शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* शतरुद्रसंहिता * ४४१
प्रकार परमेश्वर भगवान् ईशान प्रादुर्भूत हुए, जिनका वर्ण शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल था और जो समस्त आभूषणोंसे विभूषित थे। उन अजन्मा, सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी, सब कुछ प्रदान करनेवाले, सर्वस्वरूप, सुन्दर रूपवाले तथा अरूप ईशानको देखकर ब्रह्माजीने उन्हें प्रणाम किया। तब शक्तिसहित विभु ईशानने भी ब्रह्माको सन्मार्गका उपदेश देकर चार सुन्दर बालकोंकी कल्पना की। उन उत्पन्न हुए शिशुओंका नाम था—जटी, मुण्डी, शिखण्डी और अर्धमुण्ड। वे योगानुसार सद्धर्मका पालन करके योगगतिको प्राप्त हो गये। (यह 'ईशान' नामक पाँचवाँ अवतार हुआ।)
सर्वज्ञ सनत्कुमारजी! इस प्रकार मैंने जगत्की हितकामनासे सद्योजात आदि अवतारोंका प्राकट्य संक्षेपसे वर्णन किया। उनका वह सारा लोकहितकारी व्यवहार याथातथ्यरूपसे ब्रह्माण्डमें वर्तमान है। महेश्वरकी ईशान, पुरुष, घोर, वामदेव और ब्रह्म—ये पाँच मूर्तियाँ विशेषरूपसे प्रसिद्ध हैं। इनमें ईशान, जो शिवस्वरूप तथा सबसे बड़ा है, पहला कहा जाता है। वह साक्षात् प्रकृतिके भोक्ता क्षेत्रज्ञमें निवास करता है। शिवजीका दूसरा स्वरूप तत्पुरुष नामसे ख्यात है। वह गुणोंके आश्रयरूप तथा भोग्य सर्वज्ञमें अधिष्ठित है। पिनाकधारी शिवका जो अघोर नामक तीसरा स्वरूप है, वह धर्मके लिये अंगोंसहित बुद्धितत्त्वका विस्तार करके अंदर विराजमान रहता है। वामदेव नामवाला शंकरका चौथा स्वरूप अहंकारका अधिष्ठान है। वह सदा अनेकों प्रकारका कार्य करता रहता है। विचारशील बुद्धिमानोंका कथन है कि शंकरका ईशानसंज्ञक स्वरूप सदा कर्ण, वाणी और सर्वव्यापी आकाशका अधीश्वर है तथा महेश्वरका पुरुष नामक रूप त्वक्, पाणि और स्पर्शगुणविशिष्ट वायुका स्वामी है। मनीषीगण अघोर नामवाले रूपको शरीर, रस, रूप और अग्निका अधिष्ठान बतलाते हैं। शंकरजीका वामदेवसंज्ञक स्वरूप रसना, पायु, रस और जलका स्वामी कहा जाता है। प्राण, उपस्थ, गन्ध और पृथ्वीका ईश्वर शिवजीका सद्योजात नामक रूप बताया जाता है। कल्याणकामी मनुष्योंको शंकरजीके इन स्वरूपोंकी सदा प्रयत्नपूर्वक वन्दना करनी चाहिये; क्योंकि ये श्रेयःप्राप्तिमें एकमात्र हेतु हैं। जो मनुष्य इन सद्योजात आदि अवतारोंके प्राकट्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह जगत्में समस्त काम्य भोगोंका उपभोग करके अन्तमें परमगतिको प्राप्त होता है। (अध्याय १)
शिवजीकी अष्टमूर्तियोंका तथा अर्धनारीनररूपका सविस्तर वर्णन
नन्दीश्वरजी कहते हैं—ऐश्वर्यशाली मुने! अब तुम महेश्वरके उन श्रेष्ठ अवतारोंका वर्णन श्रवण करो, जो लोकमें सबके सम्पूर्ण कार्योंको पूर्ण करनेवाले अतएव सुखदाता हैं। तात! यह जगत् उन परमेश्वर शम्भुकी आठ मूर्तियोंका स्वरूप ही है। जैसे सूतमें मणियाँ पिरोयी रहती हैं, उसी तरह यह विश्व उन अष्टमूर्तियोंमें व्याप्त होकर