शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शिवजीने कहा—'देवि! परमेष्ठी ब्रह्माने तपस्याद्वारा तुम्हारी आराधना की है, अतः अब तुम उनपर प्रसन्न हो जाओ और उनका सारा मनोरथ पूर्ण करो।' तब शिवादेवीने परमेश्वर शिवकी उस आज्ञाको सिर झुकाकर ग्रहण किया और ब्रह्माके कथनानुसार दक्षकी पुत्री होना स्वीकार कर लिया। मुने! इस प्रकार शिवादेवी ब्रह्माको अनुपम शक्ति प्रदान करके शम्भुके शरीरमें प्रविष्ट हो गयीं। तत्पश्चात् भगवान् शंकर भी तुरंत ही अन्तर्धान हो गये। तभीसे इस लोकमें स्त्रीभागकी कल्पना हुई और मैथुनी सृष्टि चल पड़ी; इससे ब्रह्माको महान् आनन्द प्राप्त हुआ। तात! इस प्रकार मैंने तुमसे शिवजीके महान् अनुपम अर्धनारीनरार्धरूपका वर्णन कर दिया, यह सत्पुरुषोंके लिये मंगलदायक है।
(अध्याय २-३)
वाराहकल्पमें होनेवाले शिवजीके प्रथम अवतारसे लेकर नवम ऋषभ अवतारतकका वर्णन
नन्दीश्वरजी कहते हैं—सर्वज्ञ सनत्कुमारजी! एक बार रुद्रने हर्षित होकर ब्रह्माजीसे शंकरके चरित्रका प्रेमपूर्वक वर्णन किया था। वह चरित्र सदा परम सुखदायक है। (उसे तुम श्रवण करो। वह चरित्र इस प्रकार है।)
शिवजीने कहा था—ब्रह्मन्! वाराहकल्पके सातवें मन्वन्तरमें सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करनेवाले भगवान् कल्पेश्वर, जो तुम्हारे प्रपौत्र हैं, वैवस्वत मनुके पुत्र होंगे। तब उस मन्वन्तरकी चतुर्युगियोंके किसी द्वापरयुगमें मैं लोकोंपर अनुग्रह करने तथा ब्राह्मणोंका हित करनेके लिये प्रकट हूँगा। ब्रह्मन्! युगप्रवृत्तिके अनुसार उस प्रथम चतुर्युगीके प्रथम द्वापरयुगमें जब प्रभु स्वयं ही व्यास होंगे, तब मैं उस कलियुगके अन्तमें ब्राह्मणोंके हितार्थ शिवासहित श्वेत नामक महामुनि होकर प्रकट हूँगा। उस समय हिमालयके रमणीय शिखर छागल नामक पर्वतश्रेष्ठपर मेरे शिखाधारी चार शिष्य उत्पन्न होंगे। उनके नाम होंगे—श्वेत, श्वेतशिख, श्वेताश्व और श्वेतलोहित। वे चारों ध्यानयोगके आश्रयसे मेरे नगरमें जायँगे। वहाँ वे मुझ अविनाशीको तत्त्वतः जानकर मेरे भक्त हो जायँगे तथा जन्म, जरा और मृत्युसे रहित होकर परब्रह्मकी समाधिमें लीन रहेंगे। वत्स पितामह! उस समय मनुष्य ध्यानके अतिरिक्त दान, धर्म आदि कर्महेतुक साधनोंद्वारा मेरा दर्शन नहीं पा सकेंगे। दूसरे द्वापरमें प्रजापति सत्य व्यास होंगे। उस समय मैं कलियुगमें सुतार नामसे उत्पन्न होऊँगा। वहाँ भी मेरे दुन्दुभि, शतरूप, हृषीक तथा केतुमान् नामक चार वेदवादी द्विज शिष्य होंगे। वे चारों ध्यानयोगके बलसे मेरे नगरको जायँगे और मुझ अविनाशीको तत्त्वतः जानकर मुक्त हो जायँगे। तीसरे द्वापरमें जब भार्गव नामक व्यास होंगे, तब मैं भी नगरके निकट ही दमन नामसे प्रकट होऊँगा। उस समय भी मेरे विशोक, विशेष, विपाप और पापनाशन नामक चार पुत्र होंगे। चतुरानन! उस अवतारमें मैं शिष्योंको साथ ले व्यासकी सहायता