भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 463

* शतरुद्रसंहिता * ४४९

शिलाद नामक एक धर्मात्मा मुनि थे। पितरोंके आदेशसे उन्होंने अयोनिज सुव्रत मृत्युहीन पुत्रकी प्राप्तिके लिये तप करके देवेश्वर इन्द्रको प्रसन्न किया। परंतु देवराज इन्द्रने ऐसा पुत्र प्रदान करनेमें अपनेको असमर्थ बताकर सर्वेश्वर महाशक्तिसम्पन्न महादेवकी आराधना करनेका उपदेश दिया। तब शिलाद भगवान् महादेवको प्रसन्न करनेके लिये तप करने लगे। उनके तपसे प्रसन्न होकर महादेव वहाँ पधारे और महासमाधिमग्न शिलादको थपथपाकर जगाया। तब शिलादने शिवका स्तवन किया और भगवान् शिवके उन्हें वर देनेको प्रस्तुत होनेपर उनसे कहा—'प्रभो! मैं आपके ही समान मृत्युहीन अयोनिज पुत्र चाहता हूँ।' तब शिवजी प्रसन्न होकर मुनिसे बोले।

शिवजीने कहा—तपोधन विप्र! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने, मुनियोंने तथा बड़े-बड़े देवताओंने मेरे अवतार धारण करनेके लिये तपस्याद्वारा मेरी आराधना की थी। इसलिये मुने! यद्यपि मैं सारे जगत्‌का पिता हूँ, फिर भी तुम मेरे पिता बनोगे और मैं तुम्हारा अयोनिज पुत्र होऊँगा तथा मेरा नाम नन्दी होगा।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! यों कहकर कृपालु शंकरने अपने चरणोंमें प्रणिपात करके सामने खड़े हुए शिलाद मुनिकी ओर कृपादृष्टिसे देखा और उन्हें ऐसा आदेश दे वे तुरंत ही उमासहित वहीं अन्तर्धान हो गये। महादेवजीके चले जानेके पश्चात् महामुनि शिलादने अपने आश्रममें आकर ऋषियोंसे वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया। कुछ समय बीत जानेके बाद जब यज्ञवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मेरे पिताजी यज्ञ करनेके लिये यज्ञक्षेत्रको जोत रहे थे, उसी समय मैं शम्भुकी आज्ञासे यज्ञके पूर्व ही उनके शरीरसे उत्पन्न हो गया। उस समय मेरे शरीरकी प्रभा युगान्तकालीन अग्निके समान थी। तब सारी दिशाओंमें प्रसन्नता छा गयी और शिलाद मुनिकी भी बड़ी प्रशंसा हुई। उधर शिलादने भी जब मुझ बालकको प्रलयकालीन सूर्य और अग्निके सदृश प्रभावशाली, त्रिनेत्र, चतुर्भुज, प्रकाशमान, जटामुकुटधारी, त्रिशूल आदि आयुधोंसे युक्त, सर्वथा रुद्ररूपमें देखा, तब वे महान् आनन्दमें निमग्न हो गये और मुझ प्रणम्यको नमस्कार करते हुए कहने लगे।

शिलाद बोले—सुरेश्वर! चूँकि तुमने नन्दी नामसे प्रकट होकर मुझे आनन्दित किया है, इसलिये मैं तुम आनन्दमय जगदीश्वरको नमस्कार करता हूँ।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर जैसे निर्धनको निधि प्राप्त हो जानेसे प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार मेरी प्राप्तिसे हर्षित होकर पिताजीने महेश्वरकी भलीभाँति वन्दना की और फिर मुझे लेकर वे शीघ्र ही अपनी पर्णशालाको चल दिये। महामुने! जब मैं शिलादकी कुटियामें पहुँच गया, तब मैंने अपने उस रूपका परित्याग करके मनुष्यरूप धारण कर लिया। तदनन्तर शालंकायन-नन्दन पुत्रवत्सल शिलादने मेरे जातकर्म आदि सभी संस्कार सम्पन्न किये। फिर पाँचवें वर्षमें पिताजीने मुझे सांगोपांग सम्पूर्ण वेदोंका तथा अन्यान्य शास्त्रोंका भी अध्ययन कराया। सातवाँ वर्ष पूरा होनेपर शिवजीकी आज्ञासे मित्र और वरुण नामके मुनि मुझे देखनेके लिये पिताजीके


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