भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 850 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 460

४४६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

भस्म लगाकर उसे बारह हजार हाथियोंका बल भी देंगे। यों मातासहित भद्रायुको भलीभाँति आश्वासन देकर तथा उन दोनोंद्वारा पूजित हो प्रभावशाली ऋषभ मुनि स्वेच्छानुसार चले जायेंगे। ब्रह्मन्! तब राजर्षि भद्रायु भी रिपुगणोंको जीतकर और कीर्तिमालिनीके साथ विवाह करके धर्मपूर्वक राज्य करेगा। मुने! मुझ शंकरका वह ऋषभ नामक नवाँ अवतार ऐसा प्रभाववाला होगा, वह सत्पुरुषोंकी गति तथा दीनोंके लिये बन्धु-सा हितकारी होगा। मैंने उसका वर्णन तुम्हें सुना दिया। यह ऋषभ-चरित्र परम पावन, महान् तथा स्वर्ग, यश और आयुको देनेवाला है; अतः इसे प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिये।
(अध्याय ४)


शिवजीद्वारा दसवेंसे लेकर अट्ठाईसवें योगेश्वरावतारोंका वर्णन

शिवजी कहते हैं—ब्रह्मन्! दसवें द्वापरमें त्रिधामा नामके मुनि व्यास होंगे। वे हिमालयके रमणीय शिखर पर्वतोत्तम भृगुतुंगपर निवास करेंगे। वहाँ भी मेरे श्रुतिविदित चार पुत्र होंगे। उनके नाम होंगे—भृंग, बलबन्धु, नरामित्र और तपोधन केतुशृंग। ग्यारहवें द्वापरमें जब त्रिवृत नामक व्यास होंगे, तब मैं कलियुगमें गंगा-द्वारमें तप नामसे प्रकट होऊँगा। वहाँ भी मेरे लम्बोदर, लम्बाक्ष, केशलम्ब और प्रलम्बक नामक चार दृढ़व्रती पुत्र होंगे। बारहवीं चतुर्युगीके द्वापरयुगमें शततेजा नामके वेदव्यास होंगे। उस समय मैं द्वापरके समाप्त होनेपर कलियुगमें हेमकंचुकमें जाकर अत्रि नामसे अवतार लूँगा और व्यासकी सहायताके लिये निवृत्तिमार्गको प्रतिष्ठित करूँगा। महामुने! वहाँ भी मेरे सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य और शर्व नामक चार उत्तम योगी पुत्र होंगे। तेरहवें द्वापरयुगमें जब धर्मस्वरूप नारायण व्यास होंगे, तब मैं पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादनपर बालखिल्यआश्रममें महामुनि बलि नामसे उत्पन्न हूँगा। वहाँ भी मेरे सुधामा, काश्यप, वसिष्ठ और विरजा नामक चार सुन्दर पुत्र होंगे। चौदहवीं चतुर्युगीके द्वापरयुगमें जब रक्ष नामक व्यास होंगे, उस समय मैं अंगिराके वंशमें गौतम नामसे उत्पन्न होऊँगा। उस कलियुगमें भी अत्रि, वशद, श्रवण और श्नविष्कट मेरे पुत्र होंगे। पंद्रहवें द्वापरमें जब त्रय्यारुणि व्यास होंगे, उस समय मैं हिमालयके पृष्ठ-भागमें स्थित वेदशीर्ष नामक पर्वतपर सरस्वतीके उत्तरतटका आश्रय ले वेदशिरा नामसे अवतार ग्रहण करूँगा। उस समय महापराक्रमी वेदशिर ही मेरा अस्त्र होगा। वहाँ भी मेरे चार दृढ़ पराक्रमी पुत्र होंगे। उनके नाम होंगे—कुणि, कुणिबाहु, कुशरीर और कुनेत्रक।

सोलहवें द्वापरयुगमें जब व्यासका नाम देव होगा, तब मैं योग प्रदान करनेके लिये परम पुण्यमय गोकर्णवनमें गोकर्ण नामसे प्रकट होऊँगा। वहाँ भी मेरे काश्यप, उशना, च्यवन और बृहस्पति नामक चार पुत्र होंगे। वे जलके समान निर्मल और योगी होंगे तथा उसी मार्गके आश्रयसे शिवलोकको प्राप्त हो जायँगे। सत्रहवीं चतुर्युगीके द्वापर-युगमें देवकृतंजय व्यास होंगे, उस समय मैं