किया हुआ यह शिवलिंग 'शुक़्रेश' के नामसे विख्यात होगा। जो मनुष्य इस लिंगकी अर्चना करेंगे, उन्हें सिद्धि प्राप्त हो जायगी। जो लोग वर्षपर्यन्त नक्तव्रतपरायण होकर शुक्रवारके दिन शुक्रकूपके जलसे सारी क्रियाएँ सम्पन्न करके शुक्रेशकी अर्चना करेंगे, उन्हें जिस फलकी प्राप्ति होगी, वह मुझसे श्रवण करो। उन मनुष्योंमें वीर्यकी अधिकता होगी, उनका वीर्य कभी निष्फल नहीं होगा; वे पुत्रवान् तथा पुरुषत्वके सौभाग्यसे सम्पन्न होंगे। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। वे सभी मनुष्य बहुत-सी विद्याओंके ज्ञाता और सुखके भागी होंगे। यों वरदान देकर महादेव उसी लिंगमें समा गये। तब भृगुनन्दन शुक्र भी प्रसन्नमनसे अपने धामको चले गये। व्यासजी! यों शुक्राचार्यको जिस प्रकार अपने तपोबलसे मृत्युंजय नामक विद्याकी प्राप्ति हुई थी, वह वृत्तान्त मैंने तुमसे वर्णन कर दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

(अध्याय ५०)


बाणासुरकी तपस्या और उसे शिवद्वारा वर-प्राप्ति, शिवका गणों और पुत्रोंसहित उसके नगरमें निवास करना, बाणपुत्री ऊषाका रातके समय स्वप्नमें अनिरुद्धके साथ मिलन, चित्रलेखाद्वारा अनिरुद्धका द्वारकासे अपहरण, बाणका अनिरुद्धको नागपाशमें बाँधना, दुर्गाके स्तवनसे अनिरुद्धका बन्धनमुक्त होना, नारदद्वारा समाचार पाकर श्रीकृष्णकी शोणितपुरपर चढ़ाई, शिवके साथ उनका घोर युद्ध, शिवकी आज्ञासे श्रीकृष्णका उन्हें जृम्भणास्त्रसे मोहित करके बाणकी सेनाका संहार करना

व्यासजी बोले—सर्वज्ञ सनत्कुमारजी! आपने अनुग्रह करके प्रेमपूर्वक ऐसी अद्भुत और सुन्दर कथा सुनायी है, जो शंकरकी कृपासे ओतप्रोत है। अब मुझे शशिमौलिके उस उत्तम चरित्रके श्रवण करनेकी इच्छा है, जिसमें उन्होंने प्रसन्न होकर बाणासुरको गणाध्यक्षपद प्रदान किया था।

सनत्कुमारजीने कहा—व्यासजी! परमात्मा शम्भुकी उस कथाको, जिसमें उन्होंने प्रसन्न होकर बाणासुरको गणनायक बनाया था, आदरपूर्वक श्रवण करो। इसी प्रसंगमें महाप्रभु शंकरका वह सुन्दर चरित्र भी आयेगा, जिसमें उन्होंने बाणासुरपर अनुग्रह करके श्रीकृष्णके साथ संग्राम

* रुद्रसंहिता * ४२७

किया था। व्यासजी! दक्षप्रजापतिकी तेरह कन्याएँ कश्यप मुनिकी पत्नियाँ थीं। वे सब-की-सब पतिव्रता तथा सुशीला थीं। उनमें दिति सबसे बड़ी थी, जिसके लड़के दैत्य कहलाते हैं। अन्य पत्नियोंसे भी देवता तथा चराचरसहित समस्त प्राणी पुत्ररूपसे उत्पन्न हुए थे। ज्येष्ठ पत्नी दितिके गर्भसे सर्वप्रथम दो महाबली पुत्र पैदा हुए, उनमें हिरण्यकशिपु ज्येष्ठ था और उसके छोटे भाईका नाम हिरण्याक्ष था। हिरण्यकशिपुके चार पुत्र हुए। उन दैत्यश्रेष्ठोंका क्रमशः ह्राद, अनुह्राद, संह्राद और प्रह्लाद नाम था। उनमें प्रह्लाद जितेन्द्रिय तथा महान् विष्णुभक्त हुए। उनका नाश करनेके लिये कोई भी दैत्य समर्थ न हो सका। प्रह्लादका पुत्र विरोचन हुआ, वह दानियोंमें सर्वश्रेष्ठ था। उसने विप्ररूपसे याचना करनेवाले इन्द्रको अपना सिर ही दे डाला था। उसका पुत्र बलि हुआ। यह महादानी और शिवभक्त था। इसने वामनरूपधारी विष्णुको सारी पृथ्वी दान कर दी थी। बलिका औरस पुत्र बाण हुआ। वह शिवभक्त, मानी, उदार, बुद्धिमान्, सत्यप्रतिज्ञ और सहस्रोंका दान करनेवाला था। उस असुरराजने पूर्वकालमें त्रिलोकीको तथा त्रिलोकाधिपतियोंको बलपूर्वक जीतकर शोणितपुरमें अपनी राजधानी बनाया और वहीं रहकर राज्य करने लगा। उस समय देवगण शंकरकी कृपासे उस शिवभक्त बाणासुरके किंकरके समान हो गये थे। उसके राज्यमें देवताओंके अतिरिक्त और कोई प्रजा दुःखी नहीं थी। शत्रुधर्मका बर्ताव करनेवाले देवता शत्रुतावश ही कष्ट झेल रहे थे। एक समय वह महासुर अपनी सहस्रों भुजाओंसे ताली बजाता हुआ ताण्डवनृत्य करके महेश्वर शिवको प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगा। उसके उस नृत्यसे भक्तवत्सल शंकर संतुष्ट हो गये। फिर उन्होंने परम प्रसन्न हो उसकी ओर कृपादृष्टिसे देखा। भगवान् शंकर तो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी, शरणागतवत्सल और भक्तवांछा-कल्पतरु ही ठहरे। उन्होंने बलिनन्दन महासुर बाणको वर देनेकी इच्छा प्रकट की।

मुने! बलिनन्दन महादैत्य बाण शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ और परम बुद्धिमान् था। उसने परमेश्वर शंकरको प्रणाम करके उनकी स्तुति की (और कहा)।

बाणासुर बोला—प्रभो! आप मेरे रक्षक हो जाइये और पुत्रों तथा गणोंसहित मेरे नगरके अध्यक्ष बनकर सर्वथा प्रीतिका निर्वाह करते हुए मेरे पास ही निवास कीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! वह बलिपुत्र बाण निश्चय ही शिवजीकी मायासे मोहमें पड़ गया था, इसीलिये उसने मुक्ति प्रदान करनेवाले दुराराध्य महेश्वरको पाकर भी ऐसा वर माँगा। तब ऐश्वर्यशाली भक्तवत्सल शम्भु उसे वह वर देकर पुत्रों और गणोंके साथ प्रेमपूर्वक वहीं निवास करने लगे। एक बार बाणासुरको बड़ा ही गर्व हो गया। उसने ताण्डवनृत्य करके शंकरको संतुष्ट किया। जब बाणासुरको यह ज्ञात हो गया कि पार्वतीवल्लभ शिव प्रसन्न हो गये हैं, तब वह हाथ जोड़कर सिर झुकाये हुए बोला।

बाणासुरने कहा—देवाधिदेव महादेव! आप समस्त देवताओंके शिरोमणि हैं। आपकी ही कृपासे मैं बली हुआ हूँ। अब आप मेरा उत्तम वचन सुनिये। देव! आपने

४२८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

जो मुझे एक हजार भुजाएँ प्रदान की हैं, ये तो अब मुझे महान् भारस्वरूप लग रही हैं; क्योंकि इस त्रिलोकीमें मुझे आपके अतिरिक्त अपनी जोड़का और कोई योद्धा ही नहीं मिला। इसलिये वृषध्वज! युद्धके बिना इन पर्वत-सरीखी सहस्रों भुजाओंको लेकर मैं क्या करूँ। मैं अपनी इन परिपुष्ट भुजाओंकी खुजली मिटानेके लिये युद्धकी लालसासे नगरों तथा पर्वतोंको चूर्ण करता हुआ दिग्गजोंके पास गया; परंतु वे भी भयभीत होकर भाग खड़े हुए। मैंने यमको योद्धा, अग्निको महान् कार्य करनेवाला, वरुणको गौओंका पालनकर्ता गोपाल, कुबेरको गजाध्यक्ष, निर्ऋतिको सैरन्ध्री और इन्द्रको जीतकर सदाके लिये करद बना लिया है। महेश्वर! अब मुझे किसी ऐसे युद्धके प्राप्त होनेकी बात बताइये, जिसमें मेरी ये भुजाएँ या तो शत्रुओंके हाथोंसे छूटे हुए शस्त्रास्त्रोंसे जर्जर होकर गिर जायें अथवा हजारों प्रकारसे शत्रु की भुजाओंको ही गिरायें। यही मेरी अभिलाषा है, इसे पूर्ण करनेकी कृपा करें।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ! उसकी बात सुनकर भक्तबाधापहारी तथा महामन्युस्वरूप रुद्रको कुछ क्रोध आ गया। तब वे महान् अद्भुत अट्टहास करके बोले।

रुद्रने कहा—‘अरे अभिमानी! सम्पूर्ण दैत्योंके कुलमें नीच! तुझे सर्वथा धिक्कार है, धिक्कार है। तू बलिके पुत्र और मेरा भक्त है। तेरे लिये ऐसी बात कहना उचित नहीं है। अब तेरा दर्प चूर्ण होगा। तुझे शीघ्र ही मेरे समान बलवान्के साथ अकस्मात् महान् भीषण युद्ध प्राप्त होगा। उस संग्राममें तेरी ये पर्वत-सरीखी भुजाएँ जलौनी लकड़ीकी तरह शस्त्रास्त्रोंसे छिन्न-भिन्न होकर भूमिपर गिरेंगी। दुष्टात्मन्! तेरे आयुधागारपर स्थापित तेरा जो यह मनुष्यके सिरवाला मयूरध्वज फहरा रहा है, इसका जब वायु-भयके बिना ही पतन हो जायगा, तब तू अपने चित्तमें समझ लेना कि वह महान् भयानक युद्ध आ पहुँचा है। उस समय तू घोर संग्रामका निश्चय करके अपनी सारी सेनाके साथ वहाँ जाना। इस समय तू अपने महलको लौट जा; क्योंकि इसीमें तेरा कल्याण है। दुर्मते! वहाँ तुझे प्रसिद्ध बड़े-बड़े उत्पात दिखायी देंगे।’ यों कहकर गर्वहारी भक्तवत्सल भगवान् शंकर चुप हो गये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! यह सुनकर बाणासुरने दिव्य पुष्पोंकी कलियोंसे अंजलि भरकर रुद्रकी अभ्यर्थना की और फिर उन महादेवको प्रणाम करके वह अपने घरको लौट गया। तदनन्तर किसी समय दैववश उसका वह ध्वज अपने-आप टूटकर गिर गया। यह देखकर बाणासुर हर्षित हो युद्धके लिये उद्यत हो गया। वह अपने हृदयमें विचार करने लगा कि कौन-सा युद्धप्रेमी योद्धा किस देशसे आयेगा, जो नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंका पारगामी विद्वान् होगा और मेरी सहस्रों भुजाओंको ईंधनकी तरह काट डालेगा तथा मैं भी अपने अत्यन्त तीखे शस्त्रोंसे उसके सैकड़ों टुकड़े कर डालूँगा। इसी समय शंकरकी प्रेरणासे वह काल आ गया। एक दिन बाणासुरकी कन्या ऊषा वैशाखमासमें माधवकी पूजा करके मांगलिक शृंगारसे सुसज्जित हो रातके समय अपने गुप्त अन्तःपुरमें सो रही थी, उसी समय वह स्त्रीभाव (कामभाव)-

* रुद्रसंहिता * ४२९

प्राप्त हो गयी। तब देवी पार्वतीकी शक्तिसे ऊषाको स्वप्नमें श्रीकृष्णके पौत्र अनिरुद्धका मिलन प्राप्त हुआ। जागनेपर वह व्याकुल हो गयी और उसने अपनी सखी चित्रलेखासे स्वप्नमें मिले हुए उस पुरुषको ला देनेके लिये कहा।

तब चित्रलेखाने कहा—'देवि! तुमने स्वप्नमें जिस पुरुषको देखा है, उसे भला, मैं कैसे ला सकती हूँ, जब कि मैं उसे जानती ही नहीं।' उसके यों कहनेपर दैत्यकन्या ऊषा प्रेमान्ध होकर मरनेपर उतारू हो गयी, तब उस दिन उसकी उस सखीने उसे बचाया। मुनिश्रेष्ठ! कुम्भाण्डकी पुत्री चित्रलेखा बड़ी बुद्धिमती थी, वह बाणतनया ऊषासे पुनः बोली।

चित्रलेखाने कहा—सखी! जिस पुरुषने तुम्हारे मनका अपहरण किया है, उसे बताओ तो सही। वह यदि त्रिलोकीमें कहीं भी होगा तो मैं उसे लाऊँगी और तुम्हारा कष्ट दूर करूँगी।

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! यों कहकर चित्रलेखाने वस्त्रके परदेपर देवताओं, दैत्यों, दानवों, गन्धर्वों, सिद्धों, नागों और यक्ष आदिके चित्र अंकित किये। फिर वह मनुष्योंका चित्र बनाने लगी। उनमें वृष्णिवंशियोंका प्रकरण आरम्भ होनेपर उसने शूर, वसुदेव, राम, कृष्ण और नरश्रेष्ठ प्रद्युम्नका चित्र बनाया। फिर जब उसने प्रद्युम्ननन्दन अनिरुद्धका चित्र खींचा, तब उसे देखकर ऊषा लज्जित हो गयी। उसका मुख अवनत हो गया और हृदय हर्षसे परिपूर्ण हो गया।

ऊषाने कहा—'सखी! रातमें जो मेरे पास आया था और जिसने शीघ्र ही मेरे चित्तरूपी रत्नको चुरा लिया है, वह चोर पुरुष यही है।' तदनन्तर ऊषाके अनुरोध करनेपर चित्रलेखा ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशीको तीसरे पहर द्वारकापुरी पहुँचकर क्षणमात्रमें ही पलंगपर बैठे हुए अनिरुद्धको महलमेंसे उठा लायी। वह दिव्य योगिनी थी। ऊषा अपने प्रियतमको पाकर प्रसन्न हो गयी। इधर अन्तःपुरके द्वारकी रक्षा करनेवाले बेतधारी पहरेदारोंने चेष्टाओंसे तथा अनुमानसे इस बातको लक्ष्य कर लिया। उन्होंने एक दिव्य शरीरधारी, दर्शनीय, साहसी तथा समरप्रिय नवयुवकको कन्याके साथ दुःशीलताका आचरण करते हुए देख भी लिया। उसे देखकर कन्याके अन्तःपुरकी रक्षा करनेवाले उन महाबली पुरुषोंने बलिपुत्र बाणासुरके पास जाकर सारी बातें निवेदन करते हुए कहा।

द्वारपाल बोले—देव! पता नहीं, आपके अन्तःपुरमें बलपूर्वक प्रवेश करके कौन पुरुष छिपा हुआ है। वह इन्द्र तो नहीं है, जो वेष बदलकर आपकी कन्याका उपभोग कर रहा है? महाबाहु दानवराज! उसे यहाँ देखिये, देखिये और जैसा उचित समझिये वैसा कीजिये। इसमें हमलोगोंका कोई दोष नहीं है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ! द्वारपालोंका वह वचन तथा कन्याके दूषित होनेका कथन सुनकर महाबली दानवराज बाण आश्चर्यचकित हो गया। तदनन्तर वह कुपित होकर अन्तःपुरमें जा पहुँचा। वहाँ उसने प्रथम अवस्थामें वर्तमान दिव्य शरीरधारी अनिरुद्धको देखा। उसे महान् आश्चर्य हुआ। फिर उसने उसका बल देखनेके लिये दस हजार सैनिकोंको भेजकर

४३० * संक्षिप्त शिवपुराण *

आज्ञा दी कि इसे मार डालो। सेनाने अनिरुद्धपर आक्रमण किया। तब अनिरुद्धने बात-की-बातमें दस हजार सैनिकोंको कालके हवाले कर दिया। फिर तो असंख्य सेना-पर-सेना आने लगी और अनिरुद्ध उन्हें कालका ग्रास बनाने लगे। तदनन्तर उन्होंने बाणासुरका वध करनेके लिये एक शक्ति हाथमें ली, जो कालाग्निके समान भयंकर थी। फिर उसीसे रथकी बैठकमें बैठे हुए बाणासुरपर प्रहार किया। उसकी गहरी चोट खाकर वीरवर बाण उसी क्षण घोड़ोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गया। फिर महावीर बलिपुत्र बाणासुरने, जो महान् बलसम्पन्न तथा शिवभक्त था, छलपूर्वक नागपाशसे अनिरुद्धको बाँध लिया। इस प्रकार उन्हें बाँधकर और पिंजरेमें कैद करके वह युद्धसे उपराम हो गया। तत्पश्चात् बाण कुपित होकर महाबली सूतपुत्रसे बोला।

बाणासुरने कहा—सूतपुत्र! घास-फूससे ढके हुए अगाध कुएँमें ढकेलकर इस पापीको मार डाल। अधिक क्या कहूँ, इसे सर्वथा मार ही डालना चाहिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! उसकी यह बात सुनकर उत्तम मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ धर्मबुद्धि निशाचर कुम्भाण्डने बाणासुरसे कहा।

कुम्भाण्ड बोला—देव! थोड़ा विचार तो कीजिये। मेरी समझसे तो यह कर्म करना उचित नहीं प्रतीत होता; क्योंकि इसके मारे जानेपर अपना आत्मा ही आहत हो जायगा। पराक्रममें तो यह विष्णुके समान दीख रहा है। जान पड़ता है, आपपर कुपित होकर चन्द्रचूड़ने अपने उत्तम तेजसे इसे बढ़ा दिया है। साहसमें यह शशिमौलिकी समानता कर रहा है; क्योंकि इस अवस्थाको पहुँच जानेपर भी यह पुरुषार्थपर ही डटा हुआ है। यह ऐसा बली है कि यद्यपि नाग इसे बलपूर्वक डँस रहे हैं, तथापि यह हमलोगोंको तृणवत् ही समझ रहा है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! दानव कुम्भाण्ड राजनीतिके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ था। वह बाणसे ऐसा कहकर फिर अनिरुद्धसे कहने लगा।

कुम्भाण्डने कहा—'नराधम! अब तू वीरवर दैत्यराजकी स्तुति कर और दीन वाणीसे 'मैं हार गया' यों बारंबार कहकर उन्हें हाथ जोड़कर नमस्कार कर। ऐसा करनेपर ही तू मुक्त हो सकता है, अन्यथा तुझे बन्धन आदिका कष्ट भोगना पड़ेगा।' उसकी बात सुनकर अनिरुद्ध उत्तर देते हुए बोले।

अनिरुद्धने कहा—दुराचारी निशाचर! तुझे क्षत्रिय-धर्मका ज्ञान नहीं है। अरे! शूरवीरके लिये दीनता दिखाना और युद्धसे मुख मोड़कर भागना मरणसे भी बढ़कर कष्टदायक होता है। मेरे विचारसे तो विरुद्धाचरण काँटेकी तरह चुभनेवाला होता है। वीरमानी क्षत्रियके लिये रणभूमिमें सदा सम्मुख लड़ते हुए मरना ही श्रेयस्कर है, भूमिपर पड़कर हाथ जोड़े हुए दीनकी तरह मरना कदापि नहीं।*

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! इस


* क्षत्रियस्य रणे श्रेयो मरणं सम्मुखे सदा। न वीरमानिनी भूमौ दीनस्येव कृताञ्जलेः॥
(शि० पु० रु० सं० युद्धखण्ड ५३। ३५)

* रुद्रसंहिता *     ४३१


प्रकार अनिरुद्धने बहुत-सी वीरताकी बातें कहीं, जिन्हें सुनकर बाणासुरको महान् विस्मय हुआ और उसे क्रोध भी आया। उसी समय समस्त वीरोंके, अनिरुद्धके और मन्त्री कुम्भाण्डके सुनते-सुनते बाणासुरके आश्वासनार्थ आकाशवाणी हुई।

आकाशवाणीने कहा—महाबली बाण! तुम बलिके पुत्र हो, अतः थोड़ा विचार तो करो। परम बुद्धिमान् शिवभक्त! तुम्हारे लिये क्रोध करना उचित नहीं है। शिव समस्त प्राणियोंके ईश्वर, कर्मोंके साक्षी और परमेश्वर हैं। यह सारा चराचर जगत् उन्हींके अधीन है। वे ही सदा रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणका आश्रय लेकर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररूपसे लोकोंकी सृष्टि, भरण-पोषण और संहार करते हैं। वे सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर, सबके प्रेरक, सर्वश्रेष्ठ, विकाररहित, अविनाशी, नित्य और मायाधीश होनेपर भी निर्गुण हैं। बलिके श्रेष्ठ पुत्र! उनकी इच्छासे निर्बलको भी बलवान् समझना चाहिये। महामते! मनमें यों विचारकर स्वस्थ हो जाओ। नाना प्रकारकी लीलाओंके रचनेमें निपुण भक्तवत्सल भगवान् शंकर गर्वको मिटा देनेवाले हैं। वे इस समय तुम्हारे गर्वको चूर कर देंगे।

सनत्कुमारजी कहते हैं—महामुने! इतना कहकर आकाशवाणी बंद हो गयी। तब उसके वचनको मानकर बाणासुरने अनिरुद्धका वध करनेका विचार छोड़ दिया। तदनन्तर विषैले नागोंके पाशसे बँधे हुए अनिरुद्ध उसी क्षण दुर्गाका स्मरण करने लगे।

अनिरुद्धने कहा—शरणागतवत्सले! आप यश प्रदान करनेवाली हैं, आपका रोष बड़ा उग्र होता है। देवि! मैं नागपाशसे बँधा हुआ हूँ और नागोंकी विषज्वालासे संतप्त हो रहा हूँ; अतः शीघ्र पधारिये और मेरी रक्षा कीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनीश्वर! जब अनिरुद्धने पिसे हुए काले कोयलेके समान कृष्णवर्णवाली कालीको इस प्रकार संतुष्ट किया, तब ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशीकी महारात्रिमें वहाँ प्रकट हुईं। उन्होंने उन सर्परूपी भयानक बाणोंको भस्मसात् करके अपने बलिष्ठ मुक्कोंके आघातसे उस नाग-पंजरको विदीर्ण कर दिया। इस प्रकार दुर्गाने अनिरुद्धको बन्धनमुक्त करके उन्हें पुनः अन्तःपुरमें पहुँचा दिया और स्वयं वहीं अन्तर्धान हो गयीं। इस प्रकार शिवकी शक्तिस्वरूपा देवीकी कृपासे अनिरुद्ध कष्टसे छूट गये, उनकी सारी व्यथा मिट गयी और वे सुखी हो गये। तदनन्तर प्रद्युम्ननन्दन अनिरुद्ध शिवशक्तिके प्रतापसे विजयी हो अपनी प्रिया बाणतनयाको पाकर परम हर्षित हुए और अपनी प्रियतमा उस ऊषाके साथ पूर्ववत् सुखपूर्वक विहार करने लगे। इधर पौत्र अनिरुद्धके अदृश्य हो जाने तथा नारदजीके मुखसे उसके बाणासुरके द्वारा नागपाशसे बाँधे जानेका समाचार सुनकर बारह अक्षौहिणी सेनाके साथ प्रद्युम्न आदि वीरोंको साथ ले भगवान् श्रीकृष्णने शोणितपुरपर चढ़ाई कर दी। उधर भगवान् श्रीरुद्र भी अपने भक्तके पक्षमें सज-धजकर आ डटे। फिर तो श्रीकृष्ण और श्रीशिवका बड़ा भयानक युद्ध हुआ। दोनों ओरसे ज्वर छोड़े गये। अन्तमें श्रीकृष्णने स्वयं श्रीरुद्रके पास आकर उनका स्तवन करके कहा—

४३२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

'सर्वव्यापी शंकर! आप गुणोंसे निर्लिप्त होकर भी गुणोंसे ही गुणोंको प्रकाशित करते हैं। गिरिशायी भूमन्! आप स्वप्रकाश हैं। जिनकी बुद्धि आपकी मायासे मोहित हो गयी है, वे स्त्री, पुत्र, गृह आदि विषयोंमें आसक्त होकर दुःखसागरमें डूबते-उतराते हैं। जो अजितेन्द्रिय पुरुष प्रारब्धवश इस मनुष्य-जन्मको पाकर भी आपके चरणोंमें प्रेम नहीं करता, वह शोचनीय तथा आत्मवंचक है। भगवन्! आप गर्वहारी हैं, आपने ही तो इस गर्वीले बाणको शाप दिया था; अतः आपकी ही आज्ञासे मैं बाणासुरकी भुजाओंका छेदन करनेके लिये यहाँ आया हूँ। इसलिये महादेव! आप इस युद्धसे निवृत्त हो जाइये। प्रभो! मुझे बाणकी भुजाओंको काटनेके लिये आज्ञा प्रदान कीजिये, जिससे आपका शाप व्यर्थ न हो।'

महेश्वरने कहा—तात ! आपने ठीक ही कहा है कि मैंने ही इस दैत्यराजको शाप दिया है और मेरी ही आज्ञासे आप बाणासुरकी भुजाएँ काटनेके लिये यहाँ पधारे हैं; किन्तु रमानाथ! हरे! क्या करूँ, मैं तो सदा भक्तोंके ही अधीन रहता हूँ। ऐसी दशामें वीर! मेरे देखते बाणकी भुजाएँ कैसे काटी जा सकती हैं? इसलिये मेरी आज्ञासे आप पहले जृम्भणास्त्रद्वारा मुझे जृम्भित कर दीजिये, तत्पश्चात् अपना अभीष्ट कार्य सम्पन्न कीजिये और सुखी होइये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनीश्वर! शंकरजीके यों कहनेपर शार्ङ्गपाणि श्रीहरिको महान् विस्मय हुआ। वे अपने युद्ध-स्थानपर आकर परम आनन्दित हुए। व्यासजी! तदनन्तर नाना प्रकारके अस्त्रोंके संचालनमें निपुण श्रीहरिने तुरंत ही अपने धनुषपर जृम्भणास्त्रका संधान करके उसे पिनाकपाणि शंकरपर छोड़ दिया। इस प्रकार श्रीकृष्ण जृम्भणास्त्रद्वारा जृम्भित हुए शंकरको मोहमें डालकर खड्ग, गदा और ऋष्टि आदिसे बाणकी सेनाका संहार करने लगे।

(अध्याय ५१—५४)


श्रीकृष्णद्वारा बाणकी भुजाओंका काटा जाना, सिर काटनेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णको शिवका रोकना और उन्हें समझाना, श्रीकृष्णका परिवारसमेत द्वारकाको लौट जाना, बाणका ताण्डव नृत्यद्वारा शिवको प्रसन्न करना, शिवद्वारा उसे अन्यान्य वरदानोंके साथ महाकालत्वकी प्राप्ति

सनत्कुमारजी कहते हैं—महाप्राज्ञ व्यासजी! लोकलीलाका अनुसरण करनेवाले श्रीकृष्ण और शंकरकी उस परम अद्भुत कथाको श्रवण करो। तात! जब भगवान् रुद्र लीलावश पुत्रों तथा गणोंसहित सो गये, तब दैत्यराज बाण श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेके लिये प्रस्थित हुआ। उस समय कुम्भाण्ड उसके अश्वोंकी बागडोर सँभाले हुए था और वह नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे सज्जित था। फिर वह महाबली बलिपुत्र

* रुद्रसंहिता * ४३३

भीषण युद्ध करने लगा। इस प्रकार उन दोनोंमें चिरकालतक बड़ा घोर संग्राम होता रहा; क्योंकि विष्णुके अवतार श्रीकृष्ण शिवरूप ही थे और उधर बलवान् बाणासुर उत्तम शिवभक्त था। मुनीश्वर! तदनन्तर वीर्यवान् श्रीकृष्ण, जिन्हें शिवकी आज्ञासे बल प्राप्त हो चुका था, चिरकालतक बाणके साथ यों युद्ध करके अत्यन्त कुपित हो उठे। तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने शम्भुके आदेशासे शीघ्र ही सुदर्शन चक्रद्वारा बाणकी बहुत-सी भुजाओंको काट डाला। अन्तमें उसकी अत्यन्त सुन्दर चार भुजाएँ ही अवशेष रह गयीं और शंकरकी कृपासे शीघ्र ही उसकी व्यथा भी मिट गयी। जब बाणकी स्मृति लुप्त हो गयी और वीरभावको प्राप्त हुए श्रीकृष्ण उसका सिर काट लेनेके लिये उद्यत हुए, तब शंकरजी मोहनिद्राको त्यागकर उठ खड़े हुए और बोले।

रुद्रने कहा—देवकीनन्दन! आप तो सदासे मेरी आज्ञाका पालन करते आये हैं। भगवान्! मैंने पहले आपको जिस कामके लिये आज्ञा दी थी, वह तो आपने पूरा कर दिया। अब बाणका शिरश्छेदन मत कीजिये और सुदर्शन चक्रको लौटा लीजिये। मेरी आज्ञासे यह चक्र सदा मेरे भक्तोंपर अमोघ रहा है। गोविन्द! मैंने पहले ही आपको युद्धमें अनिवार्य चक्र और जय प्रदान की थी, अब आप इस युद्धसे निवृत्त हो जाइये। लक्ष्मीश! पूर्वकालमें भी तो आपने मेरी आज्ञाके बिना दधीच, वीरवर रावण और तारकाक्ष आदिके पुरोंपर चक्रका प्रयोग नहीं किया था। जनार्दन! आप तो योगीश्वर, साक्षात् परमात्मा और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहनेवाले हैं। आप स्वयं ही अपने मनसे विचार कीजिये। मैंने इसे वर दे रखा है कि तुझे मृत्युका भय नहीं होगा। मेरा वह वचन सदा सत्य होना चाहिये। मैं आपपर परम प्रसन्न हूँ। हरे! बहुत दिन पूर्व यह गर्वसे भरकर उन्मत्त हो उठा और अपने-आपको भूल गया था। तब अपनी भुजाएँ खुजलाता हुआ यह मेरे पास पहुँचा और बोला—‘मेरे साथ युद्ध कीजिये।’ तब मैंने इसे शाप देते हुए कहा—‘थोड़े ही समयमें तेरी भुजाओंका छेदन करनेवाला आयेगा। तब तेरा सारा गर्व गल जायगा।’ (बाणकी ओर देखकर) कहा—‘मेरी ही आज्ञासे तेरी भुजाओंको काटनेवाले ये श्रीहरि आये हैं।’ (फिर श्रीकृष्णसे) ‘अब आप युद्ध बंद कर दीजिये और वर-वधूको साथ ले अपने घरको लौट जाइये।’ यों कहकर महेश्वरने उन दोनोंमें मित्रता करा दी और उनकी आज्ञा ले वे पुत्रों और गणोंके साथ अपने निवासस्थानको चले गये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! शम्भुका कथन सुनकर अक्षत शरीरवाले

४३४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

श्रीकृष्णने सुदर्शनको लौटा लिया और विजयश्रीसे सुशोभित हो वे बाणासुरके अन्तःपुरमें पधारे। वहाँ उन्होंने ऊषासहित अनिरुद्धको आश्वासन दिया और बाणद्वारा दिये गये अनेक प्रकारके रत्नसमूहोंको ग्रहण किया। ऊषाकी सखी परम योगिनी चित्रलेखाको पाकर तो श्रीकृष्णको महान् हर्ष हुआ। इस प्रकार शिवके आदेशानुसार जब उनका सारा कार्य पूर्ण हो गया, तब वे श्रीहरि हृदयसे शंकरको प्रणाम कर और बलिपुत्र बाणासुरकी आज्ञा ले परिवारसमेत अपनी पुरीको लौट गये। द्वारकामें पहुँचकर उन्होंने गरुडको विदा कर दिया। फिर हर्षपूर्वक मित्रोंसे मिले और स्वेच्छानुसार आचरण करने लगे।

इधर नन्दीश्वरने बाणासुरको समझाकर यह कहा—'भक्तशार्दूल! तुम बारंबार शिवजीका स्मरण करो। वे भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं, अतः उन आदिगुरु शंकरमें मन समाहित करके नित्य उनका महोत्सव करो।' तब द्वेषरहित हुआ महामनस्वी बाण नन्दीके कहनेसे धैर्य धारण करके तुरंत ही शिवस्थानको गया। वहाँ पहुँचकर उसने नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा शिवजीकी स्तुति की और उन्हें प्रणाम किया। फिर वह पादोंसे ठुमकी लगाते हुए और हाथोंको घुमाते हुए नाना प्रकारके आलीढ और प्रत्यालीढ आदि प्रमुख स्थानकोंद्वारा सुशोभित नृत्योंमें प्रधान ताण्डवनृत्य करने लगा। उस समय वह हजारों प्रकारसे मुखद्वारा बाजा बजा रहा था और बीच-बीचमें भौंहोंको मटकाकर तथा सिरको कँपाकर सहस्रों प्रकारके भाव भी प्रकट करता जाता था। इस प्रकार नृत्यमें मस्त हुए महाभक्त बाणासुरने महान् नृत्य करके नतमस्तक हो त्रिशूलधारी चन्द्रशेखर भगवान् रुद्रको प्रसन्न कर लिया। तब नाच-गानके प्रेमी भक्तवत्सल भगवान् हर हर्षित होकर बाणसे बोले।

रुद्रने कहा—बलिपुत्र प्यारे बाण! तेरे नृत्यसे मैं संतुष्ट हो गया हूँ, अतः दैत्येन्द्र! तेरे मनमें जो अभिलाषा हो, उसके अनुरूप वर माँग ले।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! शम्भुकी बात सुनकर दैत्यराज बाणने इस प्रकार वर माँगा—'मेरे घाव भर जायँ, बाहुयुद्धकी क्षमता बनी रहे, मुझे अक्षय गणनायकत्व प्राप्त हो, शोणितपुरमें ऊषापुत्र अर्थात् मेरे दौहित्रका राज्य हो, देवताओंसे तथा विशेष करके विष्णुसे मेरा वैरभाव मिट जाय, मुझमें रजोगुण और तमोगुणसे युक्त दूषित दैत्यभावका पुनः उदय न हो, मुझमें सदा निर्विकार शम्भुभक्ति बनी रहे और शिवभक्तोंपर मेरा स्नेह और समस्त प्राणियोंपर दयाभाव रहे।' यों शम्भुसे वरदान माँगकर बलिपुत्र महासुर बाण अंजलि बाँधे रुद्रकी स्तुति करने लगा। उस समय उसके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू छलक आये थे। तदनन्तर जिसके सारे अंग प्रेमसे प्रफुल्लित हो उठे थे, वह बलिनन्दन बाणासुर महेश्वरको प्रणाम करके मौन हो गया। अपने भक्त बाणकी प्रार्थना सुनकर भगवान् शंकर 'तुझे सब कुछ प्राप्त हो जायगा' यों कहकर वहीं अन्तर्धान हो गये।

* रुद्रसंहिता * ४३५

तब शम्भुकी कृपासे महाकालत्वको प्राप्त हुआ रुद्रका अनुचर बाण परमानन्दमें निमग्न हो गया। व्यासजी! इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण भुवनोंमें नित्य क्रीडा करनेवाले समस्त गुरुजनोंके भी सद्गुरु शूलपाणि भगवान् शंकरका बाणविषयक चरित, जो परमोत्तम है, कर्णप्रिय मधुर वचनोंद्वारा तुमसे वर्णन कर दिया। (अध्याय ५५-५६)


गजासुरकी तपस्या, वर-प्राप्ति और उसका अत्याचार, शिवद्वारा उसका वध, उसकी प्रार्थनासे शिवका उसका चर्म धारण करना और 'कृत्तिवासा' नामसे विख्यात होना तथा कृत्तिवासेश्वरलिंगकी स्थापना करना

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! अब परम प्रेमपूर्वक शशिमौलि शिवके उस चरित्रको श्रवण करो, जिसमें उन्होंने त्रिशूलद्वारा दानवराज गजासुरका वध किया था। गजासुर महिषासुरका पुत्र था। जब उसने सुना कि देवताओंसे प्रेरित होकर देवीने मेरे पिताको मार दिया था, तब उसका बदला लेनेकी भावनासे उसने घोर तप किया। उसके तपकी ज्वालासे सब जलने लगे। देवताओंने जाकर ब्रह्माजीसे अपना दुःख कहा, तब ब्रह्माजीने उसके सामने प्रकट होकर उसके प्रार्थनानुसार उसे वरदान दे दिया कि वह कामके वश होनेवाले किसी भी स्त्री या पुरुषसे नहीं मरेगा, महाबली और सबसे अजेय होगा।

वर पाकर वह गर्वमें भर गया। सब दिशाओं तथा सब लोकपालोंके स्थानोंपर उसने अधिकार कर लिया। अन्तमें भगवान् शंकरकी राजधानी आनन्दवन काशीमें जाकर वह सबको सताने लगा। देवताओंने भगवान् शंकरसे प्रार्थना की। शंकर कामविजयी हैं ही। उन्होंने घोर युद्धमें उसे हराकर त्रिशूलमें पिरो लिया। तब उसने भगवान् शंकरका स्तवन किया! शंकरने उसपर प्रसन्न होकर इच्छित वर माँगनेको कहा।

तब गजासुरने कहा—दिगम्बरस्वरूप महेशान! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो अपने त्रिशूलकी अग्निसे पवित्र हुए मेरे इस चर्मको आप सदा धारण किये रहें। विभो! मैं पुण्य गन्धोंकी निधि हूँ, इसीलिये मेरा यह चर्म चिरकालतक उग्र तपरूपी अग्निकी ज्वालामें पड़कर भी दग्ध नहीं हुआ है। दिगम्बर! यदि मेरा यह चर्म पुण्यवान् न होता तो रणांगणमें इसे आपके अंगोंका संग कैसे प्राप्त होता। शंकर! यदि आप तुष्ट हैं तो मुझे एक दूसरा वर और दीजिये। (वह यह कि) आजसे आपका नाम 'कृत्तिवासा' विख्यात हो जाय।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! गजासुरकी बात सुनकर भक्तवत्सल शंकरने परम प्रसन्नतापूर्वक महिषासुरनन्दन गजसे कहा—'तथास्तु'—अच्छा, ऐसा ही होगा। तदनन्तर प्रसन्नात्मा भक्तप्रिय महेशान उस दानवराज गजसे, जिसका मन भक्तिके कारण निर्मल हो गया था, पुनः बोले।

ईश्वरने कहा—दानवराज! तेरा यह पावन शरीर मेरे इस मुक्तिसाधक क्षेत्र

४३६ * संक्षिप्त शिवपुराण *


काशीमें मेरे लिंगके रूपमें स्थित हो जाय! इसका नाम कृत्तिवासेश्वर होगा। यह समस्त प्राणियोंके लिये मुक्तिदाता, महान् पातकोंका विनाशक, सम्पूर्ण लिंगोंमें शिरोमणि और मोक्षप्रद होगा। यों कहकर देवेश्वर दिगम्बर शिवने गजासुरके उस विशाल चर्मको लेकर ओढ़ लिया। मुनीश्वर! उस दिन बहुत बड़ा उत्सव मनाया गया। काशीनिवासी सारी जनता तथा प्रमथगण हर्षमग्न हो गये। विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओंका मन हर्षसे परिपूर्ण हो गया। वे हाथ जोड़कर महेश्वरको नमस्कार करके उनकी स्तुति करने लगे।

(अध्याय ५७)


### दुन्दुभिनिह्रॉद नामक दैत्यका व्याघ्ररूपसे शिवभक्तपर आक्रमण करनेका विचार और शिवद्वारा उसका वध

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! अब मैं चन्द्रमौलिके उस चरित्रका वर्णन करूँगा, जिसमें शंकरजीने दुन्दुभिनिह्रॉद नामक दैत्यको मारा था। तुम सावधान होकर श्रवण करो। दितिपुत्र महाबली हिरण्याक्षके विष्णुद्वारा मारे जानेपर दितिको बहुत दुःख हुआ। तब देवशत्रु दुन्दुभिनिह्रॉदने उसको आश्वासन देकर यह निश्चय किया कि 'देवताओंके बल ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण नष्ट हो जायँगे तो यज्ञ नहीं होंगे, यज्ञ न होनेपर देवता आहार न पानेसे निर्बल हो जायँगे। तब मैं उनपर सहज ही विजय पा लूँगा।' यों विचारकर वह ब्राह्मणोंको मारने लगा। ब्राह्मणोंका प्रधान स्थान वाराणसी है, यह सोचकर वह काशी पहुँचा और वनमें वनचर बनकर समिधा लेते हुए, जलमें जलचर बनकर स्नान करते हुए और रातमें व्याघ्र बनकर सोते हुए ब्राह्मणोंको खाने लगा।

एक बार शिवरात्रिके अवसरपर एक भक्त अपनी पर्णशालामें देवाधिदेव शंकरका पूजन करके ध्यानस्थ बैठा था। बलाभिमानी दैत्यराज दुन्दुभिनिह्रॉदने व्याघ्रका रूप धारण करके उसे खा जानेका विचार किया; परंतु वह भक्त दृढ़चित्तसे शिवदर्शनकी लालसा लेकर ध्यानमें तल्लीन हो रहा था, इसके लिये उसने पहलेसे ही मन्त्ररूपी अस्त्रका विन्यास कर लिया था। इस कारण वह दैत्य उसपर आक्रमण करनेमें समर्थ न हो सका। इधर सर्वव्यापी भगवान् शम्भुको उस दुष्ट रूपवाले दैत्यके अभिप्रायका पता लग गया। तब शंकरने उसे मार डालनेका विचार किया। इतनेमें, ज्यों ही उस दैत्यने व्याघ्ररूपसे उस भक्तको अपना ग्रास बनाना चाहा, त्यों ही जगत्की रक्षाके लिये मणिस्वरूप तथा भक्तरक्षणमें कुशल बुद्धिवाले त्रिलोचन भगवान् शंकर वहाँ प्रकट हो गये और उसे बगलमें दबोचकर उसके सिरपर वज्रसे भी कठोर घूँसेसे प्रहार किया। उस मुष्टि-प्रहारसे तथा काँखमें दबोचनेसे वह व्याघ्र अत्यन्त व्यथित हो गया और अपनी दहाड़से पृथ्वी तथा आकाशको कँपाता हुआ मृत्युका ग्रास बन गया। उस भयंकर शब्दको सुनकर तपस्वियोंका हृदय काँप उठा। वे रातमें ही उस शब्दका अनुसरण करते हुए उस

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स्थानपर आ पहुँचे। वहाँ परमेश्वर शिवको बगलमें उस पापीको दबाये हुए देखकर सब लोग उनके चरणोंमें पड़ गये और जय-जयकार करते हुए उनकी स्तुति करने लगे।

तदनन्तर महेश्वरने कहा—जो मनुष्य यहाँ आकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस रूपका दर्शन करेगा, निस्संदेह मैं उसके सारे उपद्रवोंको नष्ट कर दूँगा। जो मानव मेरे इस चरित्रको सुनकर और हृदयमें मेरे इस लिंगका स्मरण करके संग्राममें प्रवेश करेगा, उसे अवश्य विजयकी प्राप्ति होगी। मुने! जो मनुष्य व्याघ्रेश्वरके प्राकट्यसे सम्बन्ध रखनेवाले इस परमोत्तम चरित्रको सुनेगा अथवा दूसरेको सुनायेगा, पढ़ेगा या पढ़ायेगा, वह अपनी समस्त मनोवांछित वस्तुओंको प्राप्त कर लेगा और अन्तमें सम्पूर्ण दुःखोंसे रहित होकर मोक्षका भागी होगा। शिवलीलासम्बन्धी अमृतमय अक्षरोंसे परिपूर्ण यह अनुपम आख्यान स्वर्ग, यश और आयुका देनेवाला तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला है।

(अध्याय ५८)


विदल और उत्पल नामक दैत्योंका पार्वतीपर मोहित होना और पार्वतीका कन्दुकप्रहारद्वारा उनका काम तमाम करना, कन्दुकेश्वरकी स्थापना और उनकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी ! जिस प्रकार परमेश्वर शिवने संकेतसे दैत्यको लक्ष्य कराकर अपनी प्रियाद्वारा उसका वध कराया था, उनके उस चरित्रको तुम परम प्रेमपूर्वक श्रवण करो। विदल और उत्पल नामक दो महादैत्य थे। उन्होंने ब्रह्माजीसे किसी पुरुषके हाथसे न मरनेका वर प्राप्त करके सब देवताओंको जीत लिया था। तब देवताओंने ब्रह्माजीके पास जाकर अपना दुःख सुनाया। उनकी कष्ट-कहानी सुनकर ब्रह्माने उनसे कहा—‘तुमलोग शिवासहित शिवका आदरपूर्वक स्मरण करके धैर्य धारण करो। वे दोनों दैत्य निश्चय ही देवीके हाथों मारे जायँगे। शिवासहित शिव परमेश्वर, कल्याणकर्ता और भक्तवत्सल हैं। वे शीघ्र ही तुमलोगोंका कल्याण करेंगे।’

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! देवोंसे यों कहकर ब्रह्माजी शिवका स्मरण करते हुए मौन हो गये। तब देवगण भी आनन्दित होकर अपने-अपने धामको लौट गये। एक समय नारदजीके द्वारा पार्वतीके सौन्दर्यकी प्रशंसा सुनकर वे दोनों दैत्य उनका अपहरण करनेकी बात सोचने लगे और पार्वतीजी जहाँ गेंद उछाल रही थीं, वहीं वे जाकर आकाशमें विचरने लगे। वे दोनों घोर दुराचारी थे। उनका मन अत्यन्त चंचल हो रहा था। वे गणोंका रूप धारण करके अम्बिकाके निकट आये। तब दुष्टोंका संहार करनेवाले शिवने अवहेलनापूर्वक उनकी ओर देखकर उनके नेत्रोंसे प्रकट हुई चंचलताके कारण तुरंत उन्हें पहचान लिया। फिर तो सर्वस्वरूपी महादेवने दुर्गतिनाशिनी दुर्गाको कटाक्षद्वारा सूचित कर दिया कि ये दोनों दैत्य हैं, गण

४३८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

नहीं। तात! तब पार्वती अपने स्वामी महाकौतुकी परमेश्वर शंकरके उस नेत्रसंकेतको समझ गयीं। तदनन्तर सर्वज्ञ शिवकी अर्धांगिनी पार्वतीके उस संकेतको समझकर उसी गेंदसे एक साथ ही उन दोनोंपर चोट की। तब महादेवीकी गेंदसे आहत होकर वे दोनों महाबली दुष्ट दैत्य चक्कर काटते हुए उसी प्रकार भूतलपर गिर पड़े, जैसे वायुके झोंकेसे चंचल होकर दो पके हुए ताड़के फल अपनी डंठलसे टूटकर गिर पड़ते हैं अथवा जैसे वज्रके आघातसे महागिरिके दो शिखर ढह जाते हैं। इस प्रकार अकार्य करनेके लिये उद्यत उन दोनों महादैत्योंको धराशायी करके वह गेंद लिंगरूपमें परिणत हो गया। समस्त दुष्टोंका निवारण करनेवाला वह लिंग कन्दुकेश्वरके नामसे विख्यात हुआ और ज्येष्ठेश्वरके समीप स्थित हो गया। काशीमें स्थित कन्दुकेश्वरलिंग दुष्टोंका विनाशक, भोग-मोक्षका प्रदाता और सर्वदा सत्पुरुषों-की समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। जो मनुष्य इस अनुपम आख्यानको हर्षपूर्वक सुनता, सुनाता अथवा पढ़ता है, उसे भयका दुःख कहाँ। वह इस लोकमें नाना प्रकारके सम्पूर्ण उत्तमोत्तम सुखोंको भोगकर अन्तमें देवदुर्लभ दिव्य गतिको प्राप्त कर लेता है।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुनिसत्तम! मैंने तुमसे रुद्रसंहिताके अन्तर्गत इस युद्ध-खण्डका वर्णन कर दिया। यह खण्ड सम्पूर्ण मनोरथोंका फल प्रदान करनेवाला है। इस प्रकार मैंने पूरी-की-पूरी रुद्र-संहिताका वर्णन कर दिया। यह शिवजीको सदा परम प्रिय है और भुक्ति-मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाली है।

सूतजी कहते हैं—इस प्रकार शिवानुगामी ब्रह्मपुत्र नारद शंकरके उत्तम यशको तथा शिव-शतनामको सुनकर कृतार्थ हो गये। यों मैंने सम्पूर्ण चरित्रोंमें प्रधान तथा कल्याणकारक यह ब्रह्मा और नारदका संवाद पूर्णरूपसे कह दिया, अब तुम्हारी और क्या सुननेकी इच्छा है?

(अध्याय ५९)

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॥ रुद्रसंहिताका युद्धखण्ड सम्पूर्ण ॥

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॥ रुद्रसंहिता समाप्त ॥

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शतरुद्रसंहिता

शतरुद्रसंहिता

शिवजीके सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान नामक पाँच अवतारोंका वर्णन

वन्दे महानन्दमनन्तलीलं महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम्।
गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराजसमुद्भवं शंकरमादिदेवम्॥

जो परमानन्दमय हैं, जिनकी लीलाएँ अनन्त हैं, जो ईश्वरोंके भी ईश्वर, सर्व-व्यापक, महान्, गौरीके प्रियतम तथा स्वामिकार्तिक और विघ्नराज गणेशको उत्पन्न करनेवाले हैं, उन आदिदेव शंकरकी मैं वन्दना करता हूँ।

शौनकजीने कहा—महाभाग सूतजी! आप तो (पुराणकर्ता) व्यासजीके शिष्य तथा ज्ञान और दयाकी निधि हैं, अतः अब आप शम्भुके उन अवतारोंका वर्णन कीजिये, जिनके द्वारा उन्होंने सत्पुरुषोंका कल्याण किया है।

सूतजी बोले—शौनकजी! आप तो मननशील व्यक्ति हैं, अतः अब मैं आपसे शिवजीके उन अवतारोंका वर्णन करता हूँ, आप अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके सद्भक्तिपूर्वक मन लगाकर श्रवण कीजिये। मुने! पूर्वकालमें सनत्कुमारजीने नन्दीश्वरसे, जो सत्पुरुषोंकी गति तथा शिवस्वरूप ही हैं, यही प्रश्न किया था; उस समय नन्दीश्वरने शिवजीका स्मरण करते हुए उन्हें यों उत्तर दिया था।

नन्दीश्वरने कहा—मुने! यों तो सर्वव्यापी सर्वेश्वर शिवके कल्प-कल्पान्तरोंमें असंख्य अवतार हुए हैं, तथापि इस समय मैं अपनी बुद्धिके अनुसार उनमेंसे कुछका वर्णन करता हूँ। उन्नीसवाँ कल्प, जो श्वेतलोहित नामसे विख्यात है, उसमें शिवजीका 'सद्योजात' नामक अवतार हुआ था। वह उनका प्रथम अवतार कहलाता है। उस कल्पमें जब ब्रह्मा परब्रह्मका ध्यान कर रहे थे, उसी समय एक श्वेत और लोहित-वर्णवाला शिखाधारी कुमार उत्पन्न हुआ। उसे देखकर ब्रह्माने मन-ही-मन विचार किया। जब उन्हें यह ज्ञात हो गया कि यह पुरुष ब्रह्मरूपी परमेश्वर है, तब उन्होंने अंजलि बाँधकर उसकी वन्दना की। फिर जब भुवनेश्वर ब्रह्माको पता लग गया कि यह सद्योजात कुमार शिव ही हैं, तब उन्हें महान् हर्ष हुआ। वे अपनी सद्बुद्धिसे बारंबार उस परब्रह्मका चिन्तन करने लगे। ब्रह्माजी ध्यान कर ही रहे थे कि वहाँ श्वेत-वर्णवाले चार यशस्वी कुमार प्रकट हुए। वे परमोत्कृष्ट ज्ञानसम्पन्न तथा परब्रह्मके स्वरूप थे। उनके नाम थे—सुनन्द, नन्दन, विश्वनन्द और उपनन्दन। ये सब-के-सब महात्मा थे और ब्रह्माजीके शिष्य हुए। इनसे वह ब्रह्मलोक व्याप्त हो गया। तदनन्तर सद्योजातरूपसे प्रकट हुए परमेश्वर शिवने परम प्रसन्न होकर ब्रह्माको ज्ञान तथा सृष्टिरचनाकी शक्ति प्रदान की। (यह सद्योजात नामक पहला अवतार हुआ।)

तदनन्तर 'रक्त' नामसे प्रसिद्ध बीसवाँ कल्प आया। उस कल्पमें ब्रह्माजीने रक्त-वर्णका शरीर धारण किया था। जिस समय ब्रह्माजी पुत्रकी कामनासे ध्यान कर रहे थे, उसी समय उनसे एक पुत्र प्रकट हुआ। उसके शरीरपर लाल रंगकी माला और लाल ही वस्त्र शोभा पा रहे थे। उसके नेत्र भी लाल थे और वह आभूषण भी लाल

४४० * संक्षिप्त शिवपुराण *

रंगका ही धारण किये हुए था। उस महान् आत्मबलसे सम्पन्न कुमारको देखकर ब्रह्माजी ध्यानस्थ हो गये। जब उन्हें ज्ञात हो गया कि ये वामदेव शिव हैं, तब उन्होंने हाथ जोड़कर उस कुमारको प्रणाम किया। तत्पश्चात् उनके विरजा, विवाह, विशोक और विश्वभावन नामके चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो सभी लाल वस्त्र धारण किये हुए थे। तब वामदेवरूपधारी परमेश्वर शम्भुने परम प्रसन्न होकर ब्रह्माको ज्ञान तथा सृष्टिरचनाकी शक्ति प्रदान की। (यह ‘वामदेव’ नामक दूसरा अवतार हुआ।)

इसके बाद इक्कीसवाँ कल्प आया, जो ‘पीतवासा’ नामसे कहा जाता था। उस कल्पमें महाभाग ब्रह्मा पीतवस्त्रधारी हुए। जब वे पुत्रकी कामनासे ध्यान कर रहे थे, उस समय उनसे एक महातेजस्वी कुमार उत्पन्न हुआ। उस प्रौढ़ कुमारकी भुजाएँ विशाल थीं और उसके शरीरपर पीताम्बर झलमला रहा था। उस ध्यानमग्न बालकको देखकर ब्रह्माजीने अपनी बुद्धिके बलसे उसे ‘तत्पुरुष’ शिव समझा। तब उन्होंने ध्यानयुक्त चित्तसे सम्पूर्ण लोकोंद्वारा नमस्कृत महादेवी शांकरी गायत्री (तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि)-का जप करके उन्हें नमस्कार किया, इससे महादेवजी प्रसन्न हो गये। तत्पश्चात् उनके पार्श्वभागसे पीतवस्त्रधारी दिव्यकुमार प्रकट हुए, वे सब-के-सब योगमार्गके प्रवर्तक हुए। (यह ‘तत्पुरुष’ नामक तीसरा अवतार हुआ।)

तत्पश्चात् स्वयम्भू ब्रह्माके उस पीतवर्ण नामक कल्पके बीत जानेपर पुनः दूसरा कल्प प्रवृत्त हुआ। उसका नाम ‘शिव’ था। जब एकार्णवकी दशामें एक सहस्र दिव्य वर्ष व्यतीत हो गये, तब ब्रह्माजी प्रजाओंकी सृष्टि करनेकी इच्छासे दुःखी हो विचार करने लगे। उस समय उन महातेजस्वी ब्रह्माके समक्ष एक कुमार उत्पन्न हुआ। उस महापराक्रमी बालकके शरीरका रंग काला था। वह अपने तेजसे उद्दीप्त हो रहा था तथा काला वस्त्र, काली पगड़ी और काला यज्ञोपवीत धारण किये हुए था। उसका मुकुट भी काला था और स्नानके पश्चात् अनुलेपन—चन्दन भी काले रंगका ही था। उन भयंकरपराक्रमी, महामनस्वी, देवदेवेश्वर, अलौकिक, कृष्णपिंगलवर्णवाले अघोरको देखकर ब्रह्माजीने उनकी वन्दना की। तत्पश्चात् ब्रह्माजी उन भक्तवत्सल अविनाशी अघोरको ब्रह्मरूप समझकर इष्ट वचनोंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे। तब उनके पार्श्वभागसे कृष्णवर्णवाले तथा काले रंगका अनुलेपन धारण किये हुए चार महामनस्वी कुमार उत्पन्न हुए। वे सब-के-सब परम तेजस्वी, अव्यक्तनामा तथा शिवसरीखे रूपवाले थे। उनके नाम थे— कृष्ण, कृष्णशिख, कृष्णास्य और कृष्णकण्ठधृक्। इस प्रकार उत्पन्न होकर इन महात्माओंने ब्रह्माजीकी सृष्टिरचनाके निमित्त महान् अद्भुत ‘घोर’ नामक योगका प्रचार किया। (यह ‘अघोर’ नामक चौथा अवतार हुआ।)

मुनीश्वरो! तदनन्तर ब्रह्माका दूसरा कल्प प्रारम्भ हुआ। वह परम अद्भुत था और ‘विश्वरूप’ नामसे विख्यात था। उस कल्पमें जब ब्रह्माजी पुत्रकी कामनासे मन-ही-मन शिवजीका ध्यान कर रहे थे, उसी समय महान् सिंहनाद करनेवाली विश्वरूपा सरस्वती प्रकट हुईं तथा उसी