भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 464

४५० * संक्षिप्त शिवपुराण *

आश्रमपर पधारे। शिलाद मुनिने उनकी पूरी
आवभगत की। जब वे दोनों महात्मा
मुनीश्वर आनन्दपूर्वक आसनपर विराज
गये, तब मेरी ओर बारंबार निहारकर बोले।

मित्र और वरुणने कहा—'तात शिलाद!
यद्यपि तुम्हारा पुत्र नन्दी सम्पूर्ण शास्त्रोंके
अर्थोंका पारगामी विद्वान् है, तथापि इसकी
आयु बहुत थोड़ी है। हमने बहुत तरहसे
विचार करके देखा, परंतु इसकी आयु
एक वर्षसे अधिक नहीं दीखती।' उन
विप्रवरोंके यों कहनेपर पुत्रवत्सल शिलाद
नन्दीको छातीसे लिपटाकर दुःखार्त हो
फूट-फूटकर रोने लगे। तब पिता और
पितामहको मृतककी भाँति भूमिपर पड़ा
हुआ देख नन्दी शिवजीके चरणकमलोंका
स्मरण करके प्रसन्नतापूर्वक पूछने लगा—
'पिताजी! आपको कौन-सा ऐसा दुःख
आ पड़ा है, जिसके कारण आपका शरीर
काँप रहा है और आप रो रहे हैं? आपको
वह दुःख कहाँसे प्राप्त हुआ है, मैं इसे
ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ।'

पिताने कहा—बेटा! तुम्हारी अल्पायुके
दुःखसे मैं अत्यन्त दुःखी हो रहा हूँ।
(तुम्हीं बताओ) मेरे इस कष्टको कौन
दूर कर सकता है? मैं उसकी शरण
ग्रहण करूँ।

पुत्र बोला—पिताजी! मैं आपके सामने
शपथ करता हूँ और यह बिलकुल सत्य
बात कह रहा हूँ कि चाहे देवता, दानव,
यम, काल तथा अन्यान्य प्राणी—ये सब-
के-सब मिलकर मुझे मारना चाहें, तो भी
मेरी बाल्यकालमें मृत्यु नहीं होगी, अतः
आप दुःखी मत हों।

पिताने पूछा—मेरे प्यारे लाल! तुमने
ऐसा कौन-सा तप किया है अथवा तुम्हें
कौन-सा ऐसा ज्ञान, योग या ऐश्वर्य प्राप्त
है, जिसके बलपर तुम इस दारुण दुःखको
नष्ट कर दोगे?

पुत्रने कहा—तात! मैं न तो तपसे
मृत्युको हटाऊँगा और न विद्यासे। मैं
महादेवजीके भजनसे मृत्युको जीत लूँगा,
इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! यों कहकर
मैंने सिर झुकाकर पिताजीके चरणोंमें प्रणाम
किया और फिर उनकी प्रदक्षिणा करके
उत्तम वनकी राह ली। (अध्याय ६)


नन्दीश्वरके जन्म, वरप्राप्ति, अभिषेक और विवाहका वर्णन

नन्दिकेश्वर कहते हैं—मुने! वनमें जाकर
मैंने एकान्त स्थानमें अपना आसन लगाया
और उत्तम बुद्धिका आश्रय ले मैं उग्र तपमें
प्रवृत्त हुआ, जो बड़े-बड़े मुनियोंके लिये
भी दुष्कर था। उस समय मैं नदीके पावन
उत्तर तटपर सुदृढ़रूपसे ध्यान लगाकर बैठ
गया और एकाग्र तथा समाहित मनसे
अपने हृदयकमलके मध्यभागमें तीन नेत्र,
दस भुजा तथा पाँच मुखवाले शान्तिस्वरूप
देवाधिदेव सदाशिवका ध्यान करके रुद्र-
मन्त्रका जप करने लगा। तब उस जपमें
मुझे तल्लीन देखकर चन्द्रार्धभूषण परमेश्वर
महादेव प्रसन्न हो गये और उमासहित वहाँ
पधारकर प्रेमपूर्वक बोले।


789 संक्षिप्त शिवपुराण—15 B

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