भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 456, कुल 850 में से

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पृष्ठ 456

४४२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

स्थित है। वे प्रसिद्ध आठ मूर्तियाँ ये हैं—शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव। शिवजीके इन शर्व आदि अष्टमूर्तियोंद्वारा पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, क्षेत्रज्ञ, सूर्य और चन्द्रमा अधिष्ठित हैं। शास्त्रका ऐसा निश्चय है कि कल्याणकर्ता महेश्वरका विश्वम्भरात्मक रूप ही चराचर विश्वको धारण किये हुए है। परमात्मा शिवका सलिलात्मक रूप जो समस्त जगत्‌को जीवन प्रदान करनेवाला है, ‘भव’ नामसे कहा जाता है। जो जगत्‌के बाहर-भीतर वर्तमान है और स्वयं ही विश्वका भरण-पोषण करता तथा स्पन्दित होता है, उग्ररूपधारी प्रभुके उस रूपको सत्पुरुष 'उग्र' कहते हैं। महादेवका जो सबको अवकाश देनेवाला सर्वव्यापी आकाशात्मक रूप है, उसे ‘भीम’ कहते हैं। वह भूतवृन्दका भेदक है। जो रूप समस्त आत्माओंका अधिष्ठान, सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें निवास करनेवाला और जीवोंके भव-पाशका छेदक है, उसे ‘पशुपति' का रूप समझना चाहिये। महेश्वरका सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करनेवाला जो सूर्य नामक रूप है, उसे ‘ईशान’ कहते हैं। वह द्युलोकमें भ्रमण करता है। अमृतमयी रश्मियोंवाला जो चन्द्रमा सम्पूर्ण विश्वको आह्लादित करता है, शिवका वह रूप ‘महादेव' नामसे पुकारा जाता है। ‘आत्मा' परमात्मा शिवका आठवाँ रूप है। यह मूर्ति अन्य मूर्तियोंकी व्यापिका है। इसलिये सारा विश्व शिवमयं है। जिस प्रकार वृक्षके मूलको सींचनेसे उसकी शाखाएँ पुष्पित हो जाती हैं, उसी तरह शिवका पूजन करनेसे शिवस्वरूप विश्व परिपुष्ट होता है। जैसे इस लोकमें पुत्र-पौत्र आदिको प्रसन्न देखकर पिता हर्षित होता है, उसी तरह विश्वको भलीभाँति हर्षित देखकर शंकरको आनन्द मिलता है। इसलिये यदि कोई किसी भी देहधारीको कष्ट देता है तो निस्संदेह मानो उसने अष्टमूर्ति शिवका ही अनिष्ट किया है। सनत्कुमारजी! इस प्रकार भगवान् शिव अपनी अष्टमूर्तियोंद्वारा समस्त विश्वको अधिष्ठित करके विराजमान हैं, अतः तुम पूर्ण भक्तिभावसे उन परम कारण रुद्रका भजन करो।

प्रिय सनत्कुमारजी! अब तुम शिवजीके अनुपम अर्धनारीनररूपका वर्णन सुनो। महाप्राज्ञ! वह रूप ब्रह्माकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। (सृष्टिके आदिमें) जब सृष्टिकर्ता ब्रह्माद्वारा रची हुई सारी प्रजाएँ विस्तारको नहीं प्राप्त हुईं, तब ब्रह्मा उस दुःखसे दुःखी हो चिन्ताकुल हो गये। उसी समय यों आकाशवाणी हुई—‘ब्रह्मन्! अब मैथुनी सृष्टिकी रचना करो।' उस व्योमवाणीको सुनकर ब्रह्माने मैथुनी सृष्टि उत्पन्न करनेका विचार किया; परंतु इससे पहले नारियोंका कुल ईशानसे प्रकट ही नहीं हुआ था, इसलिये पद्मयोनि ब्रह्मा मैथुनी सृष्टि रचनेमें समर्थ न हो सके। तब वे यों विचार कर कि शम्भुकी कृपाके बिना मैथुनी प्रजा उत्पन्न नहीं हो सकती, तप करनेको उद्यत हुए। उस समय ब्रह्मा पराशक्ति शिवासहित परमेश्वर शिवका प्रेमपूर्वक हृदयमें ध्यान करके घोर तप करने लगे। तदनन्तर तपोऽनुष्ठानमें लगे हुए ब्रह्माके उस तीव्र तपसे थोड़े ही समयमें शिवजी प्रसन्न हो गये। तब वे कष्टहारी शंकर पूर्णसच्चिदानन्दकी कामदा मूर्तिमें

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